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गुरु महिमा है अपार जगत में _स्तुति

  गुरु सब तीर्थों के तीरथ हैं  गुरु त्रिवेणी की धारा हैं गंगा की पावनता के जैसे शिष्य को शीतल छाया गुरु हैं गुरु तरुवर के मीठे वृक्ष सम गुरु गिरिराज से ऊंचे शिखर हैं उनकी छाया जिस पर पड़ता आशीष से जीवन गुल खिलता पुष्पों की फुलवारी में दमके चंद्रमुखी से चमक गुरु हैं चंदा के मुखड़े के जैसे शीतल भाव समान गुरु हैं गुरु की आज्ञा सर माथे हो , चौखट पर माथा नवता हो दिल में मूरत राख गुरु का , गुरु  में रमता शिष्य अजेय है गुरु काल के महाकाल हैं  आदि अंत से सदा परे हैं गुरु हैं अगम अगोचर रूपक  गुरु वेदों में उपनिषद है गुरु सार शब्द गीता ज्ञान है गुरु भक्त का कल्पवृक्ष है गुरु कर्ता करतार   गुरु है पारब्रह्म से परे गुरु है गुरु पारलौकिक महामंत्र हैं गुरु आध्यात्मिक विश्लेषण है गुरु ज्ञान का बाण अमोघ हैं  शिष्य के खातिर संजीवनी है गुरु के वचनों में विश्वास हो  शिष्य को यम से भय ना व्याप्त हो गुरु की शक्ति तीनो लोको में सुर  गण देव अथाह बतावें जिनका अंतर अन्वेषण हो , अध्यात्म  ज्ञान का परिचायक हो बिन गुरु कृष्ण त्रिलोकीनाथ ना...

मुक्तक आध्यात्मिक

  सांसारिक उपलब्धियों के बावजूद एक कोना है इस मानव हृदय में जो  अध्यात्म की कमी को महसूस  करता है यह सदियों से चला आ रहा है अगर अध्यात्म जीवन की आवश्यकता न होती तो युद्ध क्षेत्र में भगवान अर्जुन को राजविद्या का ज्ञान ना दे रहे होते ...... आध्यात्म की बैसाखी के बिना नर पंगु होता है ,  भौतिकी लाख हो उपलब्धियां क्षण भंगुर होता है  छिपा है अनंत अद्भुत शक्तियां मानव हृदय पट में  कुंडलिनी जागृति से चक्र आवागमन मिटता है ।। ********** और सच्चे गुरु की  पहचान क्या होती है कैसे हम आप यह जानें की किसकी शरणागति होनी है  तो कुछ लक्षण अपने शब्दों में उजागर किया है अध्यात्म के इन गूढ़ रहस्यों को हृदयोंदगार कर। जान गुरु की पहचान कर सकते हैं  कि जगमग जिसका अंतर्मन हो बाहर भीतर स्थितप्रज्ञ हो सुध हो जिसकी आत्म संयमित जीवों को कर दे जो भय हीन धर्म संहिता का ज्ञाता हो राम राज्य सा उसका दर हो  नीच अधम पतित मानव का करता जो उद्धार है  देव स्द्रीश चैतन्य महाप्रभु सदगुरु तुम्हे प्रणाम है।।

मुक्तक राष्ट्र भक्ति

 राष्ट्र भक्ति कलाकारी अदाकारी हुनर कुछ खास जिनमे हो  मुकाम ए शौहरते सम्मान ओहदे खास उनके हों  कला का धर्म ना कोई नहीं मजहब की बंदिश है अनेकता में एकत्व फले ये हिंदुस्तान बेहतर हो।।  गांधी जी  वृति हिंसक हो तो धरती पाप के बोझ ढोती है  आजादी की तड़प हुंकार चींखे मन में गुंजती है जंग_ए_आजादी में घेरे लुटेरों और फिरंगियों को अंग्रेजो के वस्त्र स्वाहा कर बापू पहने धोती हैं। वीरों के सम्मान में आजादी के सिर-मोर-मुकुट जन-मानस में जो रमते हैं, निज स्वार्थ से ऊपर उठकर जो राष्ट्र हितैषी होते हैं, सम्मान में अपने देश के खातिर शत्रु से टकराएं जो, करबद्ध नमन उन वीरों को जो मातृभूमि पर मिटते हैं।। राष्ट्रीय एकता पर प्रेम ही प्रेम है जग मे , ना पालो नफरतें दिल में पशु ,पक्षी, वृक्ष ,फूलों , से सीखो कुछ हुनर खुद में विधाता ने विविधता से , सजाया है जहाँ को खुद आदायगी करके ऋण अपना ,करो जन्नत जहां को तुम।। कवि और लेखक का धर्म राष्ट्र के हित की बातें हो सामाजिक आपबीती हो गीत गजलों में कविताओं में केवल बात सच्ची हो सरल अनुपम मनोहर वीर और श्रृंगार अद्भुत है गढ़ो जब ...

भोर के स्वप्न में

  इस भोर के स्वप्न में जाने कैसी ये  आहट है। उलझूं जब खुद में मेरे मुरशिद का दीदार हो ।। ख्वाब बेवजह तो नहीं कि  कह सकूं सब बेहतर है  । तू संभाल लेना मुझे कि तुझ पर यकीं खुद से ज्यादा हो। तेरी नजरों के सामने भरे दरबार का वो मंजर । कि तेरे कदमों को चूमकर मेरे रूह में हरारत हो ।। दुनिया की भीड़ में एक रूहानी दर है तेरा । तुझे एकटक देखूं तो मेरे नसीब का जागना हो।। क्या करम है मेरे मौला जो मुझे महफूज किया तूने। महसूस करता है दिल मेरा तू मुझमें कतरा कतरा हो ।। दुनियावी तिलिस्मों में एक रूहानी छाया है ऐसा। तूं मुझ  में रचा बसा है ऐसे जैसे मृग में कस्तूरी हो।। एक फरियादी बन तुझसे गुजारिश करती है गुंजन। दुनियावी ख्वाहिशें खत्म हो तेरा दीदार ही मेरी जन्नत हो ।। ©®

कवयित्रियां कैसी होती हैं part 2( लेख)

  संस्कार न्यूज में प्रकाशित लेख  कवयित्रियां  कैसी होती हैं  दीक्षा ने पूछा ....."   हंसी मजाक और ठहाँको के बीच  दीक्षा बोली ...''  चलो अब कौन  क्या परफॉर्म  करेगा सब बताओ   एक एक करके !!  गजाला ऑफिस से थकी हारी आई  कुछ देर आराम करने को लेटी ही थी कि  कवि हृदय की झंकार और गुंजन उसके कानो में मिश्री घोल रही थी।  वह तुरंत उठकर बैठ जाती है कि दोनो सहेलियां उसकी उत्सुकता को देख  हंस  पड़ती हैं "हां हम बेवकूफ हैं " घरेलू औरतें हैं हमे नहीं आता पैसों का हिसाब करना "   वाह वाह वाह वाह क्या खूब लिखती हो यार और वो भी इतना संजीदा विषय बहुत खूब.... दीक्षा और गिन्नी की तारीफ  सुनकर गजाला हल्की सी मुस्कान लिए पंक्तियां  खत्म करती है   अब बारी गिन्नी की आती है सब तालियां बजाते हैं  गिन्नी  भी सफर से थकी हुई थी कि उसका गला उसका साथ नहीं दे रहा था  इस सर्द गर्म मौसम का असर  भी इस महफिल को उदास ना होने दिया । गिन्नी ने थोड़ा रुककर गीत शुरू किया  ...."  जो...

देशभक्ति

ना घात करना राष्ट्रद्रोहों जागो अबकी बार  इस देश की मिट्टी के हम कण कण हैं कर्जदार  कुचले फनों को  विषधरों को राष्ट्र के जवान बापू की जन्मभूमि है ये  देश है गुलजार   ना घात करना राष्ट्रद्रोहों ..... जहां जन्मे पटेल तांत्या टोपे लाल बाल पाल सेल्युलर जेलों का काला पानी थी वीभत्सना  दृढ़ राष्ट्रवादी नौजवां भगत ने त्यागे प्राण भारत का गांव गांव और शहर है बेमिसाल ना घात करना राष्ट्रद्रोहों..... स्वतंत्रचेतना  जनजागरण  उदघोष से  राष्ट्र वाद भाव  प्रेरित  राष्ट्र कवियों से। सोनेकी  चिड़िया आज बेड़ियों से मुक्त है जिसके बचाव में  लगा था पूरा हिंदुस्तान ना घात करना राष्ट्रद्रोहों..... पुष्प की अभिलाषा हो या इंकलाब स्वर  खदेडे थे उन गिदड़ों को भारती के लाल  निर्भय हो दुर्ग लांघे  'गुंजन' दर ओ दिवारें  असंख्य बलिदानों की गाथा मेरा हिंदुस्तान।। ©®

रुद्रपुर उत्तराखंड की स्मृतियां

 रुद्रपुर, उत्तराखंड   ये शहर मुझको एक अनजान शहर लगता था  इसकी फिज़ाओं में सुर संगीत वास करता था  मैने देखा है  बुलंदी को छू  लेते हैं जो  वो शख्स अहम के पाले मगरुर  रहता था  ये गलत धारणा मेरी जो अब खारिज होगी  अपनो को नाराज करना अब ना ये वाजिब होगी  भर के  आकाश तक प्यार  जो लुटाया है  ऐसे एक शक्श को गुंजन की सलामी होगी।।  ©®

कवयित्रियां कैसी होती हैं?

  कवियों पर तो बहुत से हास्य परिहास और वाद होते ही रहते हैं  आज  मेरी ये खास पेशकश कवयित्रियों के लिए है  उत्तराखंड काव्य महोत्सव बुलंदी अंतर्राष्ट्रीय द्वारा आयोजित कार्यक्रम ..... कुछ सवालों का मेरे मन में ना उठना होता गर सहेली ने मुझको रूबरू ना कराया होता मुझको मालूम ना था कवयित्रियां कैसी होंगी महफिलों में अगर शिरकत ना  किया होता ।। उनको जींस टॉप बेहद बेशुमार  जंचता है किंतु कवि महफिलों में सूट साड़ी जमता है गालों की लाली और मुस्कान ये बताती हैं गोटे वाला चमकता दुपट्टा कमाल लगता है ।। महफिलों में वो इश्क मोहब्बत गुनगुनाती हैं अपनी अदाओं से खिलकर खूब मुस्कुराती हैं किंतु नारीशक्ति का खुलकर  समर्थन कर दे तो संजीदे विषयों पर आह  वाह भी ना मिलती है ।। फिर भी नारी शक्ति पर लिखना ना वो भूला करतीं और व्यवस्थाओं कुरीतियों पर बेवाक ही कहती कोई कुछ भी कहे  इनको ना  घंटा फर्क पड़े साहित्य की धरोहर इनसे  ही रक्षित होती।। ©®

दीवाली

  ये त्योहारों का सीजन अग्रिम खुशियां लाता है और ये मशगूल  रखकर वर्क लोड बढ़ाता है लड़कों का काम क्या है पूछे आखिर उनसे भी  साफ सज्जा में कौन कितना  परिश्रम करता है।। जालों से भर गई है दीवारें कोने कोने तक   नींद  आलस्य छोड़े  फुरसत ना है सोने तक  और ये फर्श टाइलें चमके कि  ये जिद ठान लिये  अब तो एक धूल कण मिट्टी जमे ना दीवारों तक।। बचके रहना  पेड़ो और दूध मिष्ठानों से  कोई आसार नहीं कि शुद्ध है घर के खाने से भारी तादातों में है मांग  मिलावट का बाजार घर पर ही बनाना हर पकवान इस दिवाली में।।   भूख के पटाखों में असहायों की पीड़ा  जानी है किसी की जिंदगी गुलजार किसी की पीर घनी है पूछती है ये गुंजन  हे विधाता क्यों ऐसा जगत रचा  किसी का  उजला जहां तो किसी की दिवाली काली है ।। ©®

वीरांगना की मौन पीड़ा

श्वेत वस्त्र उजड़ा घर अंगना चूड़ी बिंदिया उजड़े हैं छमछम थिरके पायल अंगना सूनापन झकझोरे है जिसके प्रित में छोड़ के बाबुल का घर नहीं सुहाए उस वीरांगना अर्धांगिनी के सारे साहस बिखरे है।। ईश्वर से अरदास लगाये प्राण प्रिय की रक्षा हो नंगे पांव चले मन्दिर को चाहें छाले पड़ते हों ख़बरें मिली शहादत की तो गांव नगर भी कुँभलाये बच्चे पूछें पापा ना आये मौन सभी निरुत्तर हों।। आंसू हैं  हुंकार है मानो गर्जन अन्तस् करता है आशाओं का दीपक बुझकर तमस् हृदय में ढलता है सखियों का श्रृंगार देख के फूट फूट कर रोती वो यादों का एक मात्र सहारा उसका दामन भरता है ।। लिखती है ये कलम व्यथा तो अश्क निरंतर बहते हैं जाने कौन से देव धरा पर  सैन्य रूप धर आते हैं सोच के दशा वीरांगनाओं का थर थर कांप रहा है मन दोनों जवानी कुर्बान देश पर गुँजन शीष झुकाती है।। ©® गायत्री शर्मा गुँजन दिल्ली अंतर्राष्ट्रीय साहित्य परिषद क्रमांक 2273

फूलों पर नित भंवरा डोले

  फूलों पर नित भंवरा डोले ,  तितलियाँ आकर झूला झूलें  इन बागियों में उन बागियों में  सब मिल अपनी महक बिखेरें फूलों पर हो इनका  बसेरा  भँवरों  का नित यूं गुनगुनाना  कलरव मधुर मधुर शब्दों की  धूप छांव में डोले हर पल कैसा इनका है ये फसाना ,  भँवरों का बगिया में आना हवा में जैसे इतर बिखेरे  ,  बलखाते मदमाते  डोलें  फूलों पर नित भंवरा...........

