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अध्यात्म एक रहस्य

  अध्यात्म एक रहस्य अध्यात्म रहस्य अति गूढ़ है,अपनी मति से जान जितनी आंतरिक यात्रा, उतनी ही पहचान अध्यात्म अलौकिक ज्ञान है ,विज्ञान फेल हो जाय स्वांसों की  इस डोर को , पकड़ सके ना कोय साधना के आकाश में प्राण-अपान के बीच योगी साधक ,साधिका ,साधे प्राण की डोर स्वेच्छा मृत्यु सहज योग, काल खड़ा जब पास काल के धावा बोलते , योगी हो लवलीन जल समाधि राम लें लक्ष्मण सरयू आये वाणशैया पर लेटे ही भीष्मपितामह जाये विवेकानंद समाधि में प्राण साध जग छोड़े गुरु मिले सम परमहँस , सहज योग तब होय अध्यात्म सहज क्रिया-कर्म, तंत्र-मंत्र ना जान भूत-प्रेत ,सब देवता , मोक्ष तत्व से दूर मानव का तन दुर्लभ है , मिले ना बारम्बार टूटा हुआ पत्ता नहीं , कभी शाख पर आये लाख़ 84 जन्म  है ,  जीव काल  का  ग्रास आत्मज्ञान जब तक नहीं, नर ना तरे भव पार।।

मानवता के राह पर

  मानवता के राह पर , अड़चन लाख हज़ार सच्चाई के पथ को बाधित, करता है अज्ञान अज्ञानता की उपज है , स्वार्थ खरपतवार कुसंस्कारों के बीज का , नहीं समूल विनाश सत्संगति के राह पर , चलने को अभिलाषी मार्ग दिखाने वाला हो , विश्व शांति का घोतक धर्म अधर्म के पाट में, पीसता है संसार नफरत,ईष्र्या से करे , स्वार्थ करे प्रगाढ़ सदाचार जिसमे नहीं , मानव दैत्य समान ऋषियों की संतान कहें , और लोक लाज नसाय कर भलाई हो भला,  सेवा , सद्कर्म महान मिटटी का तन धूर है, अंत काल ले जाये ।।

संवाद

  माता-पुत्री के बीच सुंदर संवाद ,"परमार्थ के पथ पर" माता प्रसन्न मुद्रा में ............. माता पुत्री संग में , कर रहीं वार्तालाप आज मातु अति प्रसन्न हैं कहे पुत्री सुन बात नैनों में भर नीर माता कहे , रिश्ता मिला है खास सोच रही हूँ ब्याह रचा दूँ , बसे तेरा घर बार मैं भी चैन से मर पाऊँगी, जब हो तेरा ब्याह दिवस रात्रि हर प्रहर में , मन होता है उदास पुत्री बोली.......... पुत्री कहे ओ प्यारी माता , सोच सोच मत हों परेशान नहीं करूँगी ब्याह मैं अपना, कर ले जितना प्रयास भावनाओं में बांध के  मुझको , मत ले शपथ सगाई का छोड़ चली जाउंगी कहीं , गर  नहीं सुनेगी मेरी बात माता मोहपाश में जकड़ी हुई ........ मातु मोहवश हुई बावली , कैसा पाठ पढ़ा है बेटी तू क्यों इतनी निर्मोही सी, बोल बोलकर मुझे सताये भगवा वस्त्र ना धरने दूंगी, हठ कर ले  तू चाहे जितना मेरी ख्वाहिश घर है बसाना, दुनिया से मुझको क्या लेना पुत्री माँ को मनाती हुई......... रीत नहीं यह भाती मुझको , मन मेरा सन्यासिन है वक्त आज जिस मोड़ ले आया, कहती हूँ मैं मन की बात ना शादी ना दुल्हन जोड़ा , सखियों सा कुछ मुझे ...

