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संवाद

 

माता-पुत्री के बीच सुंदर संवाद ,"परमार्थ के पथ पर"

माता प्रसन्न मुद्रा में .............

माता पुत्री संग में , कर रहीं वार्तालाप
आज मातु अति प्रसन्न हैं कहे पुत्री सुन बात
नैनों में भर नीर माता कहे , रिश्ता मिला है खास
सोच रही हूँ ब्याह रचा दूँ , बसे तेरा घर बार
मैं भी चैन से मर पाऊँगी, जब हो तेरा ब्याह
दिवस रात्रि हर प्रहर में , मन होता है उदास

पुत्री बोली..........

पुत्री कहे ओ प्यारी माता , सोच सोच मत हों परेशान
नहीं करूँगी ब्याह मैं अपना, कर ले जितना प्रयास
भावनाओं में बांध के  मुझको , मत ले शपथ सगाई का
छोड़ चली जाउंगी कहीं , गर  नहीं सुनेगी मेरी बात

माता मोहपाश में जकड़ी हुई ........

मातु मोहवश हुई बावली , कैसा पाठ पढ़ा है बेटी
तू क्यों इतनी निर्मोही सी, बोल बोलकर मुझे सताये
भगवा वस्त्र ना धरने दूंगी, हठ कर ले  तू चाहे जितना
मेरी ख्वाहिश घर है बसाना, दुनिया से मुझको क्या लेना

पुत्री माँ को मनाती हुई.........

रीत नहीं यह भाती मुझको , मन मेरा सन्यासिन है
वक्त आज जिस मोड़ ले आया, कहती हूँ मैं मन की बात
ना शादी ना दुल्हन जोड़ा , सखियों सा कुछ मुझे ना भाया
सन्यासी ले भेष मैं माता , दुनिया को कुछ लौटा जाऊँ
तूँ मेरे जिस देह को चाहे , इर्द गिर्द तेरे पास रहेगा
किन्तु  विक्षोभ के भय से क्यों , मुझको माया में बांध रही
मेरा मत स्पष्ट रखा है ,  माया में नहीं सुख़ रखा है
पल पल मन से मरूँगी और हृष्ट - पुष्ट  गर तन से दिखूंगी
क्या तुमको मंजूर होगा , तिल -तिल मरता देख सकोगी

माँ मोह जाल से निकलकर बोली............

माता स्वर में  कसक लिए ,बेटी का मत जान गई
पर्दा हटाया मोह का मन से , तेरी ख्वाहिश नहीं मरेगी
सन्मार्ग पर चलना बेटी, दुनिया को भी  राह दिखाना
सन्यासिन चोला धरकर , दया-धर्म  उपकार करो
तूने अपना मत जो बताया, हठ के आगे हार गयी मैं
गर्व है तूने जीवन अपना , परमार्थ के पथ पर छोड़ा ।।

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