आत्मदाह की घातक कल्पना

  आत्मदाह की कल्पना , घातक है जीवन के लिए  खुद के खातिर ना सही तो झोंक दो  ये जीवन जनमानस के लिए यह प्राण मात्र हवा का एक झोंका ही है , देह में समाया हुआ जिसके बिना शरीर स्थूल है , दुनिया की हर खुशी और दौलत शून्य है हर वो ख्वाब जो देखे हैं तुमने कभी पूरे होने को , जद्दोजहद करते हो सपनों के टूटने का दर्द जब झेल नहीं पाते तब होते हो तुम हताश उठो ! इस खामोशी को तोङो  ये जायज नहीं खुद को खोना  अवसाद की आंधियों में बहते जाना , हृदय पर निराशा का भार उठाना कुछ तो ऐसा करो , समेट लो अपनी समस्त ऊर्जा सकारात्मक सोच की ओर वजह तलाशो दुनिया में किसी के जीने की वजह बनो तुम !! 

प्राण बिना शरीर

   भावों के अनेक रूप हैं , क्रोध ईष्र्या प्रेम है विभिन्न रूपों में होती है व्यक्त , बाह्य रूप से हृदय तल् तक एक गहरा प्रभाव डालती हैं कभी आघात तो कभी करुण भाव जगाती ये भाव जाने कैसे गुलजार हैं अभिव्यक्ति का एक एहसास है  जिसके बिना जीवन कुछ भी नहीं , वेदना नहीं संवेदना नहीं  तो केवल  रह जाता है पंचत्व जिसमें कोई एहसास नहीं , मृत शरीर का कोई भाव नहीं अनेक रूपों में व्यक्त ये भावों का दरिया , निज प्राण बिना कुछ भी नहीं।

कवि हृदय में संग्रह प्राण

कोमल कलियों की शाखों में  सृजन प्राण समाहित है वैसे ही एक कवि हृदय में संग्रह प्राण समाहित है उसके दिल के राज हैं गहरे , कोई पहेली  कहता है वही उजागर करता है जो दर्द छिपाए रहता है  पन्ने पन्ने में दिल की बातों से गुफ़्तगू करता है अश्कों की स्याही से दर्द समुद्र बहाने लगता है  कभी आंखों में भरकर सपने कभी नींदों में उचटे ख्वाब शब्दों की सीमाएं तोड़कर हर रिश्ते हर भावों को  एहसास् लिए वह  लिखता है ।

निराशा की तरंगें

  निराशा की तरंगें  मन मे उठने लगे  कोलाहल भरा मंजर जो दिखने लगे प्रातःकालीन  सवेरा को तरसो यदि मन में अंधेरा घर कर जाए गहन और मन ही मन दुख का चित्रण जो होने लगे खोल देना एक कोना उम्मीदों का तुम तो मन मे आशा उमंगे बिखरने लगे।

खुदा की मोहब्बत

ए बंदे तू कब तक गुनाहों से मुंह मोड़ेगा , देख तेरे दिल के कोने में  उस रहबर का कड़ा पहरा है , तोलकर देख अपने गुनाहों का पलड़ा जो नेकी पर भारी है ,  ऐ बन्दे , बदी से तोड़ दे नाता दिदार कर उसका जो तेरे दिल के पर्दे में छुपा बैठा है , किस गफ़लत में सोया है तू  कि दोजख का सफर मौत से होकर तेरे बेहद करीब है , गर चाहता है तू जन्नत ए सुकून तो अपने कौल को निभाने का वादा कर  फिर देखेगा तेरा खुदा बेशुमार रहमत से भरपूर  तुझे दुनिया के झूठे तिलिस्म से महफ़ूज रखेगा उसकी मोहब्बत उसके नेक बंदों के लिए बेशुमार है  तू फिर भी झूठे रिश्तों में खुशियां तलाश रहा  जो तुझे  कफ़न चढ़ाने तक ही साथ निभाएंगे  तब मौत के बाद क् सफर  तुझे खुद तय करना है  जिस्म से रूह निकलने का दर्द ए सितम तुझे खुद सहना है शैतानो क़ी डरावनी आवाजें सुन जब रूह कांप जायें तो  एक बार अपने खुदा को दिल से याद कर के तो देख वो खुद आएगा तुझे ले  जाने जन्नतें मुकाम पर  शर्त  ये  है  कि  तेरी बंदगी सच्ची हो तब  तू खुदा के बेशुमार मोहब्बत से भरपूर पायेगा  उ...

हर पल कुछ नया सा

नगमे नए लिख दूँ कुछ बात मैं कह दूँ  जो राज है दिल में वो राज में कह दूँ शिकवा ना हो कोई ,कोई मलाल ना हो,  दिल के तरानों में संगीत मैं  लिख दूँ कोई कसक ना रहे अरमां नए अपने  जीवन के पन्नो में हर रंग मैं भर दूँ दुनिया की रंजिश में साजिश की बंदिश में  इंसानियत का राग हर सुर में मैं भर दूँ गूंजे कोई नगमा झनकार मैं कर दूँ  काली घटाओं में हलचल नई कर दूँ  जीवन है छोटा सा, खुलकर इसे जी लूँ सुख दुख के बांसुरी में जिंदादिली भर दूँ !! 

तन्हा शाख़ -जीवन लीला

  शाखों से टूटते पत्ते  अब कभी जुड़ नहीं पाएँगे कितना दर्द  सहते है एक डाल पर जो खिलते हैं जीवनभर सुख दुख सहते हैं मृगतृष्णा में जकड़े हैं उम्र के ढलते मुरझा गए हैं बिन टूटे ही  सूख रहे हैं शाख़ रह गया तन्हा तन्हा , भरी उदासी गुलशन में  जीवन लीला खत्म हुई ,उम्मीद लिए नव जीवन का ।।

कलियुग में सतयुग

  अन्याय ,अनीति,दुराचार,जब जब धरती पर ब्यापे मानव दानव बन करके  संस्कारों पर प्रश्न लगाये धर्म गऊ का  का बल घट जाये अन्यायी दल जाग उठे धरकर नर तन ईश्वर इस धरती का मान बढ़ाते हैं जीवों को भय,दारुण दुःख  संसार से तारण आते हैं  सेवा ज्ञान ध्यान सत्संग से भक्त  जनों को कृतार्थ करें  मानव धर्म  का मर्म बताकर सत्य से नाता जोड़ प्रभु  कलियुग में सतयुग लाकर पुनः धर्म प्रतिष्ठा करते हैं ।।

कुदरत

  मौसम के बहार में , खुशियों की फुहार है आग सी लगी जो दिल, फिर भी बेदार है महकते गुलाब सी, महकती ये जिंदगी कुछ नये से ख्वाब से , जिंदगी गुलजार है मोम सी पिघल रही, पीर की घनी सिल्ली आज इन फिजाओं में ,रंगों का बहार है।।

नया साल कहीं खुशी कहीं गम

   नूतन वर्ष की मंगल घङी कुछ क्षण में आ जाएगी जश्न से तोल रहे हम सब कुछ जश्न से कोसों दूर हुए विश्व प्रेम -सौहार्द संगीत कुछ पन्नों में अब सिमट गए कुछ जहन में अपने सिमट गए कुछ निजि हितों नें दुनिया में जब धन से इंसान को तोला तब भ्रष्टाचार ने जन्म लिया नूतन वर्ष की मंगल घङी कुछ क्षण में आ जाएगी जश्न से तोल रहे हम सब कुछ जश्न से कोसों दूर हुए फुटपाथ बना जिनका आशियाना अोढे हुए चादर आसमाँ का निर्वस्त्र पङें कुछ बच्चे यहाँ  कुछ चिथड़े पहने लोग यहाँ कङाके की ठंङ से ठिठुर कर भूख की ज्वाला से तपकर क्या जश्न मनाना संभव है??  नूतन वर्ष की मंगल घङी कुछ छण में आ जाएगी  जश्न से तोल रहे हम सब कुछ जश्न से कोसों दूर हुए!!

चेहरा दिल का आईना

  न जाने कितने एैसे राज छिपे हैं इस जहाँ में ,इमारतों ,खंङहरों धरा के हर एक कोने में इंसान के दिलो में  न जाने कितने........... शक्ल से दिखते हैं चंद्रमुखी बातों से जैसे मिश्री घोलें दिल है जिनका काली कोठरी परखना बहुत कठिन है  न जाने कितने........... पढना चाहो मन के चित्रपट्ट को समझना चाहो इंसानी फिदरत को सुना है चेहरा दिल का राज खोले ठहरो जरा!! यूँ ही एैतबार ना करना न जाने कितने.........

कवि और शायर में फर्क

कवि और शायर में फर्क होता है दिल में दर्द हजारों छुपे हों मगर समझ नहीं सकता ये जमाना उसका दर्द जिसके  चेहरे पर हर पल एक प्यारी सी मुस्कान होती है  कवि भावों को  अनुभूति तथा अंतरमन की वेदना व खुशी को  शब्दों के माध्यम से अलंकृत कर बयाँ करता है  अौर वही शब्द लोगों के लिए एक सुंदर काव्य बन जाता है शायर क्या जाने कविता के स्वर व भावभंगिम भावों को जो कभी चांद तारों को तोङने जहाँ को कदमों में रखने जैसे  शब्दों को बढा-चढाकर पेश करे माना कि गम उसे भी है  बयाँ वह भी कर रहा है लेकिन  एक कवि और उसकी सारगत कविता की तुलना में कोसों दूर है !!

स्वप्नावस्था का चित्रण

    स्वप्न में देखा आज मैने वो अदभुत अदृश्य मंजर तुम खङे थे मेरी राहों मे जब कदम रखा कुछ समझ ना पाई जब तुमने मुझे आदेश दिया उस राह पर चलकर वापस आना भूलकर कहीं भटक ना जाना ये मार्ग बङा ही दुर्लभ है हर शख्स यहां से गुजरता नहीं जिस पर मेरी कृपा दृष्टि है होती सिर्फ वही यहां चल पाता है सचमुच मैं खुश-किस्मत थी जो तुमने मुझे आदेश दिया! बढती चली गई एक बिंदु पर जहाँ पहुंच कर सोचा यात्रा समाप्त हो गई परंतु...... तुमने फिर से पुकारा मुझे और मैं उठ खङी हुई बढती चली गई किचङ गङ्ङढों नालों और संकरी गलियों से गुजरते दुर्गम पथ पर आखिर मैं वापस आ गई तुम्हारे पास जब देखा सन्नाटा पूछा कुछ लोगों से सुना चले गए हैं सभी इस सभा में कोई नहीं मैं कोसती रही खुद को काश बिना विराम लिए बढती चली गई होती! तो शायद तुमसे फिर मुलाकात होती खैर अब वो सलोना स्वप्न टूट गया होश आया तो फिर समझ गई वो मेरे खुदा का भेजा पैगम्बर था जिसने मुझे खुदा के करीब लाना चाहा और मैं अनजानी राहों में बस बाधाओं से घिरती गई काश ये स्वप्न हकीकत होता तब मृत्युपरांत का ये अनुभव मैं हकीकत में बयाँ करती!!!

