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मुक्तक




पश्चाताप के आँसू

गिरकर जो उठना चाहे, गर पछतावे में जल जाये 
जो धर्म को अपने पहचाने ,और कर्म शाख को लहराये 
जीते जी जिसने जित लिए ,भय पीर के इस संसार को
राम चरित सा पावन प्राणी, देव सदृश हो जाता है ।

प्रणय प्रेम 

प्रणय प्रेम हृदय में रखकर ,दृढ़ विश्वास बनाये रखना
आत्मदाता के श्री चरणों में , सादर  शीष झुकाए रखना
कटुक वचन सुनकर जीवन में ,  धैर्य कभी ना खोने देना
निष्कपट भावो से जीवन में सद्कर्म को अपनाना 
यही प्रेम है यही समर्पण , सद्भावना को बल देना।।

                     प्रेम सूत्र में  

सूक्ष्म अलौकिक प्रेम सूत्र में ,बांध लिया है तुमने हमको
जीवन में अध्यात्म के पथ पर, चलना सिखाया है तुमने
भिन्न भिन्न रंगों रूपो में , एक ही रूप लखाया तुमने
घट भीतर पट खोल दिया , हर संशय शोक मिटाया तुमने


       विज्ञान जहाँ असफल हो जाये 

ढूंढते हो तुम जिसे बाहर वह मन मंदिर में बैठा है
सुनते हो संगीत धुनों को वह संगीत तुम्हारे अंदर है
अपने भीतर सत्य की खोज , योगी हृदय प्रयोगशाला है
विज्ञान जहाँ असफल हो जाये, प्रारम्भ वहीं से अध्यात्म है।।

भक्ति कैसी होनी चाहिए

भक्ति करो तो शबरी जैसी  हठ करना  ध्रुव तारा सा
क्रोध करो दुर्वासा जैसा विनय करो तो सुदामा सा
जायज है  जाहिर करना हर  भाव  हृदय में ज्यों उपजा
मानवता की राह पर चलकर पीर हरो जनमानस का ।।


झूठी प्रतिष्ठा

पद प्रतिष्ठा मान बड़ाई का हो भाव प्रधान जहाँ
चुगलीबाजी और धृष्टता से मानव हो भ्रष्ट सदा
ज्ञान गर्व से महा विदूषक सर्वश्रेष्ठता अहम् पले
विनय नम्रता दया करुण सदवृतियों का हो अंत वहां।।

प्रभु के प्रति सच्ची निष्ठा
आस मेरी जहाँ से लगे न लगे ,तुझसे उम्मीदे मेरी सभी बंध रही
संकटों के पलों में जग संग छोड़ दे,मेरे अंग-संग हे मालिक बस तू ही रहे
हर घड़ी हो उमंगों उम्मीदों भरा, मेरे दामन में कष्टों के कांटे बिछे
पार कर जाऊंगी हर चुनौती को मैं, शर्त ये है दुआओं में तूँ ही रहे।।

ईश्वरीय प्रेम की वर्षा

 तूँ धरा -धाम पर आया ,हरने पीर व्याप्त मानव का
काम क्रोध मद लोभ मोह के, तीरों से घायल मानव
छण भंगुर जग माया में ,खोकर तुझको ही भूल गए
कर दो कृपा हे दयासिन्धु ,अब मिट जाए भव पीर गहन।


तेरी इनायत

आस मेरी जहाँ से, लगे ना लगे
तुझसे आशा जुडी, अंत तक साथ हो
गम नहीं जग मेरा संग ,ज्यों छोड़ दे
खुश हूँ तू है मेरे संग, इनायत तेरी
इससे बढ़कर नहीं कोई ख्वाहिश मेरी।।



प्रेम क्या है मैं शब्दों में कैसे कहूँ

प्रेम क्या है मैं शब्दों में कैसे कहूँ , प्रेम ह्रदय में है ब्यक्त कैसे करूँ
प्रेम शबरी के जूठे बेरों में छिपा , दशरथनंदन के भाव मे प्रगट हुआ
प्रेम मीरा ने की वो दीवानी बनी, गिरधर गोपाल को प्रेम के वश किया
प्रेम ध्रुव नें किया ध्रुव तारा बना, श्री हरि को धरा पर प्रगट कर दिया
प्रेम प्रेमियों ने की है ,प्रभु हंस से जीते जी मुक्ति मार्ग सहज मिल गया ।।


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