सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

झूठी फिदरत



 जब दबे हुए हो झूठ तले फिदरत कैसे बदलोगे तुम

नफरत की मिनार खङी करके क्या सुकून से जी पाअोगे तुम

वंचित वर्गों का अहित करके क्या अपना हित कर पाअोगे

माना कि झूठ नहीं छिपता जब सच से वह टकराता है

फिर भी क्यों कहते रहते हो मैं नख से शीष तक सच्चा हूँ

जब दबे हुए हो झूठ तले फिदरत कैसे बदलोगे तुम!

टिप्पणियाँ