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जनवरी, 2023 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

स्वर आजादी

देशभक्ति में उद्वेलित स्वर बापू का था नाम । हरगिज नहीं मिटेगा क्रांति राष्ट्रहित की हो बात।। फैले भारत मां की ख्याति बापू लिए थे प्रण । क्या हिंदू क्या मुस्लिम भाई मिलकर किए थे रण।। जन जन के भीतर हो गुंजन राष्ट्र भक्ति उद्गार गूंजे भारत मां की जय जय हो आजादी स्वर ।। फिरंगी सत्ता के विरुद्ध लोकमत मिला भरपूर। एकता देख थर्राए दुश्मन दल बल चकनाचूर।। त्याग तपस्या देशभक्तों की याद करेगा जमाना। शहीद दिवस की हर दिल में स्मृतियां पुष्प सजाना।। सत्य अहिंसा के  राह पर चले थे बापू आप । नर नारी सम दृष्टि हो कर करें भारती गान ।। होनी को अति प्रबल जान मुख से निकला राम। छोड़ गए नश्वर संसार कर्तव्य निभाकर आप।। आज मनाएं पुण्य तिथि  करें बापू को हम याद । अक्षुण रहे ये देश हमारा मिलकर करें फरियाद ।।

वीरों को नमन

स् वतंत्र है स्वतंत्र हैं हम पूर्ण गणतंत्र हैं  मां भारती की आन बान शान को सलाम है दुश्मनों का सीना चीरें वीर मेरे देश के चट्टानों से इरादों को नमन है नमन है राष्ट्रवाद लोकमत एकस्वर आजादी अन्य कुछ चाह नहीं आजादी ही चाहिए भारतीय सेना दल बल अस्त्र शस्त्र सज्जित पृष्ठ इतिहास के नवीन है नवीन है अमर जवानों की शहाद्तों को याद करें गणतंत्र महापर्व उत्सव जरूरी है देश का कानून हो हर नागरिक स्वतंत्र हों कुशासित हुकूमत ओ फिरंगियों धिक्कार है कैसे भूल जाएं  हम वीर राष्ट्र भक्तों को इन्ही से इस देश में दिवाली ईद होली है नमन है नमन है स्वराज्य महापर्व है पुनः पुनः मां भारती के वीरों को नमन है।।

वसंत ऋतु (काव्य संगम पत्रिका में प्रकाशित मेरी कृति साझा काव्य संकलन)

     संस्कार न्यूज की पेशकश साझा काव्य संग्रह   

रिश्तों की महक (साझा काव्य संकलन) प्रकाशित

रिश्तों की अनमोल कड़ी ,एक बार जुड़ जाये तोड़े से टूटे नहीं , विफल प्रयास हो जाये आज के रिश्ते कांच के ,  तुरंत ही आहत होय आक्रोशी, लोभी स्वाभाव से , मानवता मिट जाये प्रेम की बात हो सात बार , संभव कैसे होय एक बार जो दिल टूटे , पुनः भरोसा खोय सात हैं फेरे विवाह के , पति-पत्नी के बीच निभा सके ना एक जनम ,सातवाँ कैसे होय प्रेम भाव निष्कपट हो , तो भावना पूजित होय भाव विकृति जब जब बढे , प्राणी दूषित होय दौर 21वीं सदी का है , समय कहाँ है आज टूटे दिल सिंगल रहें , सातवाँ कैसे होय।। मौलिक रचना © गायत्री शर्मा गुंजन (दिल्ली ) लेखक परिचय:  नाम - गायत्री शर्मा गुंजन शिक्षा - बीएड, स्नातकोत्तर (राजनीति विज्ञान) व्यवसाय - स्वतंत्र लेखन

हमरुह पब्लिकेशन द्वारा प्रदत्त सहभागिता सर्टिफिकेट

 

प्रतिलेख सम्मान पत्र

 

प्रतिलेख मासिक पत्रिका में प्रकाशित रचना

 

वसंत ऋतु (साझा काव्य संग्रह)

हे मां शारदे है नमन शारदे  तेरा जन्मदिवस है वसंत शारदे । सूखे पत्ते झरे मन उदासी टरे   इस संसार को जीवन प्राण दे ।। भूलोक धरा पावन हो जहान  इस धरा को हरियाली का वरदान दे । लहलहाए फसल चूमे कलियां चमन  धरती वीरो को मां शारदे तार दे।। तरुणाई भरी आम की  मंजरिया पीली सरसो सजे जैसे दुल्हनिया। मग्न कृषक जवान  खेत फुलवारियां  मुस्काई धरा लेती अंगड़ाइयां।। पीपल बरगद बढ़े  महुआ टपटप झरे  सारे संसार का सर्व अमंगल टरे। झरने पर्वत की कलकल धारा  बहे  तेरे वंदन से ऋतुराज मंगल करें।। विद्या धन यश मिले कीर्ति चन्हू दिस बढ़े  चतुर्दिशाओं  में कलरव  गुंजन रहे । वसंतोत्सव की मुस्कान अधर खिले  मन मस्तिष्क प्रफुल्लित रहे शारदे ।। ©® गायत्री शर्मा गुंजन  स्वतंत्र लेखिका दिल्ली प्रदेश साझा काव्य   संस्कार न्यूज राष्ट्रीय द्वारा  ' काव्य संगम ' में प्रकाशित  पुस्तक का लिंक https://sansnews.com/?page_id=4825

मेरा देह मेरा अधिकार( नारी)

देह मेरा है कोख है मेरी  निर्णय मेरा मैं  नारी । मुझे समझना चाहो तो दूजा जन्म धरो नारी ।। जज करने वालों सुन लो  देह मेरा जागीर नहीं। जब चाहो जैसे तुम रौंदो  कितना सह पाए नारी।। अपने हक को रण चंडी  बने गुस्से में गुर्राते तुम। लांछन पर लांछन देते हो कितनी लज्जित हो नारी।। समय बहुत विकराल है आया  हक में छिड़े है जंग।  नारी देह नारी अधिकार पर चढ़े नारीसत्ता का रंग।।