मौन प्रार्थनाएँ

 प्रार्थना मौन होती है दिल मे हलचल सी होती है हर एक शब्दों  से मालिक को नमन अरदास होती है  रहमतें लाख है  उसकी जरा दिल हुजरे को खोलो वो दृष्टिगोचर नहीं होता  वही एकांत मिलता है सुखद आगोश में खोए , बिताते दिन जो मौजो में जिसे तुम भूल जाते हो वही  महसूस  होता है बादलों का जो आना हो , जिंदगी दुख थपेडों से  पलक आंसू बहाते हो उसे वो कुबूल करता है  चढ़ावा आंसुओं का भी सुदामा, शबरी सा जो हो दुर्योधन के मेवे छोड़ , विदुर घर साग खाते हैं  पुरातन और पौराणिक कथाओं में जिसे सुनते तुम्हारे सामने तो नहीं मगर वह साथ रहता है  कोई नेकी करे तुमसे , समझ जाना प्रभु रहमत  पुकारोगे अगर प्रभु को , वो दौड़े आ ही जाते हैं प्रत्यक्षम किम प्रमाणम है , ये कहना भी फिजुली है कि ईश्वर अंश हैं हम सब , उसी का नूर फैला है ।।

स्वप्नावस्था के परे

 एक बिंदु से प्रारम्भ  हुई मैं , एक बिंदु पर खत्म हुई वो प्रकाश पुंज था मुझमें मैने , अलौकिक दीदार किया तन की शिथिल अवस्था थी , स्वप्नावस्था आभास हुआ भारी उत्सव के क्रीड़ा में रंगमंच रोमांच भरा रही तटस्थ रंगीन फ़िजा से , हलचल मन में नूतन था  दैवीय आदेश की अवहेलना , तनिक ना मन मे ईष्र्या था आहत थी छण भर घटना से , मुझे आदेश निरन्तर था  अन्तस् ने अभिलाषाओं संग, तुमसे एक आदेश लिया अट्हास भरे इस रंगमंच से , तेरे संग हो दूर चलूँ मैं ,  मेरी रुदन, अन्तस् की पीड़ा, तुमने जान उचित ठहराया ज्यों ही अपने हृदय लगाया , भारी दुविधा दूर हुई  तनिक रही ना सुध बुध तन की , जीवित मुक्ति जान गई।। गायत्री शर्मा

अदृश्य शक्ति

जब पार किया प्रतिछण सुख दुख ,के परे मुझे आभास हुआ कांटो से भरी पगडंडी ने ,  हर मोड़ सुखद एहसास भरा हर सफ़र में तेरा साथ मिला , मुश्किल घड़ियाँ आसां हुई जो बनकर आया हितैषी सदा, तेरी रहमत का पैगाम मिला,  अंतर्मन की अभिलाषाएँ , एक कल्पवृक्ष मुझमें है  छुपा पग पग अदृश्य अलौकिकता , घेरे है मुझे चहूँ ओर दिशा नतमस्तक मैं करबद्ध  विनय, करूँ व्यक्त हृदय उद्गार सभी रुख मोड़ मेरा भव सागर से , मुक्ति का मार्ग दिखा दो प्रभु, गायत्री शर्मा

कठिन राहें

कठिन मेरी उन राहों को  तुम सरल कभी मत करना बस इतनी शक्ति मुझे देना मैं कठिन परिश्रम के द्वारा आशीष तुम्हारा पाकर  उन राहों पर चल पाउँ माना कि बहुत कठिन जीवन हर पल ,प्रतीक्षण मुश्किल पग है पर सुख दुख आना जाना है  गीता का सार यही है  इस सार को समझ सकूं मैं बस इतनी शक्ति मुझे देना आखिर इन राहों पर चलकर बिरले ही महापुरुष कहलाया ।

लफ्ज खामोश हैं

तुम रहमत ए अशरफिया लाख लुटाते रहे मैं दूर ही  खड़ी तुम्हे निहारती रही गवाह मेरा दिल है तुम्हारे दरिया ए दिल का तेरी रूहानियत का कमाल मैं देखती रही ये दिल ही जनता है उस आलम को मेरी खामोश लफ्जों में तेरी इबादत को ।

