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स्वप्नावस्था के परे

 एक बिंदु से प्रारम्भ  हुई मैं , एक बिंदु पर खत्म हुई वो प्रकाश पुंज था मुझमें मैने , अलौकिक दीदार किया तन की शिथिल अवस्था थी , स्वप्नावस्था आभास हुआ भारी उत्सव के क्रीड़ा में रंगमंच रोमांच भरा रही तटस्थ रंगीन फ़िजा से , हलचल मन में नूतन था  दैवीय आदेश की अवहेलना , तनिक ना मन मे ईष्र्या था आहत थी छण भर घटना से , मुझे आदेश निरन्तर था  अन्तस् ने अभिलाषाओं संग, तुमसे एक आदेश लिया अट्हास भरे इस रंगमंच से , तेरे संग हो दूर चलूँ मैं ,  मेरी रुदन, अन्तस् की पीड़ा, तुमने जान उचित ठहराया ज्यों ही अपने हृदय लगाया , भारी दुविधा दूर हुई  तनिक रही ना सुध बुध तन की , जीवित मुक्ति जान गई।। गायत्री शर्मा

अदृश्य शक्ति

जब पार किया प्रतिछण सुख दुख ,के परे मुझे आभास हुआ कांटो से भरी पगडंडी ने ,  हर मोड़ सुखद एहसास भरा हर सफ़र में तेरा साथ मिला , मुश्किल घड़ियाँ आसां हुई जो बनकर आया हितैषी सदा, तेरी रहमत का पैगाम मिला,  अंतर्मन की अभिलाषाएँ , एक कल्पवृक्ष मुझमें है  छुपा पग पग अदृश्य अलौकिकता , घेरे है मुझे चहूँ ओर दिशा नतमस्तक मैं करबद्ध  विनय, करूँ व्यक्त हृदय उद्गार सभी रुख मोड़ मेरा भव सागर से , मुक्ति का मार्ग दिखा दो प्रभु, गायत्री शर्मा

कठिन राहें

कठिन मेरी उन राहों को  तुम सरल कभी मत करना बस इतनी शक्ति मुझे देना मैं कठिन परिश्रम के द्वारा आशीष तुम्हारा पाकर  उन राहों पर चल पाउँ माना कि बहुत कठिन जीवन हर पल ,प्रतीक्षण मुश्किल पग है पर सुख दुख आना जाना है  गीता का सार यही है  इस सार को समझ सकूं मैं बस इतनी शक्ति मुझे देना आखिर इन राहों पर चलकर बिरले ही महापुरुष कहलाया ।