पीङा क्या है ?क्या यह मात्र आभास है जो हमें प्रतीत होता है यह किस प्रकार का एहसास होता है जिसे हम महसूस करते हैं जिसके उग्र स्वरुप में समाकर दिल रोता है ,आत्मा कराहती है एवं हमारे व्यवहार में परिवर्तन दीखता है चूंकि यह संभव है की इस दर्दनाक अनुभूति को कोई नहीं भूल सकता है जहन में कैद हो जाती हैं जिसका प्रभाव हम अपने नियमित जीवन में देखते हैं महसूस करते हैं।
पीङा एक सूक्ष्म प्रभाव है मन पर जो मानव को आहत करता है बारंबार मानव हृदय टूटता बिखरता और जुङता है एक सूक्ष्म प्रक्रिया के रूप में हमारे कल्पना में सोच में हर पल में समाहित होकर हमें वेदना से व्यथित करता जाता है क़ि हमारे नियमित कार्यशैली प्रभावित होती है। क्या कोई किसी शक्श के पीड़ा का अनुमान लगा सकता है? पर सवाल यह है कि कैसे ? यदि वह व्यक्ति स्वयं उस स्थिति से जूझ चूका हो वह बेहतर समझ सकता है परंतु आज के समय में किसी के पास इतना समय होगा किसी का दर्द साझा करने का! शा यद् नहीं।यदि हम विचार करें तो प्रश्न यह उठता है कि पीङा क्या शारीरिक होती है या केवल मात्र मानसिक ?
जिसका आभास केवल जागृति में है या स्वपन मे भी!
इन सवालों के बंङल में बहुत सी गुत्थी उलझी हुई हैं
मानव शरीर की संरचना में अति सूक्ष्म तत्व हैं जो कार्य व्यवहार ज्ञान कौशल आदि को प्रदर्शित करता है जिस प्रकार भोजन करने पर क्षुधा शांत होती है साथ ही मन की तृप्ति होती है सुख का आभास सूक्ष्म कणों तक होता है इसके विपरीत शारीरिक कष्ट का प्रभाव भी मन पर होगा यह तय है ।
बिना आकार बिना स्वरूप का यह मन जिसने पीङा का बंङल संभाला हुआ है जिसका कोई थाह/पार नहीं है कितना विशाल होगा कितनी समावेशन क्षमता होगी उस हृदय की सूक्ष्मत अवस्था के भीतर जोकि पार पाना कठिन होगा।
अति हर्ष और विषाद की अवस्था ही पीङा के स्वरूप को गढते हैं
यदि इन दोनों अवस्थाओ की अत्यधिक्ता ही ना रहे तभी मानव जाकर हम सूक्ष्म प्रभाव से मुक्त हो सकते हैं और यह मानव जीवन बैलेंस होता है।
गायत्री शर्मा
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