स्वतंत्र भक्ति

जब मैं सिर झुकाती हूँ तेरे दर पर मुझमें आत्मिक चेतना जाग उठती है जैसे कोई निर्जीव पौधा पुन: जिवित हो उठा आभास ही कुछ एैसा है कि वाणी और स्वर दोनो मंत्तमुग्ध हो गए नतमस्तक हूँ मैं तेरी उदारता देख दुर्भाग्य है उनका जो हंसते हैं तुझसे प्रेम करने वालों पर......!!

कविता लिखी नहीं जाती

  कविता लिखी नहीं जाती वह तो स्वत: ही लिख जाती है भावनाएँ व्यक्त नहीं की जाती वह स्वमेव व्यक्त हो जाती हैं समाज की दिशा तय नहीं की जाती वह पहले से ही निर्धारित होती हैं प्रेम किया नहीं जाता जीवन की राहों में असमय प्रेम हो जाता है जीवन काटा नहीं जाता बल्कि मुश्किलें जीना सिखा देती है जहर पिया नहीं जाता बल्कि दो कङवे बोल विष पिला देते हैं नम्रता सीखी नहीं जाती यह हमारे अंतर्मन में कस्तूरी सी छिपी होती है महान बनने की कोशिश की नहीं जाती  अक्सर हमारे अच्छे कर्म हमें स्वत: ही महान बना देते है  मैं फिर से यही कहूँगी कि कविता लिखी नहीं जाती  वह तो स्वत: ही लिख जाती है....!!

स्वार्थ के वशीभूत प्राणी

   स्वार्थ वशीभूत होकर जब तुम ठोकर औरों को देते हो अपने सुख -सुविधा के हेतु दया धर्म सब भूल गए जाने क्यों इन क्षणिक सुखों को स्थिरता से जोङ दिया मत भूलो एक दिन सब कुछ इस धरा पर ही रह जाएगा जिसकी सुख सुविधा के हेतु जमा किए सामान सभी उसने ही तुम्हे घर से निकाला लाचार बना ये जीवन है  तुम खुद सोचो जो कर्म किया बेटे को भी वही सीख मिली आज तुम्हारी जो दशा बनी है उस कर्मफल का भुगतान करो स्वर्ग नर्क है इसी जहाँ में मरणोपरांत का क्या कहना? जैसी करनी वैसी भरनी सत्य है यह असत्य नहीं!!

विधाता पर प्रश्न चिन्ह

  आखिर क्यों कुछ प्रश्न हैं एैसे जो हृदय में शूल बन चुभ रहे क्यों नमन करते हो तुम उस विधाता को जिसने  जीवन का  एक अनमोल उपहार दिया  क्यों कोंसते हो तुम उसे जब दुखों की बिजली गिरती है  और हृदय पीङा की गर्जन से तब हाहाकार मचाते हो  क्यों आभार प्रगट करते हो जब कुदरत की गोद में लेटे  तुम स्वयं को आनंदित पाते हो क्यों रूसवाई दिखती है जब गरीबी दरिद्रता के सागर में मानव जीवन तिल -तिल मर रहा होता है क्यों दोष देते हो उसे जब तुम अपनी हार को  जीत में बदलने में अक्षम होते हो  क्यों फूले नहीं समाते जब मनचाही इच्छा पूरी हो जाए और  हृदय के अनंत तलों से उसका आभार प्रगट करते हो  फिर क्या ये संभव नहीं कि हम उस विधाता के प्रति  अपनी ङांवाङोल प्रवृति छोङ एकनिष्ठ भाव कायम कर सकें !!!

झूठी फिदरत

 जब दबे हुए हो झूठ तले फिदरत कैसे बदलोगे तुम नफरत की मिनार खङी करके क्या सुकून से जी पाअोगे तुम वंचित वर्गों का अहित करके क्या अपना हित कर पाअोगे माना कि झूठ नहीं छिपता जब सच से वह टकराता है फिर भी क्यों कहते रहते हो मैं नख से शीष तक सच्चा हूँ जब दबे हुए हो झूठ तले फिदरत कैसे बदलोगे तुम!

दौलत पर गुमान कैसा?

   बहुत बङी है दुनिया यारों हम सब एक छोटे से कण हैं कितने आए कितने गए हैं इतिहास गवाह बना है क्यों करते हो गुमान तुम इतना  क्या साथ ले  जाओगे अपनी अशर्फियाँ  मिट जाते हैं वजूद यहाँ  दौलतवालों की बिसात ही क्या  बहुत बङी है दुनिया यारों हम सब एक छोटे से कण हैं!! 

अभिव्यक्ति को समेट लूँ

  कुछ क्षण के लिए सोचती हूँ कि अपनी अभिव्यक्ति को समेट लूँ विचार व्यक्त ही ना करूं परंतु............. विचार और अभिव्यक्ति ही हमें जीवन के हर पहलू से अवगत कराते हैं  जीवन जीने की कला सिखाते हैं भावनाएँ व्यक्त कर विचारों का आदान प्रदान करते हैं एवं नवीन विचारों का सृजन करते हैं  तो कैसे मैं अपनी अभिव्यक्ति को समेट लूँ कदापि नहीं .... ............ यही तो पशु एवं मनुष्य में अंतर करना सिखाते हैं असभ्य से सभ्य समाज की ओर मोङते हैं  बुराई से अच्छाइ की ओर हम निरंतर गतिशील रहते है ये विचारों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति का ही प्रभाव है  जिससे सुंदर साहित्य जगत का निर्माण हुआ!!

लेखनी की नवीनता

   सिमित शब्द है जोङ कर जिनसे लिखते हैं हर रोज नया हम सब अपने किस्सों को जिवन के हर हिस्से को भूत भविष्य वर्तमान को सिमित शब्द हैं जोङकर जिनसे लिखते हैं हर रोज नया दर्द से भरी दास्तानों को खुशियों की सौगातों को सपनो से सजे अरमानों को सीमित शब्द हैं जोङकर जिनसे लिखते हैं हर रोज नया कोयल सी मीठी तानों को अश्रु के बहते सागर को कुछ कही अनसुनी बातों को सिमित शब्द हैं जोङकर जिनसे लिखते हैं हर रोज नया!!

आत्म मंथन

  मेरा मन बार बार मुझसे प्रश्न करता है मै उदास क्यों हूँ आत्मा ने कहा तुम अहंकार वशीभूत हो गए हो परंतु मन मानने को तैयार नहीं देखती हूँ समाज में दुष्प्रवृतियों को जो निरंतर मानव को पथभ्रष्ट कर रही हैं आज अपनो ने अपने ही अस्तित्व को भूला दिया लगता है इहलौकिक से अलौकिक जहाँ बेहतर होगा   हमारे ही तुच्छ विचारो ने अपनत्व को भुला दिया  अगर हम खुद  को कभी ज्ञानवान ना समझें और सदैव जिज्ञासु बनकर रहें तो सम्भव है  ये दुष्प्रवृतियां स्वत: ही नष्ट हो जाएँगी!

राजनीति के जादूगर

  राजनीति का जादू देखो करदे सबकी नींद हराम खेल दिखाए नेता लोग जनता बिचारी हुई बावली देखो गली में जादूगर आया करतब दिखाकर खूब लुभाया जिसनें जितना अच्छा खेला सबसे ज्यादा उसनें लूटा अरे मुर्खों कुछ तुम भी सोचो भैंस नहीं है अक्ल बङी है जादू की छङी इन्हे ना समझो पासा कब ये उल्टा कर दें ना तुम जानो ना हम जानें कोई ना जाने काला जादू कश्मीर हो चाहे पाक विवाद देश में हो गर आंतरिक कलेश जादू की छङी को तुरंत घुमाओ हो गइ समस्या सब छू मंतर

बैसाखी पर्व (गुरु का सहारा)

  सलाँ दी मुक गई राखी,ओ जट्टा आई वसाखी। गुरू गोविंद सिंह जी ने वैसाखी पर खालसा पंथ की नींव रखी बैसाखी उल्लास का दो कारण फसल कटाई का उल्लास नानक की साधना याद आई हरियाली से आच्छादित प्रकृति ग्रामीण जीवन में समृद्धि लाई आज के दिन दशम गुरू गोविंद सिंह नें खालसा पंथ की नींव रखी तब जान न्यौछावर करने की सिक्ख भक्तो को सर देने की बारी आई पांच शिष्य ही सामने आए जो पंच प्यारे कहलाए  तब गुरू गोविंद सिंह ने इनको अमृत चखा कर शिष्य किया  "प्रगट्यो मर्द अगमण वरियाम अकेला वाह वाह गुरू गोविंद आपै गुरू आपै चेला"  याद करें हम इस घटना को सिक्ख धर्म में बैसाखी के आध्यात्मिक महत्व को जानें  "बैसाखी "अभिप्राय " सहारा" अपंग पुरूष जिसके सहारे चलता है आध्यात्म दृष्टि से देखो तो गुरू ही अपणा सहारा है अध्यात्म ज्ञान के बैसाखी से भवसागर तरन की बारी है गुरू गोविंद सिंह ने भक्तो को नेकी पर चलने की शिक्षा दी स्वाधीनता संग्राम में जब 13 अप्रैल 1919 को जलियाँवाला बाग मे रौलट एक्ट का विरोध किया तब जनरल ङायर ने निहत्थी भीङ की हत्या करवाया अंग्रेजी सरकार के नृशंस कृत्य पर पूरे देश नें निंदा क...

जीवन एक पहेली

 जीवन की पहेली धूप छांव से आच्छादित यह जीवन एक पहेली है तरूवर नदियाँ सागर अंबर सबकी यही कहानी है प्रकृति आभूषण बन करके निज वसुधा का श्रृंगार करें राह थके पथिकों के लिए प्रकृति आश्रय स्थान बने पक्षियों का मधुर कलरव सुरों का संगम बन जाए हर्ष शोक व्याकुलता भूलकर पथिक प्रफुल्लित हो जाएँ धूप छांव से आच्छादित यह जीवन एक पहेली है

पॉलिटिक्स एक षड्यंत्र कला

   पॉलिटिक्स   पॉलिटिक्स   पॉलिटिक्स   जिधर देखो उधर  पॉलिटिक्स  ओह ये क्या स्कूल में  पॉलिटिक्स  प्रशासन में  पॉलिटिक्स  नेताओं में  पॉलिटिक्स , घर घर में  पॉलिटिक्स  दौलत के लिए बेटे का  पॉलिटिक्स ,  बूढे माँ बाप को तीर्थ  यात्रा भेजने का  पॉलिटिक्स  हर रोज बने नई योजनाएँ ,ओह ! रिश्तो में भी  पॉलिटिक्स   अब क्या कहें लगता है जैसे षङ्यंत्र है  पॉलिटिक्स   नहीं ये कहना गलत होगा..... जिंदा है हर दिल में एक अच्छा इंसान  जुल्म के खिलाफ जो करे इंसानियत की बात हर क्षेत्र में होते हैं  बेहतर से बेहतर इंसान गलत नही है राजनीति गलत नहीं षङयंत्र  राष्ट्र हित के लिए किया गया हो गर कोई षङ्यंत्र  जुल्म को मात देने का ,दुश्मन को परास्त करने का !  समझ गए हम राजनीति समझ गए षड़यंत्र  हर पहलू से देखें तो यह केवल षङयंत्र नही ,  जीने की "कला" है राजनीति।

दर्द की जुबाँ

  दर्द की जुबान नहीं होती महसूस कर देख लो तुम गमों को  काँच की तरह बिखर जाओगे क्या खुद को संभाल पाओगे तुम ?? दर्द कभी बयाँ नहीं होता रूदन स्वर से चीँख उठता है दिल कुरेदकर देख लो तुम जख्मों को नासूर से वह कम नहीं होता !!. 

