देह मेरा है कोख है मेरी निर्णय मेरा मैं नारी ।
मुझे समझना चाहो तो दूजा जन्म धरो नारी ।।
जज करने वालों सुन लो देह मेरा जागीर नहीं।
जब चाहो जैसे तुम रौंदो कितना सह पाए नारी।।
अपने हक को रण चंडी बने गुस्से में गुर्राते तुम।
लांछन पर लांछन देते हो कितनी लज्जित हो नारी।।
समय बहुत विकराल है आया हक में छिड़े है जंग।
नारी देह नारी अधिकार पर चढ़े नारीसत्ता का रंग।।

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