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जुलाई, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

लफ्ज खामोश हैं

तुम रहमत ए अशरफिया लाख लुटाते रहे मैं दूर ही  खड़ी तुम्हे निहारती रही गवाह मेरा दिल है तुम्हारे दरिया ए दिल का तेरी रूहानियत का कमाल मैं देखती रही ये दिल ही जनता है उस आलम को मेरी खामोश लफ्जों में तेरी इबादत को ।

तेरी रहमतों का पैगाम

जो महसूस करता है दिल मेरा, उस आभास को मैं लिख दूँ तेरे संग आत्मीयता का जुड़ा एहसास मैं  लिख दूँ तेरी  रजा में समानता का व्यवहार मैं लिख दूँ शब्दों की सीमाओं को तोड़ तेरा गुणगान मैं लिख दूँ बेअंत तेरी ताकत के आगे नतमस्तक जहाँ लिख दूँ मेरी पहचान तुझसे है तुझे बेमिसाल लिख दूँ दुनिया के साजिशों के बीच दरिया सा दिल तेरा लिख  दूँ सुर में तूँ संगीत में त्रिवेणी धार संगम लिख दूँ मेरी औकात तो कुछ भी नहीं तेरी खूबियाँ सारी लिख दूँ तुझे उन फरिश्तों  में खास लिखूं  कण कण में तू बसा लिखूं इंसानियत पर  मिटने वालों को , तेरी रहमतों का सुंदर पैगाम लिख दूँ।।

हरि भक्ति गर करना चाहो

हरि भक्ति गर करना चाहो, तन मन धन के मोह को त्यागो प्रेम किया है  प्रभु जी से तो ,मीरा ,ध्रुव ,प्रह्लाद भक्त सा दुख सहने की क्षमता रखो.... भक्ति मार्ग अति सहज नहीं है ,नित्य प्रयास से सुगम करो संशय नहीं है भक्ति में जिसके , आवागमन चक्र से प्राणी प्रभु  कृपा से पार हो जाता है..... नदियाँ ज्यों ही समुद्र में मिलकर , अस्तित्व समुद्रमय करती हैं तब नाम हो गंगा या कावेरी , अनंत में अनन्त कहाती हैं ऐसे प्राणी निज धाम पहुंचकर अमर अलौकिक सत्ता के दुर्लभ साम्राज्य को पाता है.....

संसार के भंवर में 'पुकार'

भंवर में फंसी नैया मेरी , प्रभु जी  मेरे पार लगाना मन में दृढ़ विश्वास हो मेरे , हरि काल चक्र से मुझे छुड़ाना डूबते सूरज सा यह जीवन , ज्ञान पुंज से रौशन करना क्या मांगू वर जग का तुमसे ,तुम हो सर्व कला का ज्ञाता भक्तों के हो प्राण आधारा ,  कल्पतरु मन मांहि समाये अंतिम मन कि अभिलाषा है, निकट मृत्यु समीप खडी हो ध्यान लीन लवलीन हो मेरा , सुखद विदाई अंतिम क्षण हो।।

प्रणय प्रेम हृदय में

प्रणय प्रेम हृदय में रखकर ,दृढ़ विश्वास बनाये रखना आत्मदाता के श्री चरणों में , सादर  शीष झुकाए रखना कटुक वचन सुनकर जीवन में ,  धैर्य कभी ना खोने देना निष्कपट भावो से जीवन में सद्कर्म को अपनाना  यही प्रेम है यही समर्पण , सद्भावना को बल देना।।

प्रेम सूत्र में

सूक्ष्म अलौकिक प्रेम सूत्र में ,बांध लिया है तुमने हमको जीवन में अध्यात्म के पथ पर, चलना सिखाया है तुमने भिन्न भिन्न रंगों रूपो में , एक ही रूप लखाया तुमने घट भीतर पट खोल दिया , हर संशय शोक मिटाया तुमने

विज्ञान जहाँ असफल हो जाये

ढूंढते हो तुम जिसे बाहर वह मन मंदिर में बैठा है सुनते हो संगीत धुनों को वह संगीत तुम्हारे अंदर है अपने भीतर सत्य की खोज , योगी हृदय प्रयोगशाला है विज्ञान जहाँ असफल हो जाये, प्रारम्भ वहीं से अध्यात्म है।।