ग्रामीण परिवेश

  ग्रामीण समाज नया परिवेश  गाँवो का वो मनोहर दृश्य आज प्रत्यक्ष अनुभव से जाना  हमारे शहर और यहाँ के लोग अंतर जमीन आसमान का है  लोग अजनबी हैं मेरे लिए परंतु शहरों से काफी अच्छे !   जो खूबियाँ है यहाँ के लोगो में ग्रामीण सहयोग प्रेम और सौहार्द  आज शहरों की चकाचौंध में दफन है समय के अभाव में रिश्तों में बढती दूरियाँ  यही है हमारे शहरों की खूबियाँ बढ रही हूँ मैं निरंतर अंजाने ङगर पर चल  मीठी यादें स्मृतिपटल में संजोए इस बार भी "एक नया अनुभव" !

भक्ति के मनके

   जब याद तुझे करती हूँ मैं गुणगान स्वयं हो जाता है वो खुमार है तेरे नाम का प्रभु मेरा मन शीतल हो जाता है झूठे प्रपंचो में फंसकर भटकाव भरी इस दुनिया में  कुछ पल भक्ति के मनकों को यह अंतःकरण सहेजे है मिल जाएगा तूँ सहज उन्हें जो भाव हृदय का शुद्ध करे हृदय के पट को खोल प्रभु तेरा नूर हृदय में दिखता है दुखों की बदली छट जाए साक्षात्कार जो  हो जाए तुझे करूण हृदय से पुकारूँ तो झंझावट दूर हो जाते हैं तेरी कृपा को पाकर हे प्रभुजी  मेरा भाग्य उदय हो जाता है जब याद तुझे करती हूँ मैं गुणगान स्वयं हो जाता है

आत्मा का अविनाशी धाम

  मन की चंचलता खो देती है एकाग्रता खिंचाव इस जहान का  दूर करती है प्रभु से ! आत्मा तब कैद होकर मन के आगे हारे! सत्य असत्य का भेद बताए , वही बेबस हो  मन के आगे मन के वशीभूत होकर जीव सत्य से  विमुख हो जाता है हरि चर्चा नित सुनकर प्राणी आत्मजागृति पुनः करे अनहद धुन को श्रवण करे  खुद में खुद को पा तृप्त रहे देख नजारा अन्तस् आत्मा  समाधिष्ठ हो जाती है  तब ये चंचलता अंधेरा मन से झट टल जाता है अपने प्रियतम को पाकर आत्मा शुद्ध जो हो जाये तब  तोङ के नाता जमाने से अविनाशी धाम को जाती है।।

मुश्किल राहों की सौगातें

  कठिन मेरी उन राहों को तुम सरल कभी मत करना बस इतनी शक्ति मुझे देना मैं कठिन परिश्रम के द्वारा आशीश तुम्हारा पाकर उन राहों पर चल पाऊँ माना कि बहुत कठिन जीवन हर पल प्रतिक्षण मुश्किल पल है पर सुख दुख आना जाना है गीता का सार यही है इस सार को समझ सकूं मैं बस इतनी शक्ति मुझे देना आखिर इन राहों पर चलकर बिरले ही महापुरूष कहलाया!

नश्वर जगत से अमरता की ओर

    हम कौन हैं हमारा अस्तित्व क्या है क्या कभी सोचा है जो आज हमारे अपने हैं जीवन से जुङा हर पल एक रिश्ता है हमारे गमो मे उन्हे भी बेचैनी है जो नहीं चाहते हमसे बिछङना ना हमने कभी चाहा उनसे जुदा होना ये कैसा खेल है कुदरत का सृष्टि का ये नियम कैसा जिसके आगे हमें झुकना ही है जो आया इस संसार में उसे एक ना एक दिन जाना ही है नहीं रोक सकते हम उन्हे जाने से जो आज हमारे अपने हैं ना वो हमे रोक पाएंगे अंतिम यात्रा से फिर क्यों आए हमारे जीवन में क्षणिक खुशियां लेकर कभी माँ पिता भाई बहन व सगे संबंधी बनकर अब ये कुटुंब भी खाली ये जीवन भी सूना अंतकाल अब पछताना क्यों है ये शरीर भी जीर्ण हुआ जिजीविषा भी खत्म हुई काश एक ऐसा लोक होता जहाँ कभी भी जन्म मरण न होता !  कौन जाने उस धाम को पाने का मार्ग ? ? ?  जहाँ पहुंचकर दुख, संताप विरह, वेदना से निजात मिल जाता  एवं पुन: चिरस्थायी रिश्तों से हमारा संबंध जुङ जाता!

शिक्षक दिवस पर

  बचपन बीता खेल खेल में दोस्तों के संग धूम मचाना आज भी वो पल याद है होम वर्क पूरा न करने का हम रोज नए बहाने ढूंढते स्कूल में टीचर घर में माँ दोनो मिलकर ङंका बजाते तब हम प्यारे मासूम बच्चे रूठकर उनसे बात न करते अधूरे काम को पूरा करते मौका पाकर फुर्र हो जाते नील आसमाँ की ओर दौङते बचपन की वो धुंधली यादें जहन में आज भी जिंदा है विद्यार्थी और शिक्षक का देखो कितना गहरा रिश्ता है आओ मिलकर आज सभी अपने गुरूजनों को याद करें उनके प्रदत शिक्षा पर चलकर हम नित्य निरंतर बढते जाएँ

सद्गुरु की शरणागति

  जब दर्शन तेरा होता है मन करता है थम जाए पल दीदार तुम्हारा करती रहूँ जिस पल में तूँ साक्षात खङा मेरे चेतन सदगुरू का दीदार हुआ मेरे नयनो को सुकून मिला गीता के कर्म व भक्ति योग का सर्वस्व पुण्य यहाँ प्राप्त हुआ सतयुग आया त्रेता आया द्वापर तक कठिन तपस्या थी अब कलियुग में अवतार हुआ मेरे हंस प्रभु का शुभागमन अब जप तप साधन सरल हुआ जो समझ गया वो कृतार्थ हुआ मैं करूण हृदय से नमन करूं तूने जन मानस को जगा दिया तूने जन मानस को जगा दिया॥

मन और आत्मा का वार्तालाप

   मैं उदास क्यों हूँ? आत्मा ने कहा तुम स्वार्थ के वशीभूत हो गए हो परंतु मन मानने को तैयार नहीं है देखती हूँ कुछ दुष्प्रवृतियाँ जो निरंतर मानव को पथभ्रष्ट कर रही है हम अहंकार के वशीभूत होकर स्वयं को अधिक ज्ञानवान मान लेते हैं ये अहम ही पतन का कारण बन जाता है सोचती हूँ काश हम सदैव ही जिज्ञासु बनकर रहें तब खामियाँ दुष्प्रवृतियां स्वत: ही समाप्त हो जाएँगीं!

कृष्ण

बाल रूप मोरे मन भावा अति सुंदर मनमोहन प्यारा मनमोहक तेरी छवि निराली बंसी की धुन वो कदंब की ङारि बाल- ग्वालों संग झुंङ बनाकर नंद की नगरी में उधम मचावे निगुणा भी तेरा रूप निहारे माखनचोर पर बलि बलि जावे

मानव के अहंकार के पर्दे

  देखो अहम के पर्दे हो गए कितने मोटे मैं ही मैं की ध्वनि सुन रहा हर कोई मैं हूँ सबसे दौलत वाला मैं हूँ सबसे शौहरत वाला मैं दुनिया में हूँ महा दानी मेरे मैं मैं की चर्चा हर दिशा में फैली है और सुनता हूँ जब मैं की चर्चा मन ही मन इतराता हूँ मैं ङाक्टर हूँ मैं इंजीनियर मैं अधिवक्ता मैं वाचक हूँ मैं लेखक हूँ मैं नेता हूँ मैं ही मैं सबकुछ मैं हूँ ओह ये क्या?  अहंकार के पर्दे देखो? सचमुच हो गए कितने मोटे  चला गया तूं इस दुनिया से राग अलापे मैं मैं करते  काश ये  समझ लेता अभिमानी मैं का पतन बहुत दुखदाई! मैं=अहंकार/अहम

दशहरा पर्व

  दशहरा खुशी का पर्व जिस दिन खुल जाते हैं मुक्ति के दस दरवाजे ,दस रावण छिपा बैठा मानव तन के भीतर ,आज चहुं ओर दिशा में रावण का प्रतिबिंब जले , खुशी से हम झूम उठे छण भर के आतिशबाजी मे, ध्वस्त हुआ रावण प्रतिमा वाह कितना आसान लगा,  रावण के प्रतीमा को मिटाना काश इतना ही आसान होता, हमारे अंदर छिपे आवेश द्वेष घृणा और अहंकार का रूप, उस रावण को मिटाना!

नारी ही नारी की दुश्मन

देश आजाद है ,लोग आजाद है दिमाग से नहीं अपितु शरीर से आज़ाद हैं दलित नहीं, निम्न नहीं , उच्च नहीं, हिंदू नही मुस्लिम नहीं,अपितु  हर वर्ग  हर स्त्री समाज में दोयम दर्जे को जी रही शोषण का शिकार होकर लैंगिक उत्पीङन दहेज के विरूद्ध घरेलू हिंसा का शिकार ये पुरूष प्रधान समाज या किसका है गुनाह आज स्त्री ही स्त्री को शोषित करती है मां का दर्जा पाने वाली सास बेटे के बंट जाने के ङर से अपनी ही पुत्रवधू को प्रताङित करती है कुछ कीचड़ सभ्य सास,महिलाओं पर भी उछलता है  क्योंकि बेकसूर होकर भी इसी गुलाम समाज का हिस्सा हैं  बहुत भयानक है यह सामाजिक दृश्य जिसमें  कोख में पल रही नन्ही जान को अपनी ही पोती,बेटी, को मेट ङालती है एक नारी ही नारी पर कहर ढाती सिर्फ पुत्र की लालसा में जो आज विकृत रूप ले चुका है  तब  शरम से झुक जाता है सिर और सभ्य समाज का ढोल पीटने वाले आज भी सभ्यता  का  ताज पहने बैठे हैं  वाकई हम कैसे कह दें कि हम गुलामी से  आजाद हो गए हैं !!

वृद्धावस्था

 टिमटिमाता सा इक तारा  स्वांसो की ङोर थामे हुए अनेक आशाएँ मन मे लिए  जीवन जीने की चाहत अपनों का साथ पाने को  बिखर रहे अरमान उसके परंतु कौन समझ पाता  हसरतें वो चाहतें अधूरी काश वह कुछ कह पाता  चाहतें जाहिर कर पाता जीवन की ङोर टूटने को था  साथ जहाँ से छूटने को था परंतु उसे जाने का गम नहीं  वह जान गया कोई अपना नहीं अकेला है अकेला ही चला  अंतिम समय सभी ने देखा टूटता हुआ इक मूक सा तारा। 

मगरूर लोग

  नफरत नहीं करते हम उनसे जो  दूसरों को नीचा दिखाते हैं अपने पद के गुरूर में जीते हैं वो और  दूसरों को मगरूर देखना नहीं चाहते फिर क्यों कर बैठते हैं गुमान वो  जिनका गुरूर हम तोङना नही चाहते बङे बदनसीब हैं वो लोग जो  प्यार से दिल जीतना नहीं जानते॥

सब बन्दे तेरे

   किसका नाम लूँ किसे बदनाम करूँ सभी तो तेरे बंदे हैं चाहे अच्छे या बुरे हैं जो भी हो तू कितना उदार है हम सब पर तू कितना मेहरबान है एक अच्छाई ही देखता है तूँ हजार गलतियाँ माफ करता है तूँ तुझ सा इस जहाँ में कौन होगा जो इतना उदार और विनम्र होगा फिर ये क्यों ना सोचूँ कि मैं किसी को माफ करूँ॥

बिखरे सपने

    सपने हजार बनकर आँखों में उतर जाते हैं सच करने की ख्वाहिश में खुद को ही भूला देते हैं मेहनत के दम तकदीर बने नियति के वश क्या रखा है कर्मों की शम्मा जब जलती है जीवन को रौशन करती है दौङ है ये जिंदगानी अगर रूक जाने का ङर क्यो रहता है क्यों टूटे बिखरे सपनो संग कोई शख्स जहाँ से चल बसता है

स्वार्थ वशीभूत

स्वार्थ वशीभूत होकर जब तुम ठोकर औरों को देते हो अपने सुख सुविधा के हेतु दया धर्म सब भूल गए जाने क्यों क्षणिक सुखों को स्थिरता से जोङ दिया मत भूलो इक दिन सब कुछ इस धरा पर ही रह जाएगा जिसके सुखी जीवन के लिए जमा किए सामान सभी उसने ही तुम्हे घर से निकाला लाचार बना ये जीवन है तुम खुद सोचो जो कर्म किया पुत्र को भी वही सीख मिली आज तुम्हारी जो दशा बनी है उस कर्म फल का भुगतान करो स्वर्ग नर्क है इसी जहां में मरणोपरांत का क्या कहना जैसी करनी वैसी भरनी सत्य है यह असत्य नही

संघर्ष की राह पर

    आँखो से बहते पानी का हमको भी मोल बता देना सरिता के शीतल धारा का स्पर्श करो तो बता देना सूरज की किरणों को देखो गर नजरें टिके तो बता देना जीवन की राहों पर चलकर कांटे ना चुभे तो बता देना

कवि हृदय का कोमल कोना

  सुना है मैने कविहृदय में कोमल मृदुल कोना होता है दिल की बात सहज ही वह पंक्तियों में बयाँ करता है खट्टी मीठी हर लमहों को हृदयपटल में संजोता है जीवन की यात्राएँ सभी और व्यथा हर इंसान की विधाता की सुंदर रचना शब्दालंकार बयाँ करता है कोमल कोमल भावों का वर्णन जाने कैसे करता है जिस भी रूप मे जैसा चाहो वैसा ही वह ढल जाता है!

