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सुपर लेखक अवार्ड 2

 डिजिटल सहभागिता प्रमाण पत्र

साहित्य गौरव सम्मान जय बुलंदी

चमक आंखो में मैं भरकर नजारे विश्व के देखूं  अपनी क्षमताओं से भरसक कोशिशें करके मैं देखूं कठिन राहों में पग गर लड़खड़ाए जो तूफानों में बिना परिणाम को सोचे गगन को नापकर देखूं।।

शीर्षक : जम्बवंत से भेंट

शीर्षक : जम्बवंत से भेंट मणि ढूंढने के ही बहाने लीला प्रभु दिखाए। ऋक्षराज संवाद में प्रभु कहें मणि को आए।। देखें बालक क्रीड़ा करें अदभुत मणि से खेलें। सही जगह  स्थान मिले सम्मान से कृष्णा बोलें।। स्यमंतक मणि चोरी  हुई कैसे मिटे कलंक। जामवंत  सुनें बात  परंतु मन में भरी आशंका ।। त्रेता युग में जामवंत राम के  रहे  सहाय । द्वापर में भिड़े कृष्ण संग ईश को कैसे भुलाय।। प्रभु मुस्काए जान रहे भक्त को बल अभिमान । किंतु उचित कर्तव्य  है   दिए भक्ति उपहार।। प्रभु के सैनिक वापस लौटे अज्ञात प्रभु को जान ।। दिवस अट्ठाइस युद्ध निरंतर हुई गुफा में रार । द्वारिका में है हलचल भारी  कहां हैं द्वारकाधीश। नर नारी करें देवी पूजन  कुशल रहें जगदीश ।। मणि नहीं हरि स्वर्ण ही चाहें सत्राजित गया मान। शर्म से झुकी निगाहें उसकी पुत्री का किया दान ।। सूर्यभक्त सत्राजित गदगद प्रभु  हितैषी जान । प्रभु चरणों में शीश नवाए हरि को लिया पहचान ।। प्रभु मिलन की  लालसा भक्त को सदा रहाय। लंबी प्रतीक्षा खत्म हुई कमलनयन चले आए।। 

गोपियों के आगे उद्धव ने टेके घुटने

भक्ति का मार्ग है अति दुर्गम इंद्रिय विग्रह से मन सधे। काम क्रोध मद  लोभ का व्यापक जीवन पर प्रभाव पड़े ।। उद्धव ज्ञान महा गूढ़ ज्ञानी भंडार सहेजे  जो प्रेम भुलाए । हठ योग निमित कर्म से तर्क से बुद्धि ज्ञान में गोता लगाए।। भक्त का अहम शिखर पर  चढ़ा है चलो एक करतब तुमको बताएं। कृष्ण  बुलाएं उद्धव  पास  आओ  सुनो मेरी बात हृदय से लगाए।। ब्रज में है व्याकुल मात - पिता व्रजवासिन गोपियां प्राण हमारी। संदेश चिट्ठी ले जाओ सखा ज्ञान ध्यान  तर्क मानेंगी  तुम्हारी।। सीना तने  हर्ष हृदय भरे कहे  जो आज्ञा भगवन करूं शिरोधारी। ज्ञान बहुत रोम रोम भरा प्रेम विरह भुलाएंगी सब व्रजप्यारी।। गोपियां सुन के संदेश प्रभु के बिलखती हैं बरबस अश्रु बहाए। क्रोध अति करें गोपियां ज्ञान ,ध्यान नहीं मन मंदिर  समाए।। एक ही हृदय  नहीं दस बीस सभी कण कण में कृष्ण रमें। कहके गए थे मिलेंगे पुनः किंतु विरह की अग्नि में हम मिटें।। कृष्ण ही कृष्ण का राग लिए हर सुर में आलाप में कृष्ण जपें। ब्रम्हज्ञानी उद्धव देख ये भक्ति विचारें पुनर्जन्म स्थावरजंगम...

तितली बन उड़ जाऊं मैं

तितली बन उड़ जाऊं मैं , डाल डाल पर ईतराऊं । रंग बिरंगे पंख हैं मेरे  उपवन को मैं  महकाऊं ।। मैं उड़ बैठूं घर आंगन और फुलवारी की क्यारी में। मुझे पसंद है पुष्प महकते खिलते हुए बागानों में ।। मेरा घर एक बगिया पूरी , लहराती हरियाली में। चिड़िया, कोयल ,मोर ,पपिहा भरी बिरादरी टोली में।। मैं भाती हूं बच्चो को बेशुमार चहकते होते मगन। मुझे पकड़ने दौड़े आते मैं उड़  जाऊं नील गगन।। लोग अनोखे लगते मुझको , मेरा चमन गुलजार है। मुझे भगाते यहां वहां से बाग बगीचे खलिहान हैं।। मेरी प्रजाति मेट रहे हो  बाग बगीचे काट रहे हो । गौरैया को विलुप्त किए मेरी भी प्रजाति मेट रहे हो।। इस धरती पर जीना मेरा  बना दिया उपहास । मुझे देखने को तरसोगे  बन जाऊंगी इतिहास ।।