तेरी रहमतों का पैगाम

जो महसूस करता है दिल मेरा, उस आभास को मैं लिख दूँ तेरे संग आत्मीयता का जुड़ा एहसास मैं  लिख दूँ तेरी  रजा में समानता का व्यवहार मैं लिख दूँ शब्दों की सीमाओं को तोड़ तेरा गुणगान मैं लिख दूँ बेअंत तेरी ताकत के आगे नतमस्तक जहाँ लिख दूँ मेरी पहचान तुझसे है तुझे बेमिसाल लिख दूँ दुनिया के साजिशों के बीच दरिया सा दिल तेरा लिख  दूँ सुर में तूँ संगीत में त्रिवेणी धार संगम लिख दूँ मेरी औकात तो कुछ भी नहीं तेरी खूबियाँ सारी लिख दूँ तुझे उन फरिश्तों  में खास लिखूं  कण कण में तू बसा लिखूं इंसानियत पर  मिटने वालों को , तेरी रहमतों का सुंदर पैगाम लिख दूँ।।

हरि भक्ति गर करना चाहो

हरि भक्ति गर करना चाहो, तन मन धन के मोह को त्यागो प्रेम किया है  प्रभु जी से तो ,मीरा ,ध्रुव ,प्रह्लाद भक्त सा दुख सहने की क्षमता रखो.... भक्ति मार्ग अति सहज नहीं है ,नित्य प्रयास से सुगम करो संशय नहीं है भक्ति में जिसके , आवागमन चक्र से प्राणी प्रभु  कृपा से पार हो जाता है..... नदियाँ ज्यों ही समुद्र में मिलकर , अस्तित्व समुद्रमय करती हैं तब नाम हो गंगा या कावेरी , अनंत में अनन्त कहाती हैं ऐसे प्राणी निज धाम पहुंचकर अमर अलौकिक सत्ता के दुर्लभ साम्राज्य को पाता है.....

संसार के भंवर में 'पुकार'

भंवर में फंसी नैया मेरी , प्रभु जी  मेरे पार लगाना मन में दृढ़ विश्वास हो मेरे , हरि काल चक्र से मुझे छुड़ाना डूबते सूरज सा यह जीवन , ज्ञान पुंज से रौशन करना क्या मांगू वर जग का तुमसे ,तुम हो सर्व कला का ज्ञाता भक्तों के हो प्राण आधारा ,  कल्पतरु मन मांहि समाये अंतिम मन कि अभिलाषा है, निकट मृत्यु समीप खडी हो ध्यान लीन लवलीन हो मेरा , सुखद विदाई अंतिम क्षण हो।।

प्रणय प्रेम हृदय में

प्रणय प्रेम हृदय में रखकर ,दृढ़ विश्वास बनाये रखना आत्मदाता के श्री चरणों में , सादर  शीष झुकाए रखना कटुक वचन सुनकर जीवन में ,  धैर्य कभी ना खोने देना निष्कपट भावो से जीवन में सद्कर्म को अपनाना  यही प्रेम है यही समर्पण , सद्भावना को बल देना।।

प्रेम सूत्र में

सूक्ष्म अलौकिक प्रेम सूत्र में ,बांध लिया है तुमने हमको जीवन में अध्यात्म के पथ पर, चलना सिखाया है तुमने भिन्न भिन्न रंगों रूपो में , एक ही रूप लखाया तुमने घट भीतर पट खोल दिया , हर संशय शोक मिटाया तुमने

विज्ञान जहाँ असफल हो जाये

ढूंढते हो तुम जिसे बाहर वह मन मंदिर में बैठा है सुनते हो संगीत धुनों को वह संगीत तुम्हारे अंदर है अपने भीतर सत्य की खोज , योगी हृदय प्रयोगशाला है विज्ञान जहाँ असफल हो जाये, प्रारम्भ वहीं से अध्यात्म है।।

