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लफ्ज खामोश हैं

तुम रहमत ए अशरफिया लाख लुटाते रहे
मैं दूर ही  खड़ी तुम्हे निहारती रही
गवाह मेरा दिल है तुम्हारे दरिया ए दिल का
तेरी रूहानियत का कमाल मैं देखती रही
ये दिल ही जनता है उस आलम को
मेरी खामोश लफ्जों में तेरी इबादत को ।

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