गुरु सब तीर्थों के तीरथ हैं गुरु त्रिवेणी की धारा हैं गंगा की पावनता के जैसे शिष्य को शीतल छाया गुरु हैं गुरु तरुवर के मीठे वृक्ष सम गुरु गिरिराज से ऊंचे शिखर हैं उनकी छाया जिस पर पड़ता आशीष से जीवन गुल खिलता पुष्पों की फुलवारी में दमके चंद्रमुखी से चमक गुरु हैं चंदा के मुखड़े के जैसे शीतल भाव समान गुरु हैं गुरु की आज्ञा सर माथे हो , चौखट पर माथा नवता हो दिल में मूरत राख गुरु का , गुरु में रमता शिष्य अजेय है गुरु काल के महाकाल हैं आदि अंत से सदा परे हैं गुरु हैं अगम अगोचर रूपक गुरु वेदों में उपनिषद है गुरु सार शब्द गीता ज्ञान है गुरु भक्त का कल्पवृक्ष है गुरु कर्ता करतार गुरु है पारब्रह्म से परे गुरु है गुरु पारलौकिक महामंत्र हैं गुरु आध्यात्मिक विश्लेषण है गुरु ज्ञान का बाण अमोघ हैं शिष्य के खातिर संजीवनी है गुरु के वचनों में विश्वास हो शिष्य को यम से भय ना व्याप्त हो गुरु की शक्ति तीनो लोको में सुर गण देव अथाह बतावें जिनका अंतर अन्वेषण हो , अध्यात्म ज्ञान का परिचायक हो बिन गुरु कृष्ण त्रिलोकीनाथ ना...
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