मेरी चाहत है मिले साथ तुम्हारा

मेरी चाहत है मिले साथ तुम्हारा , अपनो का मिला मुुझे साथ तो क्या मैने देखा है नेमत सिर्फ तुम्हारा दुख दर्द में जब् कोई आगे आया उस शख्स् को मैंने फरिश्ता माना पूर्ण किया हर काज को तुमने इच्छा अधिक न रही है मन में क्या कर्म दिखा मुझमें मेरे मौला हर वक्त तुझे मैंने करीब पाया एक एहसास है  तू कोई शून्य कहे त्रिनेत्र जो खोले वह प्रत्यक्ष कहे निज रूप है क्या ब्रम्हज्ञानी कहे नादान तुझे निराकार कहें मूर्ति पूजन कोई सत्य कहे जंजाल कर्मकांडी ये कहें वह मूढ़ मति कोई क्या समझे निराकार ब्रम्ह का प्रागट्य करें  चैतन्य प्रभु की भक्ति को तरसें त्रिदेव नारद और सनकादिक नर तन देवहुँ एक बार प्रभु मोक्ष मार्ग का है तन साधन कहे नानक जन है बड़भागी मानुष जन्म सौभाग्य मिला धन्य है जिसने नर तन पाया आदि नाम वह गुप्त है जिसको कृपा कर तुमने हृदय में लखाया बड़भागी मैने साकार को पाया साकार ब्रम्ह पर बलि बलि  जॉउ सत्य वचन कहें वेद वेद पुराण  राम बुलावा भेजिया , दिया कबीर रोय जो सुख साधु संगत में सो बैकुंठ न होय।।

विधाता पर प्रश्नचिन्ह

आखिर क्यों कुछ प्रश्न हैं ऐसे,  जो हृदय में शूल बन चुभ रहे हैं क्यों नमन करते हो तुम उस विधाता को ,  जिसने जीवन का अनमोल उपहार भेंट किया क्यों कोसते हो तुम उसे जब ,  दुखों की बिजली गिरती है और हृदय पीड़ा की गर्जन से  हाहाकार मचाते हो क्यों आभार प्रकट करते हो तुम ,  जब कुदरत के गोद में स्वयं को आनंदित पाते हो क्यों रुसवाई दिखती है  हर तरफ  ,  जब गरीब दरिद्रता के सागर में मानव तिल तिल कर मर रहा होता है क्यों दोष मढ़ते हो उस पर ,  जो अपनी हार को जीत में बदलने में अक्षम होते हो क्यों फुले नहीं समाते जब  मनचाही  इच्छा पूरी हो जाए और हृदय के अनंत तलों से  उसका आभार प्रकट करते हो फिर। क्या यह सम्भव नहीं कि  हम उस विधाता के प्रति अपनी डांवाडोल प्रवृति छोड़ ,  एकनिष्ठ भाव कायम कर सकें।।

ग्लू और कागज

कागज के टुकड़ों को ग्लू से, जोड़कर देखा होगा तुमने वैसे ही यह जीवन भी, प्रणय विरह से जुड़ा हुआ है हर एहसास इस मन पर, क्यों करता है आघात हर्ष,शोक,और व्याकुलता इस चंचल मन  का साम्राज्य दृढ़ होती अब अंतर्मन में , इच्छाएँ बनकर नयी तरंगें जैसे ग्लू से चिपका कागज टुकड़ो में बंट जाता है ऐसे ही  यह मन शरीर से, दृढ़ता से जकड़े जाता है तब अंतकाल पीड़ा का कारण, यह चंचल मन होता है मन को प्रभाव से मुक्त करे जो, हंसते हुए निर्वाण पा जाता है।

कठिन राहों पर

कठिन  मेरी उन राहों को , तुम सरल  कभी मत करना बस इतनी शक्ति मुझे देना , मै कठिन परिश्रम के द्वारा आशीष तुम्हारा पाकर , उन  राहों पर चल पाऊं माना कि बहुत कठिन जीवन , हर पल प्रतिक्षण मुश्किल पथ है पर सुख दुख आना जाना है गीता का सार यही है इस सार को समझ सकूं मैं , बस इतनी शक्ति मुझे देना कठिनाइयों के रस्ते चलकर, बिरले ही महापुरुष बन पाया।।

