प्रश्नोत्तर काव्य - नंद और वासुदेव जी का मिलन
भ्राता मिलन की चाह लेकर नंद मथुरा को चले
कर कंस का चुकता किये वसुदेव पीड़ा मिल कहे
झरझर बहा पावन अश्रु निष्प्राण दोनों ही खड़े
अन्तस् सराहे भाग्य को कर दोनों के कर में पड़े
प्रेम से हृदय लगे मिल भ्राता उपजा हर्ष विशेष
शोक सन्ताप नहीं उर उनके अब क्या रहा अशेष
हरिमाया को प्रबल ही जानो पुत्र वियोग सहा ना जाये
कुशलक्षेम कहो नंद कृष्ण की हरि की लीला समझ ना आये
पुत्र चाह की थी उत्कंठा उम्र तुम्हारी ढलती आई
किस्मत के तुम धनी हो भाई पुत्र सन्तति आखिर पाई
हम अपना सौभाग्य ही जाने दुर्लभ मिलन अति हर्षाये
सृष्टि चक्र यह क्रीड़ास्थल है मानो पुनर्जन्म हम पाये
सगे सम्बन्धी प्रियजन अपने सदा सर्वदा साथ ना रहते
पाप पुण्य का संग्रह जीवन हम अपना प्रारब्ध समझते
कहो वृक्ष, पशु आश्रय स्थान वहाँ सदा अनुकूलता रहता
मेरे पुत्र को पाला तुमने यशोदा को क्या माता कहता
चिंता बड़ी गहन है भीतर स्वजनों संग प्रीति घनी
तनिक सुखों की लालसा में अनीति कर्म हितकारी नहीं
वसुदेव की व्यथा को जाना नंद कंस अत्याचार कहें
देवकी के संतति विनाश को सुख दुख नियति मान रहे
मेल मिलाप में दोनों ने सुख दुख के पल को बांट लिया
तनि विलम्ब ना किये नंद जी अनुमति ले प्रस्थान किया।।
"श्रीकृष्णकथा महाकाव्य -15"
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