टुकड़ों में हम बंटे हुए हैं शुद्र , नारी कर भेद , अस्पृश्यता, अमानवता से ईश्वर को है खेद।। धर्म नहीं नफरत का घोतक सभी को दे सम्मान, धर्म की परिभाषा ना कदापि नारी का अपमान।। पुरुष प्रधान की वेद ऋचाएं, नारी मन को पढ़ ना पाए देव ऋषि नारी पर मोहित लंपट कामी वो कहलाए ।। इंद्र, चंद्र , बाली , रावण छल कर नारी अस्मिता हरे , परमेश्वर पति उपमा पाकर युगो युगों तक भ्रमित करे।। वैश्या , विधवा, बांझ , कुलक्षिणी शब्द उजागर किए है वो, विधुर, नपुंसक , लंपट , कामी , इंद्रिय दोष को ढंकते जो ।। स्वर्ग नर्क भय मति भ्रमित कर धर्म को कट्टर दिखलाते, अति सरल है धर्म का वर्णन , हम इंसान ही बन जाते ।। करो धर्म जप तप व्रत पूजा वैदिक अनुष्ठानों के संग , व्यक्तिवाद, स्वतंत्र विचार पर चढ़े सभी का अपना रंग पुरुषवाद के महिमामंडन से नारी को ना छलना , परिभाषा वह स्वयं गढ़ेगी नारीसत्ता से ना डरना ।। पूजा पाठ करो बेशक ईश्वर को अलंकृत उपमा हो , सहनशील, अबला, बेचारी शब्द कदापि ना स्वीकृत हो।। जातिवाद की जड़े मिटा दो , नास्तिकता मिट जाय...
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