मानवता ही पूजा

★ज्ञान दीपक दे हृदय में ज्ञान ईश्वर का कराया पंचभौतिक देह भीतर अखण्ड ज्योति को लखाया व्यक्त करते हैं  सजल हृदय के सब  उद्गार हम त्रिदेव तुल्य हे गुरुवर, करबद्ध तुमको है नमन।। ★ कर्तव्य पथ पर चलने वाले ज्ञान गुण को धरने वाले ज्ञान और विज्ञान का सरलीकरण वे करने वाले  विलक्षणी प्रतिभा उर धारे लौकिक सुख को त्याग  जन जन की सेवा में उतरे जनमानस के लाल ।। ★कोरोना जंग है भारी , छुपे शत्रु सा है जारी नहीं उपाय है कोई सामाजिक दूरी है जारी छोड़ सब थाट जिसने पीड़ितो को अन्न वितरित की कौम ए इंसानियत की उदरतााएँ हमने  है देेेखी।। ★ऋषिकेश कर्णप्रयाग रेल लाइन को बना,शिलान्यास जनता के लिए कर डाला है देवभूमि संतो के धाम को प्रयागराज, तक अभी रेल प्रोजेक्ट अति भाया है काम जो किया है उत्तराखंड सरकार ने  ,ये अभी तक किसी के समझ नहीं आया है केंद्र का समर्थन ऐसे ही मिलेगा तब, सार्थक सालों का प्रयास हो जाना है ।।

भक्ति करो तो शबरी जैसी

भक्ति करो तो शबरी  जैसी  हठ करना  ध्रुव तारा सा क्रोध करो दुर्वासा जैसा विनय करो तो सुदामा सा जायज है  जाहिर करना हर  भाव  हृदय में ज्यों उपजा मानवता की राह पर चलकर पीर हरो जनमानस का ।।

गुरु पूर्णिमा दो शब्द

 ज्ञानदाता है गुरु, अति श्रेष्ठ कर्म पहचान है दीदार ईश्वर का कराते, गुरू पूजा कर उन्हें रिझाते।।  गुरु प्रेरणा है शिष्य का ,  उर में ज्ञान का पुंज भर गुरु मेटते अज्ञान तम, दिल से करें उनको नमन।। पावन दिवस गुरुपूजा है, युग-युग से यही विधान है गुरु-शिष्य का शुभ परंपरा, दर्शाए ज्ञान महत्वता।।  मानव से  महामानव तक , अलख जगाते हैं गुरुवर ज्ञान,ध्यान,शुभ कर्म का, मर्म बताते हैं गुरुवर।। नफरतों का सिलसिला खत्म हो , हर प्राणी में सद्भाव हो मानवता की धुरी पर रखकर , विश्व का कल्याण हो यही ज्ञान देते हैं गुरु , सुसंस्कृतियों  का पाठ पढा बैठें सहृदय गुरु चरणों में, मिट जाए अज्ञानता गहन।।

गुरु पूर्णिमा लेख

गुरु पूजा क्यों है ख़ास----- गुरु र्च ब्रम्हा गुरु र्च विष्णु गुरु देवो महेश्वरा.......... गुरु और शिष्य परंपरा अमर सनातन धर्म का सिद्धांत है  पुरातन  समय में महर्षि वेदव्यास जी द्वारा धर्म-शास्त्रों की व्याख्या की गई थी और गुरु शिष्य परंपरा की नींव पड़ी । गुरु पूर्णिमा का  अर्थ है  जब चांद अपने पूर्ण रूप में होता है और वेदवास जी का जन्म भी इसी पूर्णिमा में हुआ था जिस कारण उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा मनाया जाने लगा । समय के साथ- साथ  गुरु शिष्य परंपरा में अनेकों बदलाव  हुए । मुस्लिम धर्म में पैगम्बर, सूफी,औलिया, हिन्दू धर्म में मठाधीश, मंडलेश्वर,महामंडलेश्वर की उपासना, सिक्ख धर्म में 10 सच्चे  बादशाहों की पूजा  , यहूदी धर्म में जीसस की उपासना  का ट्रेंड अस्तित्व में आया । गुरु पूजा का महत्त्व--  बालक जब धरती पर जन्म लेके आता है उसके भावी भविष्य की नींव गढ़ने के लिए पुरातन गुरुकुलों ,आधुनिक स्कूलों , मदरसों में भेजने का प्रावधान था । जीवन के मूलभूत आजीविका हेतु ज्ञान और कर्म को महत्व दिया गया है । शिक्षक दिवस  जो कि सर्वपल्ली र...

