झुकोगे झुकाए जाओगे डरोगे डराए जाओगे आवाज उठाओगे तो धमकाए भी जाओगे पल पल मरना ठीक नहीं समझौता करना ठीक नहीं लड़ते रहो बुराई के ख़िलाफ़ जब तक सांस आखिरी हो ताकि नजरें खुद से मिला पाओ यह बेहद जरूरी है तुम्हारे लिए तुम औरत हो , बहन हो ,बेटी हो यह मत समझो छींटे तुम पर आएंगी बेशक आएंगी दोगले समाज का रिवाज है तुम लड़ना यूँ ही ना हार जाना क्योंकि नजरें तुम्हे खुद से मिलानी है यह पुरुष प्रधान समाज है बेशक ताड़ी जाओगी चुप रहने को बाध्य की जाओगी तुम ईंट को ईंट से तोड़ना हाँ तुम औरत हो चाल को चाल से जीतना प्रतिशोध को चतुराई से जीतना अपनी कमजोरी को अपनी ढाल बनाना तब नहीं छू पायेगा ये दोगला समाज और इसमें ब्याप्त वह कुरीतियाँ जो तुम पर हावी रही हैं या रह सकती थीं सिर्फ इसलिए कि तुम एक औरत हो ।।
शब्द गुँजन में आप सभी पाठकगणों का हार्दिक स्वागत है । यहाँ प्रकाशित समस्त लेख , कहानी, कविता, मुक्तक, गीत, आध्यात्मिक अभिव्यक्ति , मनोविज्ञान , परामनोविज्ञान आदि समस्त शाखों से जुड़े तथ्य , रहस्य , मेरी स्वरचित स्वतन्त्र अभिव्यक्ति है जिस पर मेरा मौलिक अधिकार है। अतः पाठकों से निवेदन है कि किसी भी तरह कंटेंट्स को तोड़ मरोड़कर अन्यत्र पेश ना करें । अन्यथा दोषी पाए जाने पर कॉपीराइट एक्ट के तहत आप पर कार्यवाही की जाएगी । गुंजन अभिव्यक्ति को अपना बहुमूल्य समय देने के लिए आप सभी का धन्यवाद!!