मन से कभी ना हारो

   अपने प्रयास को हार मत बनने दो तुम नगीना हो अपनी चमक बिखेरो समाज ने बहुत कुछ दिया है तुम्हे तुम युवा हो अपनी शक्ति को पहचानो घिरकर बाधाओं से भी मन से कभी ना हारो यही समय है कुछ करने का पर्मार्थ के लिए तप करने का अपने वेगो को मोङो तुम प्रयास विफल मत होने दो मंजिल मिल जाएगी तुमको संकल्प हृदय मे कर लो तुम।

पापी में है प्राण हरि का

  भेदभाव की सीमाओं को पार करूँ बढते जाऊँ नफरत ना हो दिल में मेरे इस बात को हर पल याद रखूँ नदियों में पत्थर मारो तो शिकवा गिला नही करती है जो आए उसके तट पर वह सबको शीतल कर देती है मैं भी विधाता शीतल बनकर जीवन को  सहज जीना सीखूँ विष समान शब्दों को सुनकर पलटवार ना तीर चलाऊँ जाना है तुझसे हे विधाता पापी से भी पापी नर में जीवन प्राण तुम्हारा है

हार ना जाना

  दर्द का समंदर गर भरा हो तेरे सीने में अपना दर्द किसी से भी बयाँ ना करना दुनिया में नमक छिङकने की आदत है यही दस्तूर जमाने की जाने किसी को क्या मिलता है व्यंग्य कटाक्ष से दुनिया में टूट गए हौंसलो के पर तो परवाह नहीं कोई करता है जीते जी गर टूट गए तो हार जाओगे दुनिया से सफर बहुत अभी लंबा है अभी ना थकना राहों में अपनी मंजिल को पाने का जत्न करो अभी दुनिया में मत होना मायूस कभी भी अंधियारों में भी जलना बनकर एक आशा का चिराग दुनिया को  रौशन करना

धूप छाँव सा जीवन

   धूप छांव से आच्छादित  यह जीवन एक पहेली है तरूवर नदियाँ सागर अंबर  सबकी यही कहानी है प्रकृति मनोहर बन करके  निज वसुधा का श्रृंगार करे राह थके पथिकों के लिए  प्रकृति आश्रय स्थान बने पंछियों का मधुर कलरव  सुरों का संगम बन जाए धूप छांव से आच्छादित  यह जीवन एक पहेली है

जीवन एक पहेली है!

   जीवन एक पहेली है जिसमें सतरंगा बचपन है खेल कूद की उम्र ये कैसी नासमझी की कहानी है जीवन एक पहेली है... बुलबुला पानी जैसी जवानी इतराने की उम्र निराली दिन ढलते ढल जाना है जीवन एक पहेली है... वृद्धावस्था की ये कहानी घर घर की मजबूरी है शाख से पत्ता टूट गया अब मुर्झाने की बारी है जीवन एक पहेली है...

हर रास्ते अनजाने हैं

हर रास्ते अंजाने हैं हर मोङ पर कटिनाई है किससे कहें हम कहाँ जाए जीना बङा दुष्वार है जिन रास्तों पर तूँ चला हमको भी ऐसा ज्ञान दे चलकर जहाँ के पार हम निज धाम पहुंच जाएँ प्रभु आशा की लौ जलने लगी इच्छाएँ सब मिटने लगी दुख दर्द की काली घटा धिरे धिरे छटने लगी नफरत लिए कैसे जिएँ तुम प्रेम से सींचो हमें देकर के अपना आशीष अब भव पार कर देना हमें।।

अंतरात्मा की आवाज़

   जाने क्यों ऐसा लगा खींच रहा है कोई मेरे मन की ङोर दिल पर काबू नहीं सोच भी प्रभावित हुए बिना नहीं जैसे लगता है कोई प्रभाव छोङ गया हो हर पल खुद को गिरते और संभलते हुए पाया एक नई दिशा की ओर मेरे कदम निरंतर बढते गए तब मुझे एहसास हुआ वह कोई और नहीं जिसे मैने अनदेखा व अनसुना किया बल्कि मेरी ही अंतर्आत्मा की आवाज थी

समानता किताबों में ही क्यों?

  शालीनता का पाठ पढाया जाता है अनुशासनहीनता पर लगाम लगता है झूठे मर्यादाओं की बेङियो में जकङी पितृसत्तात्मकता की चपेट में घिरी नारी उसी शालीनता के साथ वह पूछती है रूढीवादिता पर विनम्रता से प्रहार करती है ङाल दो बेङियां उन बेटों के पैरों में जकङ दो उनकी आजादी को घेरो में ये आजादी तानाशाही ना बन जाए लगाम लगा दो ऐसे परों को उङने में समानता की बातें किताबो में ही क्यों रखें हकीकत का अमलीजामा पहनकर तो देखें॥

अल्फाजों के मोती

   मेरे शब्दों को लयबद्ध ही रहने दो पंक्तियों की लङियों में मैने हर एक फूल सजाए हैं बहते अश्कों के कतरों से हृदय में शूल लगाए हैं गम के बादल खुशियों के पल दोनों का पुष्प लगाया है कांटों के सफर फूलों सी महक स्मृति में अपने संजोए हैं मेरे मनोभावों का रूप स्वत: मुझको ही तय कर लेने दो कुछ व्यक्त करूँ अव्यक्त रखूं कुछ भावों को मैं गुप्त रखूं जो कहना है वह कह ङालूं मत भार हृदय में रहने दो मुझे मेरे ही मनोभावों में मेरे शब्दों को परिणत होने दो वो भाव जो हर प्राणी में छिपा जो मेरे वेदन से है लिखा उन भावों को सृजित रूप देकर साहित्य धरा पर बहने दो

त्योहारों का मौसम

त्यौहारों का ये मौसम जाने कितने गम दे जाता है धरती अंबर के चादर में कुछ सिसके फूल हैं मुर्झाए से चिथङे वस्त्र लपेटे तन पर पेट की ज्वाला दहक रही है रहने को भी नहीं ठिकाना गली चौराहें बने बेगाने ऐसे में क्या होली दिवाली वंचित वर्ग मना पाएंगे।

मनुष्य का अस्तित्व

  बहुत बङी है दुनिया यारों हम सब एक छोटे से कण हैं कितने आए कितने गए हैं इतिहास गवाह बना है क्यो करते हो गुमान तुम इतना क्या साथ ले जाओगे अपनी अशर्फियाँ मिट जाते हैं वजूद यहां पर दौलतवालों की बिसात ही क्या बहुत बङी है दुनिया यारों हम सब एक छोटे से कण हैं

नगमे

  नगमें नए लिख दूं कुछ बात मैं कह दूं जो राज हो दिल में वो राज मैं कह दूँ शिकवा ना हो कोई, कोई मलाल ना हो दिल के तरानो में जिंदादिली लिख दूँ कोई कसक ना रहे अरमाँ नए अपने जीवन के पन्नो में रंगों को मैं भर दूँ दुनिया के रंजिश में साजिश के बंदिश में इंसानियत का राग हर सुर में मैं भर दूँ गूंजे कोई नगमा झंकार मैं कर दूं काली घटाओ में हलचल नइ कर दूँ

उम्मीदों का रंग

  आशाएँ एक नई उमंग संग जीवन में रंग भरना चाहे अपूर्ण प्रतीत हों मेरे सपने उन सपनों को साकार करे हर पल कोई साथ निभाए अदृश्य रूप में विश्वास बनकर जिसके सहारे हर एक राही मंजिल को पा जाए आशाएं एक नई उमंग .... उस लीलाधार की महिमा को कोई बिरला ही पहचाने जो दुखों की बदली हटा दे दुश्मन को जो हितैषी बना दे विश्वास बनाए रखनाउसपर जो अंग संग परछाई बनकर हर पल साथ निभाए आशाएं एक नई उमंग.....

जुगनू

  जुगनू भी जाने कितने कमाल करते हैं अंधेरी रातो मे हमें गुमराह करते हैं ले जाते हैं दूर कहीं घनघोर घटाओ में छोङ अकेला साथ हमारा गुम हो जाते हैं पलक झपकते आखों से ओझल हो जाते हैं ऐसा लगता है मानो हमें राह दिखाते हैं

होली पर्व

  त्यौहार हमारे जीवन में हर साल ही आते जाते हैं संदेश कोई दे जाते हैं हमें याद सदा दिलाते हैं होलिका का असफल प्रयास प्रहलाद की याद दिलाते हैं दिलो के बीच दूरियों को सब भूल गले लग जाते हैं विविध व्यंजनों से थाल सजा हम मंगल खुशियाँ मनाते हैं

हृदय की विशालता

  दिल का साम्राज्य बेहद विशाल जैसे उछाल पाती समंदर की लहरे चंचलता -स्नेह व व्याकुलता भरा प्रेम और विरह के योग से बना अनगिनत भावनाओं का संयोजन यही है इस दिल के होने का प्रायोजन यह मानव हृदय पल पल ऐसे टूटता है  एकाएक सेमल पुष्प वृक्ष से जैसे गिरता है  जीवनपर्यंत घात- आघात को पाकर फिर भी रहता है हृदय विशालतम् ॥

पुष्प तेरी परिभाषा क्या है?

  पुष्प तेरी परिभाषा क्या है जीवन की अभिलाषा क्या है नित्य निरंतर बढते हुए भी खुद में इतना निखरता क्यों है पुष्प तेरी परिभाषा .... ङाली पर जो तेरा बसेरा है कीमत इतना महंगा क्यों है सुंदरता पर बहुत इठलाता गिरकर खाक में मिलता क्यों है पुष्प तेरी परिभाषा... कांटो पर है तेरा बसेरा इत्र से तेरे निर्मल काया अच्छे बुरे कर्मो में समर्पित जाने तूं इतना बेबस क्यो है पुष्प तेरी परिभाष... ङोली और अर्थी की सेज पर तूं ही सबको भाता क्यों है तेरा जीवन नहीं है तेरा आत्मसमर्पण करता क्यूं है पुष्प तेरी परिभाषा क्या है।

रहमतों का पैगाम लिखूँ

  जो महसूस करता है दिल मेरा वो एहसास मैं लिख दूं पल दो पल के लमहों को पन्नो में लिख दूं स्मृतिपटल पर उकरे भावो को लिख दूं ऐसा कोई जतन कहां तेरी खुबियां लिखूं सुर भी तू संगीत भी संगम तेरा लिख दूं त्रिवेणी की धाराओ में एकत्व को लिख दूं शब्दों की सीमा तोङकर अंतस  भाव लिख दूं तेरी ताकत के आगे नतमस्तक ये जहां लिखूं  तूं बेमिसाल है इस जहां मे दरिया सा दिल तेरा लिखूं ये औकात तो मेरी नहीं तेरे विस्तार को लिखूं जहां के कण -2 में तेरा नाम लिख दूं तुझे उन नेक फरिश्तो में खास लिखूं इंसानियत के खातिर मरने वालो के लिए तेरी रहमतों का सुंदर पैगाम लिख दूं

सावन गीत

मेघा बरसे सावन आयो झूम-2 गाए मोरा मनवा कोयल गाए मोर पहीहा कू कू कू कू सा रा रा रा... बादल गरजे बिजली चमके धरती झूमे अंबर झूमे बादलों की ओङ मे ङोले सतरंगी पंखो की उङाने कोयल गाए........ रूत है सुहानी दिन अलबेला ठंङी -ठंङी मंद हवाएं मन के उपवन को महकाए वादियो में घुल मिल जाए कोयल गाए...... मदमाती ये मस्त हवाएं ङोल रही है शोर मची है बरखा की ये ठंङी बूंदे अंग-2 में हलचल कर दे पायल बाजे घूंघरू बाजे झूम-2 गाए मोरा मनवा कोयल ............