मुक्तक

सदवृतियों का अंत पद प्रतिष्ठा मान बड़ाई का हो भाव प्रधान जहाँ चुगलीबाजी और धृष्टता से मानव हो भ्रष्ट सदा ज्ञान गर्व से महा विदूषक सर्वश्रेष्ठता अहम् पले विनय नम्रता दया करुण सदवृतियों का हो अंत वहां।। ★संयुक्त परिवार पर भरा पूरा अगर परिवार हो खुशियाँ चौगुनी हो खुशी और गम में हों सब साथ धरती भी स्वर्ग सा हो  कौन कहता है एकल ही वही परिवार खुश रहते आपसी प्रेम हो दिल में संयुक्त परिवार खुश रहते ।। ★निस्वार्थ भावना पर किसी पर जान छिड़कूँ तो कभी उम्मीद ना रखती ,  निभाती हूँ जिन रिश्तों को सदा सहयोग करती हूँ   सामाजिक दोहरे प्रपंचों ,से खुद तटस्थ रहती हूँ मगर वंचित सामाजिक कार्य को सौभाग्य कहती हूँ ।। ★छल प्रपंच पर सरल दिखती हूँ पर मुझको समझना है नहीं आसां  घटाएं नभ में छाती हैं मगर बरसात होती क्या जो जैसा है उसे उसकी ही भाषा में समझती हूँ  चाल कोई चले हर बात का उत्तर मैं होती हूँ ।। ★परमार्थ पर सरल हूँ सहज हूँ अव्यक्त भावों का समन्दर हूँ  , सामाजिक रोष से कुपित सृजित उद्गार करती हूँ ,  विरोधी हूँ  कट्टरता की ,  सामाजिक दूरी रखती हूँ , ...

मन से हारो नहीं

मन से हारो नहीं मन से जीतो सदा धीरे धीरे सही बढ़ते जाओ सदा थाम ले जो अगर सहसों  का शिखर ध्वस्त हो जाये राहों का हर एक गम।।

ज्ञान निधि

भय नाशे दुर्मति हरे शिष्य को ऐसा तराश करे पूरे गुरु जिसको मिले जन्म जन्म भव त्रास मिटे दर्शन सेवा पुण्य प्रताप से जीवों के सब पाप कटे हृदय में धरकर ध्यान गुरु का भवसागर से पार उठे।।

गुरु शिष्य का नाता

अहंकार को तजकर जो निष्काम भाव भरपूर भरे अपने सुख को छोड़ कर गुरु सेवा में  लवलीन रहे अन्तस् आनँद की जननी है सेवा जो निष्काम है उस पर प्रसन्न हो जाये गुरुवर  हो जाए कल्याण है।।

सच्चा सद्गुरु

बिन बोले सब कुछ वो जाने भरम की काई दूर हटाये धर्म कर्म का ज्ञान कराकर पूर्ण समर्पित मार्ग बताए स्वाभाविक है इस जीवन मे सर्वसुखों का मिल जाना पर इतना भी सहज नहीं है सच्चा सद्गुरु मिल पाना ।।

सेवक की पहचान

चतुराई और लोभ लोलुपता का नहीं भाव प्रधान हो  प्रेमी हो वह सजल  हृदय से छल प्रपंच से दूर हो धूप छांव हो या संताप ये जीवन चाहे कठिन लगे डटा रहे वह कर्म के पथ पर कलुषित हृदय ना भाव हो वही है सेवक गुरु चरणों का  उस पर कृपा अपार हो। ।

भजन- तेरी रहमतें हम पर बरसने लगी

तेरी रहमतें हम पर बरसने लगी , भूलकर इस जमाने को रमने लगे एक नाता है तुझसे जुड़ा भाव का , सारे झूठे प्रपंचों से हटने लगे तेरी कृपा  है सागर में मोती के जस जिसकों मिलता है सौभाग्य होता उदय तेरे गुणगान में ऐसी शक्ति छिपी दुनिया से अब विरक्ति का मार्ग मिला फूले हम  हैं समाते क्या किस्मत मिला नहीं दुनिया से कोई  रहा वास्ता जो भी वर मांगना है तुम्ही से कहें  हसरतें लाख करने से क्या फायदा दीन दुखियों की करके सेवा धर्म तेरे राहों पर चलने का मार्ग मिले कर चलें नेक कर्मों को दुनिया से हम अंत हो इस जन्म की विदाई सुखद।।