गरीब के बेटी की विदाई

गरीब के बेटी विदाई झूठे दिखावे में प्रपंचों को झुठलाना होगा षड्यंत्रों के पोलो को  चतुराई से खोलना होगा लोग कुछ भी कहें भौंकने दो उन्हे  बेतहाशा मुंह में  राम बगल में छुरी को पहचानना होगा। गरीब की बेटी है उसे शादी तो करनी ही होगी शान ओ शौकत में दोहरी जिंदगी का सच जानना होगा कोई बाप दहेज ना जुटने से आत्महत्या क्यों करे भला दहेज के लालचियों का सामाजिक बहिष्कार करना होगा। घर के प्रोग्राम को  घर में ही निपटाना होगा आलीशान बैंक्वेट हॉलों का चकाचौंध ठुकराना होगा अपनी बेटी बहु मां बहन महफूज और खुशहाल रहे इस बाबत ख्वाब से हकीकत जमीं पर देखना होगा। फिल्मी तमाशे ,बेतहाशा रस्में  रिवाजें दिखावा ना होगा संस्कृति सभ्यता  की कुरीतियों को मिलकर  मिटाना होगा समाज ना सही परिवार को ही साथ लेकर चलो बुजुर्गों के आशीर्वाद से घर  को स्वर्ग बनाना होगा। : अपने सामर्थ्य के मुताबिक ही पांव पसारना होगा दुनिया की वाहवाही को अब ठुकराना होगा महज घी के दीये से ही रुतबा कायम क्यों हो गुंजन फर्ज की राह में तेल का  ही सही दीपक जलाना होगा।।©

"बेटा बेटी दोनो बराबर"

"बेटा बेटी दोनो बराबर" धोती  बन गई  जींस री भैया , साड़ी बना पतंग। ब्रांडेड फटे चिथड़ियां पहने नाचें फिरें मलंग ।। अर्ध नग्न वस्त्रों की फजीहत  कहीं हुए निर्वस्त्र । कमर कसे रणवीर ना कमतर कहें पुरुष का शस्त्र ।। विद्या बोली आंख सेंक लें  करतब हिम्मत जान । भर भर वस्त्र मिले डोनेशन बॉयकट से अनजान।। संविधान से मिली समानता महिला पुरुष समान। नारीवादी आंदोलन  से अब  मांगे पुरुष आयोग ।। बड़ी बुराई करें फजीहत जनता भर आक्रोश। भीड़ की शक्ल ना कोई सूरत  रहते नहीं खामोश।। जज करते हैं ऐसे ना वैसे कैसे काम चलेगा । बोल्ड हीरोइन एक्ट्रेस देखें क्यों ना बवाल मचेगा।। हम करें तो कैरेक्टर ढीला तुम जो करो वो मान्य । बेटा बेटी  दोनो बराबर ना हो अब अन्याय।।

श्रीकृष्ण महाकाव्य अक्रूर द्वारा कृष्ण के दिव्य विराट रूप की स्तुति

हे चतुर्भूजा धारी नारायण लक्ष्मीप्रिये वत्सल भगवन। तुम्हरी जय हो माधव कृष्णम राधापति मुरलीधर भगवन।। सुर लोक के नायक काल विनाशक ब्रम्हा विष्णु शिव एकेश्वर । करो कृपा दृष्टि प्रभु नटनागर  अक्रूर  विनय सुनो सर्वेश्वर ।। हे कमलनयन अदभुत लोचन पितांबरधारी  ब्रजभूषण । विनसे मद लोभ कटे जम फंद  भजूं गोविंद श्री नारायण। । अक्रूर विराट स्वरूप लखे  कर जोरि विनय करे अभिनंदन। तुम्हरे  यश गावत वेद  है हारत ऋषि मुनि देव करें वंदन ।। मायापति कृष्णम नमामि भगवन मानस प्रेम हो गोविंदम। व्रजवासी आनंदित गोकुल हर्षित घटवासी करो सुमंगलम ।। चंद्रादि सूर्य नेत्र तिहारे ,दिवस रात्रि अपलक पलक । मुखड़ा है अग्नि ,नाभि अंबर , विराट रूप निर्लिप्त कमल ।। कानन दिशाएं, स्वर्ग शीष , भुजा देवगण , कुक्षि: जलधाम । वायु है जैसे प्राणशक्ति प्रभु , वृक्ष  औषधि  सर्व  रोम।। राधा के मोहन नंद दुलारे , यशोमति  प्रिय   देवकीनंदन। मेघा है केश ,नख अस्थि गिरि ,जस जीव आश्रय जलाशय।। कच्छक , मत्स्य, वाराहरूप , हयग्रीव, नरसिंह  धारते । अवतार युग युग  सर्व श...