शिक्षा का प्रयोजन

   उच्च शिक्षा का प्रयोजन आर्थिक समृद्धि पाना है धन धान्य से सम्पन्न लोग कुछ स्वार्थ वशीभूत होते हैं कोई गर्व करे उंचे कुल का कोई द्वेष करे किसी जाति से पथ भ्रष्ट हो रहा युवा वर्ग निस्वार्थ भावना लुप्त हुई ङाक्ट्रेट ङिग्री का प्रतीक महानगरों का सम्मान बना ग्रामीण चिकित्सा को तरसें शहरों की तरफ वे रूख करते कुछ लोग कर्तव्य निभाते हैं "आदर्श" सभी को सिखाते हैं मौजूद है उनका वजूद यहां जो समाज की सेवा में तत्पर अपने हिस्से की खुशियां बांटे शिक्षा स्वास्थ्य में योगदान कर समाहित हो ये "आदर्श "सभी में योगदान हो जन-जन का तो शैक्षिक उद्देश्य सफल हो जाए

अन्माष्टमी पर

  बाल रूप मोरे मन-भावा तोरा रूप सलोना कान्हा बंसी की धुन मन को मोहे सुनकर मन आनंदित होवे तोरे दरस की आस लगाए पल पल तेरी राह निहारे सांवरिया मोहे दर्श करा जा तन मन की सब सूध भूलाउं तोरे रंग में मैं रंग जाउं ॥

मातृ दिवस पर

  सरिता सी शीतल  मन से निर्मल हूँ अग्नि सी दहकती क्रोध की ज्वाला हूँ चांदनी सी चमकती सदगुणों की खान हूँ नम्रता से सुसज्जित शालीनता की खुशबू हूँ धरा का सृजन करती मैं मातृ शक्ति हूँ ॥

प्रभु की महानता

बयां करने को शब्द नहीं हर एक शब्द निशब्द खूबी अनगिनत अथाह वर्णन करते नहीं अंत कभी सोचे ये मन छंदो में करूँ तेरा गान छंदो की गांठे स्वत: ही खुल खुल जाए नाथ करूणानिधान दयासिंधु ईश्वर अनगिनत तेरे नाम महिमा अनंत गुण है अनंत बेअंत तूं है नाथ किस मुख से मैं गुणगान के शब्दों को लाउं नाथ  यह शब्द ही आधार है तेरी सृष्टि का हे नाथ     जो भी चढाएं श्रद्धा से स्वीकार कर लेना उसे नादान अपने भक्तों को ना दूर करना स्वयं से  स्वीकार करना विनय हम आए है तेरे शरण में हृदय के गागर को हमारे भर दो अपने प्रेम से 

मृत्यु

पत्ते ङाल से टूटकर जाने किस ओर गए कि दिशाओं को खबर नहीं कहाँ खो गए सूर्ख भी नहीं हुए कि कह सकें टूट गए  शायद वे फिर लहराएंगे किसी शाख पर  खुशी है कि वो पत्ता हंसते हुए शाख से जा गिरा फक्त दुख इस बात का वो वक्त से पहले चल चला॥

अमरता का वरदान

   ये सच है कि सभी को जाना है कब और कैसे किसने जाना है भविष्य का ज्ञात होता गर तो ये काल ना होता काल की निरंतर गति को  किसने रोका है सोच फिक्र में ढलता है हर एक क्षण जीवन का  नई सुबह को आज तक किसने देखा है पल पल घटता है आयु अल्पायु में महज सांसो के घटते मोल को किसने जाना है   अंतिम क्षण कैसा होगा आखिर ये अनुमान अमरता का वरदान जहां में किसने पाया है ये सच है कि सभी को जाना है कब कैसे किसने जाना है|

सामाजिक उत्थान

  इस चमन मे कोई दीया जलता है   हवा के रूख में बेचैन सा दौङता है खामोशी से दहकता कुछ कहता है अंधियारे को समेटता हुआ खुद में वह खुद को ही अकेला पाकर   तुफानो से टकराने की जिद में है ङर है कि तूफान उस पर हावी हो उसके तेज को निस्तेज ना कर दे  यकीं  है उसे वह नहीं मिट सकेगा घोर अंधेरे में भी वह जलता रहेगा सुना है जो अकेले ही चल पङता है अपने मुकाम पर पहुंच ही जाता है मुकाम कुछ हसरतें ख्वाहिशों से भरा निर्धारित जीवन का लक्ष्य बनता है खुद में ही जलकर रौशनी बिखेरता उम्र की लघु सीमा खत्म होने को है  दीया फङफङाता सा बुझ जाएगा  शेष राख  कचरे में समाहित होगा दुख है उसके खाक में मिलने का परंतु आशा की लौ नहीं बुझ सकेगा इस समां में रौशनी बिखेरने वाला कोई दीया पुन: जल उठेगा ॥

मन से हारो नहीं

  उठो न अधीर हो पंगु नही तुम वीर हो धैर्य की क्षमता बहुत असीमित उर्जा भंङार हो उठो न अधीर हो अङिग रहो लक्ष्य पर विचलित न हो कभी राह में तूफानों से ङटकर लङो उठो न अधीर हो हताश तुम ना हो खङे मुखरित रहो बढते चलो विश्वास की नई भोर में  उठो न उधीर हो पंगु नहीं तुम वीर हो

मेरी अभिव्यक्ति का स्वर

  रोक सकते हो क्या तुम सृष्टि के विस्तार को कैद सकते हो क्या तुम उङते पंछी की उङान को बदल सकते हो क्या तुम खारे दरिया को मिठास में स्थिर कर सकते हो क्या तुम काल की निरंतर चाल को क्या कर पाओगे तुम ऐसा ? शायद नहीं! कभी नहीं! तो कैसे रोक सकती हूँ मैं  अपनी स्वतंत्र अभिव्यक्ति को दर्द से कराहती मानवता का स्वर प्रकृति से कूपित विध्वंस का स्वर खुशी से भरा  ,उल्लास का स्वर  मेरी संपूर्ण अभिव्यक्ति का स्वर

मौत की कल्पना का सजीव चित्रण

मौत एक सुखद एहसास है जिंदगी की हंसी शाम है मौत का सफर दर्दनाक है इस सफर का लुत्फ शानदार है मौत एक सुखद एहसास है जिंदगी से जिंदगी की दास्तां है प्रारब्ध से अंत की यह किताब है मौत को हंसकर गले लगाना कांटो भरे सफर का गुलजार है मौत एक सुखद एहसास है मांगने से कुछ ना मिलता यहाँ फिर मौत से क्यों ऐतराज है भला?  जिन्हे मालूम है प्रारब्ध से अंत में मिलना यह सफर उनके  लिए  कुछ खास  है मौत  एक  सुखद  एहसास  है ख्वाबों की दुनिया को भुलाकर अपने वजूद को खाक में मिलाना एक अजनबी लोक में स्वत: सिमटकर जहाँ से रूख्सत होने को बेकरार है मौत एक सुखद एहसास है जिंदगी की हंसी शाम है।

स्वयं से जद्दोजहद

   एक अरसा बीत चला कोई दर्द नासूर सा  पनप रहा   ख्वाबों की चिताएं जलती रहीं ना धुंआ उठा ना राख हुआ करवट बदली बेहद मैने आंखो मे उजाला नही दिखा पर वक्त ने ज्यों करवट बदला ना भोर हुई ना रैन ढला बिखरे अरमानों की लौ में दहकती सिसकी भर नम दो नैन हुए आंसू पीकर राहत तो मिला होठो पर हंसी दिल जर्जर बना कोई खबर रही ना तन-मन की चेतनता में तन शव सा रहा जरा चैन- सुकूँ को पाकर भी दिल-दर्द कसक वैसा ही रहा एक अरसा बीत चला कोई दर्द नासूर सा पनप रहा

शब्दों का गणित

   एक एक अक्षर से जुङकर  नित शब्द नए बनते जाते हैं  भाव हो दिल का कोई भी  शब्द अक्षर से बयाँ होता है कितने गहरे अर्थ हैं इनके  हर एक मोती में माला है सुख दुख आहत  प्रेम प्रलोभन  कूट शब्द का जाल रचा है  अक्षर वही हैं सीधे साधे  जगह बदलकर अर्थ बनाते  शब्दों का कर उलटफेर  मानव बुद्धि का वजन बढाते ..!!

मन की उदासी

    मरता शरीर नहीं  मरता ये मन है       तङपता ये देह नहीं  बिलखता ये मन है  अस्तित्व को नकारता  खंङित यह मन है  बारंबार टूटकर  बिखरता ये मन है देह में प्राण संग  पीङित ये मन है कल्पना के जाल में उलझा ये मन है प्राण बिन देह जैसे मात्र एक शव है  मृत मन की  स्थिति भी बङी विचित्र है   नीरसता भरा जहाँ मन में  कैद है एक गहन उदासी भरा  मनो- संसार है

नव वर्ष का स्वागत

  ऐ वक्त पुनः मैं तेरा स्वागत करती हूँ मेरे जीवन की दहलीज पर तेरे क़दम एक बार फिर मुझे याद दिलाएंगे तेरे दिए ज़ख्म-ए- दर्द समेटती हूँ जो सुकून छीना तूने बेवक्त रुलाकर मैं बिखरकर खुद को उठाना चाहती हूँ ऐ वक्त पुनः मैं तेरा स्वागत करती हूँ बीते दिनों में दर्द की गहराई में   ह्रदय प्रहार को सहन करती हूँ  आ मैं तेरा अभिनन्दन करती हूँ वक्त की बदलाव को स्वीकारती हूँ खुदी को घायल कर खुद को गुनहगार बना  तेरे दिए ज़ख्मो को तुझसे ही भरती हूँ ऐ वक्त पुनःमैं तेरा स्वागत करती हूँ इस बार जोरदार तरीके से  मेरे जीवन की दहलीज पर तेरे एकाएक प्रहारों का सामना करते हुए मैं झेल सकती हूँ हर दर्द तेरे समक्ष क्रंदन करते ह्रदय में  शांत सरोवर सी नहीं होउंगी हताश किसी प्रहार से  ऐ वक्त पुनः मैं तेरा स्वागत करती हूँ।

लोकतंत्र का हश्र

   राष्ट्र की प्रतिभा ,युवा, जवानी जनसँख्या पर बलि चढ़ी है लोभ,प्रलोभन,घृणित राज में सुशासन पर भारी पड़ी है अर्धविक्षिप्त अवस्था में सड़कों पर प्रतिभाएं पड़ी हैं चंद सोने के सिक्कों खातिर मर्यादाएं यहाँ धरी पड़ी हैं कृषि, व्यवस्था की हालत वस्तु मूल्यो में इजाफा हुआ जीवन का आसार नहीं है प्रकृति का कोप बढ़ा है  इस धरती की सभी धरोहर माफियाओं ने सोख लिया है मान लो अब इस देश में यारों लोकतंत्र औंधे मुँह पड़ा ।।

क्यों आती हैं बाधाएँ?