जनमाष्टमी गीत

आनंद छायो आयो  कृष्ण लाला मानवता का संदेश लाया धर्म ध्वजा को उसने  फहराया आनंद छायो........ लीलाएं उसकी देखे ये जमाना आत्मज्ञान का तोहफा लाया अपनी लीलाओं से जब को नचाया आनंद छायो........ दर्शन उसका दुख भी नसाया खुशियों की वह सौगात लाया आगमन उसका बड़ा ही सुहाना आनद छायो.......... लौकिक प्रेम से  अनन्त निराला ज्ञान पुष्प का बाँटनहारा निश्चय उसका हो जग कल्याण आनंद छायो........

भजन- तेरा रूप है जग से निराला

तेरा रूप है जग से निराला मेरे प्रभुजी दीन दयाला तूँ है भक्तों का प्रतिपाला मेरे प्रभुजी दीन दयाला निष्काम कर्म और पूजा मेरे जीवन का हो आधारा घट-घट  में समाने वाले मेरे प्रभुजी दीन दयाला हमको सन्मार्ग दिखाने आया है तूँ इस जहाँ में अज्ञानता हरने वाले मेरे प्रभुजी दीन दयाला संदेह नहीं है मन में भव  तारण की है बारी हृदय को बदलने वाले मेरे प्रभुजी दीन दयाला तेरा सुंदर रूप सलोना  मैं देख- देख मुस्काई नजरों में तुम्हे बसाया मेरे प्रभुजी दीन दयाला एक तार जुड़ा है तुमसे तुम बिन अब चैन कहाँ है चरणों का दे दो सहारा मेरे प्रभुजी दीन दयाला तेरी भक्ति जग से निराली , मेरा भाग्य  तुझे मैंने पाया हो भव भय हारने वाले मेरे प्रभुजी दीन दयाला ।।।

सुविचार 3

जिस प्रकार एक कछुआ खतरा सामने आने पर अपनेअंगो को अपनी ढाल में समेट  लेता है उसी प्रकार एक आत्मज्ञानी भक्त को संसार के माया रूपी खतरों से बचने के लियेप्रभु के नाम रूपी ढाल में अपनी बाहरी वृतियीं को समेट लेना चाहिए ।। भक्ति में बाधक है हमारा आलस्य ,  अत्यधिक् भोजन करना हमारे जीवन को विलासी बनाता है एक योगी को चाहिए कि वह अपनी समस्त ऊर्जा को अपने भीतर समेत  ले और सांसारिक पदार्थों को सीमित  रूप में धारण करे ।। मन की तीव्र गति भटकाव का कारण है सच्चे सद्गुरु के शरण मे आकर ही हमें भटकाव  से बचने का मार्ग मिलता है और दुर्लभ आत्मज्ञान की सिद्धि से प्राणी भव सागर  तर जाता है । ।

गीत -देवभूमि के प्रहरी

कितना प्यारा स्वप्न तुम्हारा दशकों से एक ख्वाब बुना देवभूमि उत्तराखंड का प्राचीनतम इतिहास रहा स्वप्न तुम्हारा  पर्वत की छाती पर छुक-छुक रेल चले देव लोक का मार्ग दिखाता उत्तराखंड समृद्ध बने।। प्रकृति की छटा मनोहर पर्वत शीर्ष मुकुट बादल हैं लोक संस्कृति शोभा न्यारी , नदिया की कलकल धारा है  देवभूमि उत्तराखंड हमारा गुलमर्ग ,हिमाचल सा सुंदर है रेल प्रोजेक्ट को स्वप्न ही कहकर हंसते थे जो लोग कभी आज सभी एक स्वर  में बोलें उत्तराखंड  हमारा है ।। ऋषियों की यह पावन धरती पुनः आज तैयारी है पर्यटन को मिलेगा अवसर रोजगार का सृजन हो थम जाएगा सभी पलायन , और सीमाएं सुरक्षित हों ख्वाब हकीकत में तब्दील हो , मंजूरी सरकारी है ऊंची ऊंची नभ को छूती पर्वत की श्रृंखलाओं में रेल चलेगी जब पर्वत पर कल की इक बुनियाद बने क्षेत्र सुरक्षित , सीमा  सुरक्षित रोजगार भरपूर मिले सपन सुनहरे भविष्य की गढ़कर तुमने जो उपकार किया याद रखेगा जनमानस इतिहास अमर हो जाएगा ।। ।

