चतुराई और लोभ लोलुपता का नहीं भाव प्रधान हो
प्रेमी हो वह सजल हृदय से छल प्रपंच से दूर हो
धूप छांव हो या संताप ये जीवन चाहे कठिन लगे
डटा रहे वह कर्म के पथ पर कलुषित हृदय ना भाव हो
वही है सेवक गुरु चरणों का उस पर कृपा अपार हो। ।
प्रेमी हो वह सजल हृदय से छल प्रपंच से दूर हो
धूप छांव हो या संताप ये जीवन चाहे कठिन लगे
डटा रहे वह कर्म के पथ पर कलुषित हृदय ना भाव हो
वही है सेवक गुरु चरणों का उस पर कृपा अपार हो। ।
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