   क्यों आती हैं बाधाएँ जीवन में क्यों ये कदम लङखङा जाते हैं  क्षण भर तनहा पाकर खुद को व्याकुल मन क्यों हो जाता है चाहतें क्यो कभी खत्म ना होती पाकर सारे जहाँ  की  खुशियाँ फिर भी उदासी कम न हुआ टूटकर बिखर ना जाना कहीं अश्क भी आँखो मे न ठहरते कैसे संभालकर गम रखोगे सोचो जरा इस क्यों के पीछे  हम ही कारण क्यों  होते  हैं   गमों  को अपने भूल कर तुम मुस्कान वज्र से जीत लो जग...!!

नश्वर जहाँ से वैराग्य

   हे निष्ठुर प्राण  इस मिट्टी के घरोंदे को मुक्त कर दे तेरी किरणें जो तिमिर मिटाती है उस कोठरी को खाली कर दे बेशक तिमिर किसे पसंद होगा? कदापि नहीं, जड़ता किसे पसंद होगी? इस भूतल पर नश्वरता किसे पसंद होगी? हाँ चूँकि यह शाश्वत सत्य है छण भंगुरता काल-गर्भ में प्राण रूपी भ्रूण की हत्या यह सत्य ही परिलक्षित होता है हे प्राण , अपनी समस्त ऊर्जा समेट ले इस कोठरी को खाली कर दे  जीवन एक मृगमरीचिका है ज्ञात हो गया मृगतृष्णा पर अंकुश प्रबल हो चला ये  देह छणभंगुर है किसका सगा हुआ है आदि और अंत को मैने जान लिया है ।।

माँ की सीख

    जन्मी है एक नन्ही परी रोशन हुआ ये घर आँगन पिता की ऊँगली थामकर घूम रही है वो परी नहीं है फ़िक्र भुत का और फिक्र नहीं भविष्य की खुद में ही वो खिलखिलाती हर्षोल्लास पूर्ण है खेलती है कांच के और काठ के खिलौनों से झूम झूम नाचती है चुलबुली नन्ही परी यौवन की दहलीज पर कदम उसने ज्यों रखा समाज की नजरों में उतर गयी वो परी एक वक्त था वात्सल्य पूर्ण प्रेम को पाती आज इस यौवन को हैवानियत से बचाती दंश टीस ह्रदय की तीव्रता से बढ़ रही घूरती मवालियों के नजरों से वो बच रही कितनी बड़ी हो गयी ,बचपन को पार कर सोचकर विचार कर ब्याकुल हो रही है माँ  शुभ विवाह की जोरों शोरों से तैयारी चली फूल सी आँगन में जहाँ चहकती थी वो परी छोड़कर संसार अपना वो किसी की हो चली मायके को भूलकर माँ का दिया वचन निभाती बन गयी है आज वो किसी की जीवनसंगिनी रिश्तों की डोर खुद संभालती है वो परी जिस नाजों साज में पली  वो दंश में तड़प रही पुष्प की कोमलता से काँटों भरा सफ़र प्रताड़ना को सहते हुए माँ की बातें सोच कर बेटी उस घर को अपना स्वर्ग समझना रूखी सूखी खाकर भी मुँह बंद रखना ससुराल की गलतियों को छुपाये रखना उनके सम्मान...

सुखः का सवेरा

     अंकुर जब फूटा तो खिलखिलाया मुस्कराहट से उसने गुल खिलाया पक्षियों ने आँगन में चहक बिखेरी    कलरव से भोर का आगमन हुआ   कण कण में संगीत का समावेश रगों में रिसता संस्कारो का रक्त धरा सृजन को कुदरत का उपहार लहराये बाग़ बगीचे खेत खलिहान सूरज की किरणें लालिमा बिखेरती  उस तेज किरण से छटा तिमिर  यद्यपि मानव रहे सदा धैर्यवान मिटे मन अंध बने वह ऊर्जावान

मेरी स्मृतियाँ

 मेरी स्मृतियों का सुंदर संसार  मुझे आदेशित करता मेरी आवाज मैं  चलती हूं जिस रोज उस पथ पर  जो कठिन है बेहद कठिन यकीनन तभी तो  मैं गिरती हूं शनै शनै तब पथ दुर्गम ,बहुत कठिन लगते हैं  चूंकि मैं जानती हूं मुझमें चेतन जहाँ है  कि मुझे निर्देशित करता है मेरे कदमों को  एक संबल देता है मुझे, मेरे साथ चलने का  तब मैं खुद ही, खुद की चेतना के संग फिर से उठ खडी होती और चल पड़ती अपने मार्ग की ओर ,क्योंकि  मुझमें छुपा है मेरा प्राण ,मेरी चेतना, मेरा विश्वास, मेरा ईश  जो कि  हर प्रतिकूलता में सदैव मेरे साथ है    यही है  मेरी स्मृतियों का सुंदर संसार ।।

नेताजी का वोटतंत्र

  न्याय का ये है मंच हमारा लोकतंत्र है स्तम्भ हमारा बड़े बड़े वादों से हमने पार्टी को कर दिया भौचक्का जनता बेवकूफ बनी, नेताओं की मौज बड़ी आज है, कल है, हर रोज मौज है  आओ कुछ ऊपर की कमाई कर लें  तो चलो---------- एक नया प्रोजेक्ट मिला है सड़कें टूटी बिजली ग़ुम है खुश हो गए नेताजी अरे देखो----------- इस नए प्रोजेक्ट से वाह, मिला है हमको हरा रुपइया खाएंगे, घूमेंगे ,कुछ तो भिखारियों में बाटेंगे तब ,,, हम कहलायेंगे हितैषी मिलकर बोलो,  नेताजी जिंदाबाद! पीछे से चिल्लायेंगे कुछ टट्टू भाड़े के वाह वाह वाह नेताजी जिंदाबाद! श्श श्श श् श् कुछ जलने की बू आ रही है  कहीं तो आग लगी है खबर ये आई  कहाँ से?????? विपक्षी चिल्ललाए हाय अब तो धावा बोलो वर्ना ,,,, माना कि हम हार गए ऐसा तो नहीं हर बार गिरे  पारदर्शी कर देंगे अब तो पोल तुम्हारा खोलेंगे हम भी करते है कुछ हल्ल्ला  तो, चलो  बनायें प्रोजेक्ट का मुद्दा -------- ये तो बताओ नेता जी कहाँ से लाये हैं आप रुपइया जल्दी से तुम हमें बताओ वर्ना जनता दरबार में आओ नहीं बचोगे न्यायतंत्र से बेशक कितना भी हो यह महंगा गिर जायेगा...

ग़रीब का सपना

  करते हुए सब काम वो अपना ,देख रहा था ख्वाब कड़ी धूप हो या सर्दी में तनिक नहीं करता आराम पेट की भूख ,गृहस्थी का बोझ ,नन्हे से कंधे पर खूब करे डटकर मजदूरी ,क्या था उसका गुनाह करते हुए सब काम वो अपना ,देख रहा था ख्वाब घर में छोटा एक अकेला ,पिता का बेटा मान माँ की आँख का पुतली और , जिगर का वो था चाँद बहन के सपनो को पूरा करने का वो पहला आस किंतु शिक्षा से वंचित बालक को न था अधिकार करते हुए सब काम वो अपना ,देख रहा था ख्वाब उम्र ही क्या थी उस बालक की जिसके कंधो पर घर भार वक्त के थोकर पेट की भूख से बिलख बिलख रोता नादाँ वक्त ने वक्त से पहल उसकोे ,क्यों बना दिया नौजवाँ करते हुए सब काम वो अपना ,देख रहा था ख्वाब

अधीर मन की अवचेतना

  मेरा मन आज बहुत अधीर है   ह्रदय में उल्लासहीनता प्रबल बहुत इस मन पर गहरा आघात पंहुचा  अकारण मैंने खुद से ही लोहा लिया इस जंग का हश्र खुद की हार ही थी जाने अनजाने अकारण ही मैं अपनी ही खुशियों का गला घोंट बैठी  एक तमन्ना थी ,जहाँ से रुखसत होने की जब मेरी अभिलाषाओं का अंत हुआ किन्तु काल फाँस भी, यूँ ही अपना ग्रास नही बनाता इस वार से मेरी चेतना बेहद आहत थी तन पर जैसे बर्फ की सिल्लियां रख दी हों जिस तरह उजड़े हुए उपवन की मुरझाई कली अपने अस्तित्व में आने से पहले ही खाक हो गई और धूल भरी दुर्भाग्य की आँधियों ने  अपने पाश में जकड लिए हों इस मन के उष्णता में सिसकन थी और ह्रदय की व्याकुलता ज्यों का त्यों जैसे प्राणहीन अवचेतना मुझे शून्य करता मेरे भय को मिटाता हुआ मुझे आवाज देता संयोग वियोग से इस जहाँ से दूर करता जैसे भीषण पछुआ पवनों के बहाव में जनजीवन को अपनी ओर समाता है तब स्थिति बेकाबू  सी हो जाती है  कुछ ऐसा ही बना रहा प्रलय सा इस अधीर मन की अवचेतना में...!!

मैं साथ तेरे क्या डरना रे _गीत

पीड़ा हो ,कठिनाई हो ,दलदल हो या, हो अंगारे तूँ रुकना नहीं, तू थकना नही, चाहें बदरी घनघोर घिरे  ऐ मीत(मन) मेरे सुन गीत मेरे,अंधेरों से क्या डरना रे ना हार तू मन चल साथ मेरे, मैं (ईश)साथ तेरे क्या डरना रे है यकीन तेरा मुझपर जितना ऐसा ही हो हर वक्त तेरा मेरे नाम के माला में रम जा जैसे चन्दन सरीसृप जड़ा  छम छम कर के धुन गाता जा ले बांध नुपुर अलमस्त रहे संकल्प ले तू  ना डिगे कभी तेरे लक्ष्य से बढ़कर  क्या है  रे  किरदार तेरा, अंदाज तेरा, हर शब्द तेरा ,मिश्री घोले प्रीति दिल की ,हो इतनी हरी ,हो हिना की जैसे लालिमा उगते सूरज ,ढलते चंदा, ले आये प्रातः एक  भोर नई  हो वक्त भले विपरीत मगर गिर-गिरकर उठ-उठ कर चलो क्या छूट गया, क्या बीत गया, जो रात गई, सो बात गई।।

इमोशन का विज्ञान (रेकी, कॉर्ड कटिंग,क्रिस्टल हीलिंग , साइकेट्रिक ट्रीटमेंट , आध्यात्मिक स्पर्श पद्धति एवं आधुनिक चिकित्सा विज्ञान )

इंसान और भावनाएं दो अलग चीजे नहीं हैं जैसे शरीर और आत्मा एक साथ चलते हुए शव को सजीव किए रहते हैं उसी तरह भावनाएं इंसान को सुख, दुख का एहसास कराती है  जिससे वह अनुभूति के शिखर पर पहुंचता है  लोक परलोक संवारने  का जतन करता है विज्ञान  जब असफल होता है तो आध्यात्म  अपनी कमान खुद संभाल लेता है यूनिवर्स अपने सिस्टम से काम करती है और संपूर्ण ब्रम्हांड का  कैलकुलेशन उसके  आधीन है । जब एक डॉक्टर किसी दवा को  पर्ची पर लिखता है तो दवा के नाम से पहले कोड वर्ड Rx  का प्रयोग करता है , वहीं इसका  सामान्य मायने है लेना अर्थात आप दवा  का सेवन करें और डॉक्टर के परामर्श को  मानें । Rx कोड का यूनानी चिकित्सकों द्वारा बड़ा सुंदर डिकोडिंग किया जाता है  कि यूनान के देवता ' होरस '  की आंखे दिखने में Rx  के आकार की दिखती है जो यह दर्शाता है स्वास्थ्य के बेहतर स्वरूप को । और इसे ही चिकित्सकीय भाषा में कोड का रूप दे दिया गया कहीं ना कहीं मिश्रित रूप में   कोड व्याख्या करता है कि हे ईश्वर दवा हम दे रहे हैं ठीक आप कर रहे हैं । बहु...

