शीर्षक : जम्बवंत से भेंट मणि ढूंढने के ही बहाने लीला प्रभु दिखाए। ऋक्षराज संवाद में प्रभु कहें मणि को आए।। देखें बालक क्रीड़ा करें अदभुत मणि से खेलें। सही जगह स्थान मिले सम्मान से कृष्णा बोलें।। स्यमंतक मणि चोरी हुई कैसे मिटे कलंक। जामवंत सुनें बात परंतु मन में भरी आशंका ।। त्रेता युग में जामवंत राम के रहे सहाय । द्वापर में भिड़े कृष्ण संग ईश को कैसे भुलाय।। प्रभु मुस्काए जान रहे भक्त को बल अभिमान । किंतु उचित कर्तव्य है दिए भक्ति उपहार।। प्रभु के सैनिक वापस लौटे अज्ञात प्रभु को जान ।। दिवस अट्ठाइस युद्ध निरंतर हुई गुफा में रार । द्वारिका में है हलचल भारी कहां हैं द्वारकाधीश। नर नारी करें देवी पूजन कुशल रहें जगदीश ।। मणि नहीं हरि स्वर्ण ही चाहें सत्राजित गया मान। शर्म से झुकी निगाहें उसकी पुत्री का किया दान ।। सूर्यभक्त सत्राजित गदगद प्रभु हितैषी जान । प्रभु चरणों में शीश नवाए हरि को लिया पहचान ।। प्रभु मिलन की लालसा भक्त को सदा रहाय। लंबी प्रतीक्षा खत्म हुई कमलनयन चले आए।।
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