मेरी चाहत है मिले साथ तुम्हारा

मेरी चाहत है मिले साथ तुम्हारा , अपनो का मिला मुुझे साथ तो क्या मैने देखा है नेमत सिर्फ तुम्हारा दुख दर्द में जब् कोई आगे आया उस शख्स् को मैंने फरिश्ता माना पूर्ण किया हर काज को तुमने इच्छा अधिक न रही है मन में क्या कर्म दिखा मुझमें मेरे मौला हर वक्त तुझे मैंने करीब पाया एक एहसास है  तू कोई शून्य कहे त्रिनेत्र जो खोले वह प्रत्यक्ष कहे निज रूप है क्या ब्रम्हज्ञानी कहे नादान तुझे निराकार कहें मूर्ति पूजन कोई सत्य कहे जंजाल कर्मकांडी ये कहें वह मूढ़ मति कोई क्या समझे निराकार ब्रम्ह का प्रागट्य करें  चैतन्य प्रभु की भक्ति को तरसें त्रिदेव नारद और सनकादिक नर तन देवहुँ एक बार प्रभु मोक्ष मार्ग का है तन साधन कहे नानक जन है बड़भागी मानुष जन्म सौभाग्य मिला धन्य है जिसने नर तन पाया आदि नाम वह गुप्त है जिसको कृपा कर तुमने हृदय में लखाया बड़भागी मैने साकार को पाया साकार ब्रम्ह पर बलि बलि  जॉउ सत्य वचन कहें वेद वेद पुराण  राम बुलावा भेजिया , दिया कबीर रोय जो सुख साधु संगत में सो बैकुंठ न होय।।

विधाता पर प्रश्नचिन्ह

आखिर क्यों कुछ प्रश्न हैं ऐसे,  जो हृदय में शूल बन चुभ रहे हैं क्यों नमन करते हो तुम उस विधाता को ,  जिसने जीवन का अनमोल उपहार भेंट किया क्यों कोसते हो तुम उसे जब ,  दुखों की बिजली गिरती है और हृदय पीड़ा की गर्जन से  हाहाकार मचाते हो क्यों आभार प्रकट करते हो तुम ,  जब कुदरत के गोद में स्वयं को आनंदित पाते हो क्यों रुसवाई दिखती है  हर तरफ  ,  जब गरीब दरिद्रता के सागर में मानव तिल तिल कर मर रहा होता है क्यों दोष मढ़ते हो उस पर ,  जो अपनी हार को जीत में बदलने में अक्षम होते हो क्यों फुले नहीं समाते जब  मनचाही  इच्छा पूरी हो जाए और हृदय के अनंत तलों से  उसका आभार प्रकट करते हो फिर। क्या यह सम्भव नहीं कि  हम उस विधाता के प्रति अपनी डांवाडोल प्रवृति छोड़ ,  एकनिष्ठ भाव कायम कर सकें।।

ग्लू और कागज

कागज के टुकड़ों को ग्लू से, जोड़कर देखा होगा तुमने वैसे ही यह जीवन भी, प्रणय विरह से जुड़ा हुआ है हर एहसास इस मन पर, क्यों करता है आघात हर्ष,शोक,और व्याकुलता इस चंचल मन  का साम्राज्य दृढ़ होती अब अंतर्मन में , इच्छाएँ बनकर नयी तरंगें जैसे ग्लू से चिपका कागज टुकड़ो में बंट जाता है ऐसे ही  यह मन शरीर से, दृढ़ता से जकड़े जाता है तब अंतकाल पीड़ा का कारण, यह चंचल मन होता है मन को प्रभाव से मुक्त करे जो, हंसते हुए निर्वाण पा जाता है।

कठिन राहों पर

कठिन  मेरी उन राहों को , तुम सरल  कभी मत करना बस इतनी शक्ति मुझे देना , मै कठिन परिश्रम के द्वारा आशीष तुम्हारा पाकर , उन  राहों पर चल पाऊं माना कि बहुत कठिन जीवन , हर पल प्रतिक्षण मुश्किल पथ है पर सुख दुख आना जाना है गीता का सार यही है इस सार को समझ सकूं मैं , बस इतनी शक्ति मुझे देना कठिनाइयों के रस्ते चलकर, बिरले ही महापुरुष बन पाया।।

