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प्रेम क्या है मैं शब्दों में कैसे कहूँ

प्रेम क्या है मैं शब्दों में कैसे कहूँ , प्रेम ह्रदय में है ब्यक्त कैसे करूँ प्रेम शबरी के जूठे बेरों में छिपा , दशरथनंदन के भाव मे प्रगट हुआ प्रेम मीरा ने की वो दीवानी बनी, गिरधर गोपाल को प्रेम के वश किया प्रेम ध्रुव नें किया ध्रुव तारा बना, श्री हरि को धरा पर प्रगट कर दिया प्रेम प्रेमियों ने की है ,प्रभु हंस से जीते जी मुक्ति मार्ग सहज मिल गया ।। गायत्री शर्मा

प्रभू के प्रति सच्ची निष्ठां

आस मेरी जहाँ से लगे न लगे ,तुझसे उम्मीदे मेरी सभी बंध रही संकटों के पलों में जग संग छोड़ दे,मेरे अंग-संग हे मालिक बस तू ही रहे हर घड़ी हो उमंगों उम्मीदों भरा, मेरे दामन में कष्टों के कांटे बिछे पार कर जाऊंगी हर चुनौती को मैं, शर्त ये है दुआओं में तूँ ही रहे।। गायत्री शर्मा

ईश्वरीय प्रेम की वर्षा

 तूँ धरा -धाम पर आया ,हरने पीर व्याप्त मानव का काम क्रोध मद लोभ मोह के, तीरों से घायल मानव छण भंगुर जग माया में ,खोकर तुझको ही भूल गए कर दो कृपा हे दयासिन्धु ,अब मिट जाए भव पीर गहन। गायत्री शर्मा

तेरी इनायत

आस मेरी जहाँ से, लगे ना लगे तुझसे आशा जुडी, अंत तक साथ हो गम नहीं जग मेरा संग ,ज्यों छोड़ दे खुश हूँ तू है मेरे संग, इनायत तेरी इससे बढ़कर नहीं कोई ख्वाहिश मेरी।। गायत्री शर्मा

हरि नाम का बिमा

कर्म करना कलि में ,सहज तो नहीं पोथी पढ़ने से हरी से ,मिलन तो नहीं देह थक जाएगी, कर्म होगा नहीं कर लो बीमा श्री हंरि के नाम का होगा जीवन के संग और ,जीवन के बाद।। गायत्री शर्मा

गुरु की शरणागति

वो विधाता है जिसनें दिया सुन्दर तन और मन में बसा वोही खुद को छुपा गर मुकद्दर जगे भाग्य में हो गुरु उनकी शरणागति से प्रगट हों प्रभू।। गायत्री शर्मा

जीवन की वैतरणी

पाप में जो फंसे फंसता जाये सदा नर्क की आग में जलता जाये सदा पर करना हो जीवन की वैतरणी को आओ मिलकर चलें सद्गुरू की शरण।। गायत्री शर्मा

भावसागर से पार

अष्टप्रहर हो तेरा  प्रभु जी  ,  ध्यान लींन मन मेरा हो रुनझुन बाजे नाद ध्वनि प्रभु, तेरा दीदार ह्रदय में हो माया के चित्त जोर से देखो ,जीव चराचर भटक रहा आवागमन का चक्र छुड़ाकर ,पार लगा दो भवसागर। गायत्री शर्मा

अंतिम छण में

चार पहर की बात निराली श्रुति,सज्जन, कहें वेद पुराण दुःख रोग विनसे सब तेरे , उस पर प्रसन्न हो कृपानिधान कभी न आए  बला ,ब्याधि , और ना आये अकाल ही काल सुखद हो जाए अंतिम छण भी, जो स्वांसों में ले तेरा नाम।। गायत्री शर्मा

तुम बिन कौन सहायक है

दरिया जैसा दिल है तेरा ,सूरज जैसा मुखड़ा है चाँद, सितारे गगन की शोभा, तेरी शोभा न्यारी है धरती का श्रृंगार हो उपवन, पुष्प सुसज्जित चरण तेरे अत्याचारी दुनिया में प्रभु, तू करुणा की मूरत है करुनानिधान करो किरपा, तुम बिन कौन सहायक है।। गायत्री शर्मा ----------------

भटके राही

जब पथ भ्रष्ट हो जाये मानव, दीन ,दुखियों को तड़पाये दीनता, दया भाव मिट जाए, प्रेम विकृति ह्रदय समाये दोहरे रूपों में मानव जब ,रंग बदलने लग जाये करके दया हे दयासिन्धु अब पार लगाने आ जाओ।। गायत्री शर्मा