सुख और दुख प्रभु की देन

एक बार भगवान राम और लक्ष्मण एक सरोवर में स्नान के लिए उतरे उतरते समय उन्होंने अपने-अपने धनुष बाहर तट पर गाड़ दिए जब वे स्नान करके बाहर निकले तो लक्ष्मण ने देखा की उनकी धनुष की नोक पर रक्त लगा हुआ था उन्होंने भगवान राम से कहा -” भ्राता ! लगता है कि अनजाने में कोई हिंसा हो गई ।” दोनों ने मिटटी हटाकर देखा तो पता चला कि वहां एक मेढ़क मरणासन्न पड़ा है । भगवान् राम ने करुणावश मेंढक से कहा- ” तुमने आवाज क्यों नहीं दी ? कुछ हलचल,छटपटाहट तो करनी थी। हम लोग तुम्हे बचा लेते जब सांप पकड़ता है तब तुम खूब आवाज लगाते हो । धनुष लगा तो क्यों नहीं बोले ? मेंढक बोला – प्रभु ! जब सांप पकड़ता है तब मैं ‘ राम- राम ‘ चिल्लाता हूँ एक आशा और विश्वास रहता है प्रभु अवश्य पुकार सुनेंगे। पर आज देखा की साक्षात् भगवान् श्री राम स्वयं धनुष लगा रहे है तो किसे पुकारता ? आपके सिवा किसी का नाम याद नहीँ आया बस इसे अपना सौभाग्य मानकर चुपचाप सहता रहा ।” सच्चे भक्त जीवन के हर क्षण को भगवान् का आशीर्वाद मानकर उसे स्वीकार करते हैं सुख और दुःख प्रभु की ही कृपा और दया का परिणाम ही तो हैं ।

मुक्तक काव्य श्रृंखला 6

* बीज धरती पर गिरे ढक जाए  बाह्य  जो आवरण एक नियत अवधि में उठे जागृत  हुआ वह अनावरण इंसान बाधाओं में भी हंसकर बढ़े  नित सुगमतम मिल जाएगा एक दिन मुकाम धीरे  सही पर सहजतम *तूफानों की कश्ती बड़ी भारी विपत्ति पास हो आंखों के आगे विवशता के पर खुले अंदाज हों उड़ने दो उन परों को जो  बाधाओं ने फैलाये हैं प्रबल इच्छा से क्षितिज को  तुम नया आयाम दो ।। * अयोध्या राम जी का गढ़ , हिंदुत्व की यह निशानी है जो हिस्से में मिला हमको बहुत उपकार भारी है विवादों में था सालों से घिरा निर्णय अधूरा  जो बनेगा राम मंदिर अब , हुई पूरी तैयारी है ।। *बनारस का छटा अनुपम, सीप सा चमकता पानी योग के तेज से ओजस , समन्वय सांस्कृति अपनी सैलानी जब यहां आते करें अर्चन विनय कर जोड़ कि भारत की अनूठी शान दुनिया ने स्वीकारा है ।। * प्रेम दिल में रखो हर पल, नहीं उपजे बैर का शूल मर्यादा सभ्यता संस्कृति का हो सदा  सम्मान इंसानियत नहीं है नफरतों के आग में जलकर कि ढह जाएंगे  सब बैरी  टीले सद्भावना भर कर ।। * भक्ति करो तो शबरी जैसी  हठ करना  ध्रुव तारा ...

दोहा छंद (गुरु की तलाश)

कौन से पाप प्रहार किए हैं  कि कौन से पग उद्धार करेंगे  कौन से संत सहज होंगे ज्ञानी कौन सुमति का ज्ञान कराए पंथ हुए चहुं ओर ना सूझे कि कौन से गुरु  सत्संग में जाएं  मति रचो  हरि लीला अनोखी कि प्राणी नरक  से पार ना पाए  धर्म विशुद्ध था होगा विशुद्ध  नहीं  पाप  उसका मान घटाए दंगे फसादों में और अपराधों में आतंक  दुष्ट दुराचारी जो छाए धर्म ध्वजा धरती पर सुहाए  नहीं नर नारी में भेद कराए  मानव धर्म का ज्ञान कराए कोई संत सन्यासी संसर्ग पाएं।।

ठोकरों से चलना है (मुक्तक काव्य )

मेरी राहें कठिन हों तो उन्हें आसान मत करना फिरूं अभिमान में मगरूर मेरी संभाल मत करना मुझे ठोकर से चलना है ना फूलों सा हो जीवन ये सदा सन्मार्ग दिखलाकर मेरी भक्ति प्रबल करना।। मुझे कुछ सीख लेना है जिज्ञासु बन के रहना है  ना हो अभिमान जीवन में मुझे अज्ञात रहना है मेरे कर्मों के पतरे में नियति का लेख क्या जानूं मैं जानूं एक ईश्वर को मुझे खुद से ही मिलना है खिले मुस्कान अधरों पर दुखों का पात गिर जाए मेरे हिस्से में हो पतझड़ या जीवन में वसंत आए घिरे बदरी घनी काली घिरे तूफान जीवन में फिरूं बेफिक्र मलंग होकर उमंग ए बहार आ जाए।। अगर दुख की बयारें हों तो पुरवाई सुखों की हो मिलेगा जन्म दोबारा ना रुसवाई जहां में हो ये जीवन है तो पतझड़ भी खिलेंगे पुष्प दोबारा  हमें हर हाल में जीना सुखद अंतिम विदाई हो।। -गायत्री शर्मा गुँजन

मां के लाड़ले

बेटियाँ पापा की परी होंगी बेशक मां के लाडले भी कमतर नहीं हैं बेटियां पराई होती हैं तो कोई गम ना करे बेटे भी घर रहने को वरदान ना पाते हैं जरूरतें ,जिम्मेदारियां इस कदर हावी हैं उन पर  नई गर्लफ्रेंड बनाने को टाइम नहीं है  वालिदैन की दवाई बच्चो की जरूरत  बीवी की जिम्मेदारी काम बहुत है खुद के लिए फुरसत ही नहीं किंतु कोल्हू के बैल से वे खटते बहुत हैं  फिर भी कहते हैं लोग निकम्मे निठल्ले और आवारा होते हैं लड़के मगर  अपने दुख में रोना उन्हे आता नहीं है ©®

रावण प्रवृति के मानुष (मुक्तक काव्य)

पद और धन के लोभ में मद में चूर चूर वे रहते हैं  नारी को नारी ना समझे क्रूर क्रूर बन छलते हैं  धर्म की आड़ में नीच अधम निर्णायक पुरुष हो जाएं तो नारी के अपमान अग्नि में खाक खाक हो जाते हैं । धर्म कर्म परिवार सामाजिक रीति रिवाजें हमसे हैं  लंबी उम्र को करवा , वट पत्नी से कराते पूजन हैं  पत्नी पीड़ित पुरुष कुछेक भरी सभा में वक्ता बन खिल्ली का खुद पात्र बने तो हमे गंवारन कहते हैं। दुशासन की दुष्ट प्रवृति रावण का अभिमान घटा  मर्यादा के प्रवर्तक श्री राम का जग में मान बढ़ा कंस बहन को बहन ना समझा लाचारी पर घात किए  पलट के देखो साक्ष्य पुराने दुष्टों का क्या हाल हुआ। ©®

महाशिवरात्रि महोत्सव

महादिवस है पुण्य तेज है निर्लिप्त शिव ओंकार है। योग अग्नि चैतन्यवरूप प्रभु जड़ चेतन में महाप्राण है ।। मां गौरी शंभू भोले  शिव शक्ति स्वमेव एकत्व रूप है । नर नारी किन्नर गंधर्व में अर्धनारीश्वर शिव ही श्रेष्ठ है।। काल का तांडव महा भयंकर शिव ही महाकालेश्वर है। नर्क द्वार यमदूत सताए भक्तों के आस त्रिलोकनाथ हैं।। जटा पर गंगा चंद्र की शोभा ,मस्त मलंग अंतर्मुखी हैं। असार जगत में स्वयंभू शिव महिमा तुम्हारी अपरम्पार है।। डम डम डमरू त्रिशूल सुहाए नंदीश्वर बमबम भोले है ।।  क्रोध की अग्नि त्रिनेत्र खुले शिव का तांडव गजब शोले है ।। सर्प गले में लिपटे हों  जैसे परमसुंदरी आभूषण है।। छाल पहन कैलाश विराजे चेले भयंकर अति विषधर है।। पूजन भक्ति स्तुति करें ऋषि मुनि देव के वरदायक हैं। भोले शंकर उमा भवानी मंगलकारी कष्टविनाशक हैं।। भंग धतूरे स्वैग चढ़ाए नृत्य करें  सब विवाहोत्सव है।। सूर्य चंद्र निकटतम पूर्णिमा महाशिवरात्रि महाउत्सव है। । गायत्री शर्मा ' गुंजन ' स्वतंत्र लेखिका

स्वर आजादी

देशभक्ति में उद्वेलित स्वर बापू का था नाम । हरगिज नहीं मिटेगा क्रांति राष्ट्रहित की हो बात।। फैले भारत मां की ख्याति बापू लिए थे प्रण । क्या हिंदू क्या मुस्लिम भाई मिलकर किए थे रण।। जन जन के भीतर हो गुंजन राष्ट्र भक्ति उद्गार गूंजे भारत मां की जय जय हो आजादी स्वर ।। फिरंगी सत्ता के विरुद्ध लोकमत मिला भरपूर। एकता देख थर्राए दुश्मन दल बल चकनाचूर।। त्याग तपस्या देशभक्तों की याद करेगा जमाना। शहीद दिवस की हर दिल में स्मृतियां पुष्प सजाना।। सत्य अहिंसा के  राह पर चले थे बापू आप । नर नारी सम दृष्टि हो कर करें भारती गान ।। होनी को अति प्रबल जान मुख से निकला राम। छोड़ गए नश्वर संसार कर्तव्य निभाकर आप।। आज मनाएं पुण्य तिथि  करें बापू को हम याद । अक्षुण रहे ये देश हमारा मिलकर करें फरियाद ।।

वीरों को नमन

स् वतंत्र है स्वतंत्र हैं हम पूर्ण गणतंत्र हैं  मां भारती की आन बान शान को सलाम है दुश्मनों का सीना चीरें वीर मेरे देश के चट्टानों से इरादों को नमन है नमन है राष्ट्रवाद लोकमत एकस्वर आजादी अन्य कुछ चाह नहीं आजादी ही चाहिए भारतीय सेना दल बल अस्त्र शस्त्र सज्जित पृष्ठ इतिहास के नवीन है नवीन है अमर जवानों की शहाद्तों को याद करें गणतंत्र महापर्व उत्सव जरूरी है देश का कानून हो हर नागरिक स्वतंत्र हों कुशासित हुकूमत ओ फिरंगियों धिक्कार है कैसे भूल जाएं  हम वीर राष्ट्र भक्तों को इन्ही से इस देश में दिवाली ईद होली है नमन है नमन है स्वराज्य महापर्व है पुनः पुनः मां भारती के वीरों को नमन है।।

वसंत ऋतु (काव्य संगम पत्रिका में प्रकाशित मेरी कृति साझा काव्य संकलन)

     संस्कार न्यूज की पेशकश साझा काव्य संग्रह   

रिश्तों की महक (साझा काव्य संकलन) प्रकाशित

रिश्तों की अनमोल कड़ी ,एक बार जुड़ जाये तोड़े से टूटे नहीं , विफल प्रयास हो जाये आज के रिश्ते कांच के ,  तुरंत ही आहत होय आक्रोशी, लोभी स्वाभाव से , मानवता मिट जाये प्रेम की बात हो सात बार , संभव कैसे होय एक बार जो दिल टूटे , पुनः भरोसा खोय सात हैं फेरे विवाह के , पति-पत्नी के बीच निभा सके ना एक जनम ,सातवाँ कैसे होय प्रेम भाव निष्कपट हो , तो भावना पूजित होय भाव विकृति जब जब बढे , प्राणी दूषित होय दौर 21वीं सदी का है , समय कहाँ है आज टूटे दिल सिंगल रहें , सातवाँ कैसे होय।। मौलिक रचना © गायत्री शर्मा गुंजन (दिल्ली ) लेखक परिचय:  नाम - गायत्री शर्मा गुंजन शिक्षा - बीएड, स्नातकोत्तर (राजनीति विज्ञान) व्यवसाय - स्वतंत्र लेखन

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