सुविचार 2

शांत स्वभाव को अपनी कमजोरी न समझें यह स्वभाव आपके विचारों का प्रतिबिंब है ।। गर्व और मद में चूर होकर सूखे वृक्ष की तरह हम रहेंगे  तो फलों से लदी डाल से हमने झुकना सीखा ही नहीं ।। अहम की जड़ को यदि आप काट ना सके  तो संस्कारों की उपज को हम समझ ना सके ।। पगडंडियां मार्ग दिखाती है , आध्यात्म पथ के  राही  आत्मकल्याण की पगडंडी पर चलें तो पारलौकिक सफर आसान हो जाएगा ।। जितना सूक्ष्म ब्रम्हांड है उतना ही सूक्ष्म मानव मन की गति मन की एकाग्रता का रहस्य संत महापुरुषों से जाना जा सकता है ।। शारीरिक रोग उपचार से ठीक हो सकता है किंतु आत्मिक रोग आध्यात्मिक चिकित्सक से ही सम्भव है ।। दुनिया मे भ्रमण करने के लिए हमें वीजा बनाना पड़ता है परलोक के लिए अच्छाई का पहचान पत्र हमे खुद बनना होगा।। अपने मन में बुराई के वायरस को मत आने दो  अच्छाईयों के एंटीवायरस से डिलीट करते रहो  जीवन रूपी कंप्यूटर सदैव सक्रिय रहेगा।।

सुविचार 1

विनम्रता मनुष्य का आभूषण है , जो व्यक्ति मन एवं आचरण दोनों से उदार होगा ,वही इन्सान परमेश्वर का प्यारा होगा ।। परमेश्वर प्रेम है जीवों से प्रेम करो ,उसके संसार को प्रेम बांटो किसी को ठेस पहुंचाकर हम सुख की कल्पना नहीं कर सकते ।। गुणी व्यक्ति कभी किसी की बुराई नहीं देखता यही इन्सान का सबसे बड़ा गुण होता है ।। अमरत्व का ज्ञान हमें शाश्वत ज्ञान से जोड़ता है शरीर से मोह समाप्त होना ही मोक्ष का धाम है ।। विद्युत प्रवाह के लिए ठंडी गर्म तारों का सम्पर्क होता है ठीक उसी प्रकार ईश्वरीय पॉवर हाउस से जोड़ने के लिए अच्छाई बुराई दोनों का सामना करना होगा ।। हमारा दिल ही मंदिर,मस्जिद,गिरजा है जहां परमात्मा अपनी रजा में रहता है उसकी रूहानी ताकत हम बंदों को नेकी पर चलाती है ।। बंजर धरती उपजाऊ बन सकती है , दरिद्र धनवान बन सकता है मरुस्थल में पानी बह सकता है ,परन्तु अहंकारी हृदय में प्रेम उत्पन्न नहीं किया जा सकता ।। धरती पर पाप बढ़ने पर प्रकृति विध्वंसक हो जाती है मानव दोहन करता है और कुदरत न्याय करती है तो रूह कांप जाती है।। क्रोध को खुद पर हावी मत करो , प्रेम से व्यवहार करो अक्सर...

आत्मिक चेतना

जब मैं सिर झुकाती हूँ  तेरे दर पर मुझमें आत्मिक चेतना ज़ाग उठती है जैसे कोई निर्जीव पौधा पुनः जीवित हो उठे आभास ही कुछ ऐसा है कि वाणी और स्वर दोनों मंत्रमुग्ध हैं नतमस्तक हूँ मैं तेरी उदारता देख दुर्भाग्य है उनका जो हंसते हैं तुझसे प्रेम करने वालों पर ।। गायत्री शर्मा