सदगुरु कृपानिधान

फूलों के मुस्कान इत्र से ,महक रही फूलवारी मन भंवरा झूमे हर्षाये, ज्ञान ज्योति भंडार से जड़ता मन की दूर हुई, और ख़ाक हुआ अभिमान मिले हैं हमको दीनदयाल, सद्गुरु कृपानिधान।। गायत्री शर्मा

कल्कि अवतार

हे सर्वेश्वर ,कृपानिधान, दीनबन्धु करुणा सागर कर्मश्रेष्ट आत्मदाता तुम,जीवन ज्ञान,सार दर्शाते हे दुखहंता ,जगतनियंता श्रेष्ठ तेरा दीदार है जीवों के उद्धार को आये प्रभु कल्कि अवतार हैं

सच्चे महापुरुष की पहचान

जगमग जिसका अंतर्मन हो, बाहर भीतर स्थितप्रज्ञ हो सुध हो जिसकी आत्मसंयमित ,मानव को कर दे जो भयहीन धर्मसंहिता का ज्ञाता हो ,राम राज्य सा उसका दर हो नीच अधम पतित मानव का ,करता जो उद्धार है देव सदृश चैतन्य महाप्रभू ,सदगुरू तुम्हे प्रणाम है । गायत्री शर्मा

ईश्वर का वास

जीवन का जो मोल न जाने, मानवता का अंत ही जाने चुगलीबाज, घमंड, धृष्टता का ये भाव प्रधान जहाँ राजद्रोह, विश्वासघात,  दुष्प्रवृतियों का है प्रभाव जहाँ ऐसे कुटिल विकृत ह्रदय  में, ईश्वर वास नहीं करता।।। गायत्री शर्मा

श्रेष्ठ कौन?

दर्द  विलाप शोक चिंता से ,क्रंदन उचित नहीं होता झूठे  मान बड़ाई से  ,जीवन गुलजार नहीं होता कुशल ज्ञान उत्तम वाणी से ,मुमकिन है विदूषक बनना पर उत्तम और श्रेष्ट वही जो, मानवता खातिर मिटाता ।। गायत्री शर्मा

पीर के पक्ष

सुख दुःख हार लाभ हानि का ,हर एक पक्ष उभरता है अहंकार अभिमान उत्कृषटता ,मानव को लोभी कर दे जब भी तुम्हारे सौम्य ह्रदय को, कुटिल प्रभाव विवश   कर दे  क्यों न हम हर पीर पक्ष के, पावों को पंगु कर दें। गायत्री शर्मा

अहित करने वाले

 कुटिल, कटु वचनों से मानव ,मानव को छल जाता है अपराधों के आड़ में जो ,उठकर फनकार लगाता है ऐसे विषधर मनुज पवित्र ,धरा का भार हो जाते हैं कुचल दो ऐसे फनों को जो ,मानव के अहित में उठता है गायत्री शर्मा आजादी जिन्ना के महत्वकांक्षाओं के घाट चढ़ गए पुरखों की जमीं छोड़ पाकिस्तान चल पड़े आजादी तो मिली थी हमको हाँ कुछ इस तरह कि बंटवारे के इस दर्द को नासूर कर चले ।। Gayatri sharma

मुक्तक

पश्चाताप के आँसू गिरकर जो उठना चाहे, गर पछतावे में जल जाये  जो धर्म को अपने पहचाने ,और कर्म शाख को लहराये  जीते जी जिसने जित लिए ,भय पीर के इस संसार को राम चरित सा पावन प्राणी, देव सदृश हो जाता है । प्रणय प्रेम  प्रणय प्रेम हृदय में रखकर ,दृढ़ विश्वास बनाये रखना आत्मदाता के श्री चरणों में , सादर  शीष झुकाए रखना कटुक वचन सुनकर जीवन में ,  धैर्य कभी ना खोने देना निष्कपट भावो से जीवन में सद्कर्म को अपनाना  यही प्रेम है यही समर्पण , सद्भावना को बल देना।।                      प्रेम सूत्र में   सूक्ष्म अलौकिक प्रेम सूत्र में ,बांध लिया है तुमने हमको जीवन में अध्यात्म के पथ पर, चलना सिखाया है तुमने भिन्न भिन्न रंगों रूपो में , एक ही रूप लखाया तुमने घट भीतर पट खोल दिया , हर संशय शोक मिटाया तुमने        विज्ञान जहाँ असफल हो जाये  ढूंढते हो तुम जिसे बाहर वह मन मंदिर में बैठा है सुनते हो संगीत धुनों को वह संगीत तुम्हारे अंदर है अपने भीतर सत्य की खोज , योगी हृदय प्रयोगश...