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तुम एक औरत हो!

झुकोगे झुकाए जाओगे डरोगे डराए जाओगे आवाज उठाओगे तो धमकाए भी जाओगे पल पल मरना ठीक नहीं  समझौता करना ठीक नहीं लड़ते रहो बुराई के ख़िलाफ़ जब तक सांस आखिरी हो ताकि नजरें खुद से मिला पाओ  यह बेहद जरूरी है तुम्हारे लिए तुम औरत हो , बहन  हो ,बेटी हो  यह मत समझो छींटे तुम पर आएंगी बेशक आएंगी दोगले समाज का रिवाज है तुम लड़ना यूँ ही ना हार जाना  क्योंकि नजरें तुम्हे खुद से मिलानी है यह पुरुष प्रधान समाज है बेशक ताड़ी जाओगी चुप रहने को बाध्य की जाओगी  तुम ईंट को ईंट से तोड़ना हाँ तुम औरत हो चाल को चाल से जीतना प्रतिशोध को चतुराई से जीतना अपनी कमजोरी को अपनी ढाल बनाना तब नहीं छू पायेगा ये दोगला समाज और इसमें ब्याप्त वह कुरीतियाँ जो तुम पर हावी रही हैं या रह सकती थीं सिर्फ इसलिए कि तुम एक औरत हो ।।       

यह सच है कि सभी को जाना है

ये सच है कि सभी को जाना है कब और कैसे किसने जाना है भविष्य का ज्ञात होता गर तो ये काल ना होता काल की निरंतर गति को  किसने रोका है सोच फिक्र में ढलता है हर एक क्षण जीवन का  नई सुबह को आज तक किसने देखा है पल पल घटता है आयु अल्पायु में महज सांसो के घटते मोल को किसने जाना है   अंतिम क्षण कैसा होगा आखिर ये अनुमान अमरता का वरदान जहां में किसने पाया है ये सच है कि सभी को जाना है कब कैसे किसने जाना है| :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

तेरा ही गुणगान करूँ

मुख से क्या मैं बयाँ करूँ हर एक शब्द निशब्द खूबी अनन्त महिमा अनन्त वर्णन करते नहीं अंत अगर  सोचे ये मन कि छंदो में करती रहूँ गुणगान छंदो की गांठे स्वत: ही खुल खुल जाए नाथ करूणानिधान दयासिंधु हो प्रभु अनगिनत तेरे नाम महिमा अनंत गुण है अनंत बेअंत तूं है नाथ किस मुख से मैं गुणगान के शब्दों को लाउं नाथ  यह शब्द ही आधार है तेरी सृष्टि का हे नाथ     जो भी चढ़ाऊँ श्रद्धा से स्वीकार कर लेना उसे नादान अपने भक्तों को ना दूर करना स्वयं से  स्वीकार करना विनय हम आए है तेरे शरण में हृदय के गागर को हमारे भर दो अपने प्रेम से