मानवता ही पूजा

★ज्ञान दीपक दे हृदय में ज्ञान ईश्वर का कराया पंचभौतिक देह भीतर अखण्ड ज्योति को लखाया व्यक्त करते हैं  सजल हृदय के सब  उद्गार हम त्रिदेव तुल्य हे गुरुवर, करबद्ध तुमको है नमन।। ★ कर्तव्य पथ पर चलने वाले ज्ञान गुण को धरने वाले ज्ञान और विज्ञान का सरलीकरण वे करने वाले  विलक्षणी प्रतिभा उर धारे लौकिक सुख को त्याग  जन जन की सेवा में उतरे जनमानस के लाल ।। ★कोरोना जंग है भारी , छुपे शत्रु सा है जारी नहीं उपाय है कोई सामाजिक दूरी है जारी छोड़ सब थाट जिसने पीड़ितो को अन्न वितरित की कौम ए इंसानियत की उदरतााएँ हमने  है देेेखी।। ★ऋषिकेश कर्णप्रयाग रेल लाइन को बना,शिलान्यास जनता के लिए कर डाला है देवभूमि संतो के धाम को प्रयागराज, तक अभी रेल प्रोजेक्ट अति भाया है काम जो किया है उत्तराखंड सरकार ने  ,ये अभी तक किसी के समझ नहीं आया है केंद्र का समर्थन ऐसे ही मिलेगा तब, सार्थक सालों का प्रयास हो जाना है ।।

भक्ति करो तो शबरी जैसी

भक्ति करो तो शबरी  जैसी  हठ करना  ध्रुव तारा सा क्रोध करो दुर्वासा जैसा विनय करो तो सुदामा सा जायज है  जाहिर करना हर  भाव  हृदय में ज्यों उपजा मानवता की राह पर चलकर पीर हरो जनमानस का ।।

गुरु पूर्णिमा दो शब्द

 ज्ञानदाता है गुरु, अति श्रेष्ठ कर्म पहचान है दीदार ईश्वर का कराते, गुरू पूजा कर उन्हें रिझाते।।  गुरु प्रेरणा है शिष्य का ,  उर में ज्ञान का पुंज भर गुरु मेटते अज्ञान तम, दिल से करें उनको नमन।। पावन दिवस गुरुपूजा है, युग-युग से यही विधान है गुरु-शिष्य का शुभ परंपरा, दर्शाए ज्ञान महत्वता।।  मानव से  महामानव तक , अलख जगाते हैं गुरुवर ज्ञान,ध्यान,शुभ कर्म का, मर्म बताते हैं गुरुवर।। नफरतों का सिलसिला खत्म हो , हर प्राणी में सद्भाव हो मानवता की धुरी पर रखकर , विश्व का कल्याण हो यही ज्ञान देते हैं गुरु , सुसंस्कृतियों  का पाठ पढा बैठें सहृदय गुरु चरणों में, मिट जाए अज्ञानता गहन।।

गुरु पूर्णिमा लेख

गुरु पूजा क्यों है ख़ास----- गुरु र्च ब्रम्हा गुरु र्च विष्णु गुरु देवो महेश्वरा.......... गुरु और शिष्य परंपरा अमर सनातन धर्म का सिद्धांत है  पुरातन  समय में महर्षि वेदव्यास जी द्वारा धर्म-शास्त्रों की व्याख्या की गई थी और गुरु शिष्य परंपरा की नींव पड़ी । गुरु पूर्णिमा का  अर्थ है  जब चांद अपने पूर्ण रूप में होता है और वेदवास जी का जन्म भी इसी पूर्णिमा में हुआ था जिस कारण उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा मनाया जाने लगा । समय के साथ- साथ  गुरु शिष्य परंपरा में अनेकों बदलाव  हुए । मुस्लिम धर्म में पैगम्बर, सूफी,औलिया, हिन्दू धर्म में मठाधीश, मंडलेश्वर,महामंडलेश्वर की उपासना, सिक्ख धर्म में 10 सच्चे  बादशाहों की पूजा  , यहूदी धर्म में जीसस की उपासना  का ट्रेंड अस्तित्व में आया । गुरु पूजा का महत्त्व--  बालक जब धरती पर जन्म लेके आता है उसके भावी भविष्य की नींव गढ़ने के लिए पुरातन गुरुकुलों ,आधुनिक स्कूलों , मदरसों में भेजने का प्रावधान था । जीवन के मूलभूत आजीविका हेतु ज्ञान और कर्म को महत्व दिया गया है । शिक्षक दिवस  जो कि सर्वपल्ली र...