सदवृतियों का अंत पद प्रतिष्ठा मान बड़ाई का हो भाव प्रधान जहाँ चुगलीबाजी और धृष्टता से मानव हो भ्रष्ट सदा ज्ञान गर्व से महा विदूषक सर्वश्रेष्ठता अहम् पले विनय नम्रता दया करुण सदवृतियों का हो अंत वहां।। ★संयुक्त परिवार पर भरा पूरा अगर परिवार हो खुशियाँ चौगुनी हो खुशी और गम में हों सब साथ धरती भी स्वर्ग सा हो कौन कहता है एकल ही वही परिवार खुश रहते आपसी प्रेम हो दिल में संयुक्त परिवार खुश रहते ।। ★निस्वार्थ भावना पर किसी पर जान छिड़कूँ तो कभी उम्मीद ना रखती , निभाती हूँ जिन रिश्तों को सदा सहयोग करती हूँ सामाजिक दोहरे प्रपंचों ,से खुद तटस्थ रहती हूँ मगर वंचित सामाजिक कार्य को सौभाग्य कहती हूँ ।। ★छल प्रपंच पर सरल दिखती हूँ पर मुझको समझना है नहीं आसां घटाएं नभ में छाती हैं मगर बरसात होती क्या जो जैसा है उसे उसकी ही भाषा में समझती हूँ चाल कोई चले हर बात का उत्तर मैं होती हूँ ।। ★परमार्थ पर सरल हूँ सहज हूँ अव्यक्त भावों का समन्दर हूँ , सामाजिक रोष से कुपित सृजित उद्गार करती हूँ , विरोधी हूँ कट्टरता की , सामाजिक दूरी रखती हूँ , ...
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