प्रश्नोतरी काव्य - अरिष्टासुर का वध

अरिष्टासुर का वध हे जगदीश्वर हे भुवनेश्वर भक्तों के रक्षक हे कृष्ण मुरारी, ब्रज मंडल पर संकट छाया कृपा कर  टारो विपदा भारी।। सुंदर चरितम , निश्चल भगवन, देवों के देव तुम्ही लीलाधारी, यदा कदा जब भीड़ पड़े हरते शोक , दुष्ट, महाप्रलयकारी।। योगमाया जग तुम्हहिं  रचाते रहें लवलीन योगी समाधिष्ट, खेल खेल में वृषभ भयंकर आयो  हरो जगदीश अरिष्ट ।। ब्रज के गोप गोपियां सारी गईया कृष्ण कृष्ण पुकारें, मित्रों  सखियों गईयों को देख के दौड़े आए कन्हईया प्यारे।। अरिष्टकारी असुर अत्याचारी अरिष्टासुर का प्रकोप है भारी, ब्रज में अत्यंत कोप  भयंकर, त्रस्त है व्रजवासी हे अंतर्यामी।। ग्वालों के खेल का नाश किया वो करो नाश वृषभ का हे त्रिपुरारी, कृष्ण कहें  धरो धैर्य  सखा शोक करना  नहीं  सुनो मेरी वाणी ।। मुस्काए मगन हुए श्री माधव, गोपियां गोपों के प्राण प्यारे, गोपाें को तटस्थ करके मुरारी भिड़े दुष्ट से जैसे काल पधारे। । पूंछ पकड़ अरिष्टासुर प्रभु  पवन वेग से धूल चखाए, दो कोंस योजन जाके गिरा , प्रभु दुष्ट को नाच नचाय संघारे ।। ज्यों ही शिला श्रीकृ...

मर्दवाद Vs नारीवाद (समीक्षा लेख सामाजिक)

मर्दवाद Vs नारीवाद विवादों की कड़ी में औरत , मर्द और हर आयु वर्ग के युवा , युवती शामिल हैं यह दोनो वर्ग एक लैंगिक पहचान होने से पहले मानव के रूप में अस्तित्व में हैं  कैसे ?? जब हम वैज्ञानिक दृष्टि से  दोनो को देखते हैं तो खून, मांस,  मज्ज़ा , अस्थि, मल मूत्र  में लिपटे एक मानव के रूप में जन्म लेते हैं ,और जन्म लेने की प्रक्रिया समान है ।  जब हम आदर्शवाद की नजर से देखते हैं तो त्याग करना करुणा , दया, उपकार, नीति - न्याय, मर्यादा, यह सब दोनो वर्ग में शामिल है तो फिर असमानता कैसी ??? यहीं से विवाद शुरू होता है महिलावाद के लिए समानता, स्वतंत्रता, और तो और ट्रेंड में चलने वाला एक  मेरा  देह मेरा अधिकार का सोशल मीडिया पर भरपूर समर्थन मिल रहा है।  दूसरी ओर आलोचना हो रही है कि नारी को नारी ही रहना चाहिए , वह पुरुषों से खुद को ना तोले, घर के काम करे, पति की पूजा करे , और बच्चो के पालन पोषण में ही नारीत्व का सुख देखे ।  यह सब बेतुकी बातें वही लोग कर रहे हैं जिन्हें डर है कि शिक्षित महिला अपने हक के लिए खड़ी हो गई तो उस पर अधिकार जताने की मर्दवादी...

साकार ब्रम्ह की महिमा

मेरी चाहत है मिले साथ तुम्हारा , अपनो का मिला साथ सही पर मैने देखा है नेमत सिर्फ तुम्हारा दुख दर्द में जब् कोई आगे आया उस शख्स् को मैंने फरिश्ता माना पूर्ण। किया हर काज को तुमने क्या कर्म दिखा मुझमें मेरे मौला हर वक्त तुझे मैंने करीब पाया एक एहसास है  तू कोई शून्य कहे त्रिनेत्र जो खोले वह प्रत्यक्ष कहे निज रूप है क्या ब्रम्हज्ञानी कहे नादान। तुझे निराकार कहें मूर्ति पूजन कोई सत्य कहे वह मूढ़ मति कोई क्या समझे चैतन्य प्रभु की भक्ति को तरसें त्रिदेव नारद और सनकादिक नर तन देवहुँ एक बार प्रभु मोक्ष मार्ग का है यह साधन कहे नानक जन है बड़भागी मानुष जन्म अपार मिला धन्य है जिसने नर तन पाया आदि नाम वह गुप्त है जिसको कृपा कर तुमने हृदय में लखाया बड़भागी मैने साकार को पाया साकार ब्रम्ह पर बलि बलि  जॉउ सत्य है........ राम बुलावा।  भेजिया , दिया कबीर रोय जो सुख साधु संगत में सो बैकुंठ न होय।।

श्राप वरदान है

 श्राप को हँसकर आत्मसात करना सीखो  क्योंकि.........   माता अंजनी को श्राप मिला बन्दरी बनने का तो संकटमोचन  दुद्रवतर की जननी का सौभाग्य मिला  श्राप मिला हनुमान को कि मतिभ्रमित हो जाओ तो राम की सेवा में  अपनी शक्ति का स्मरण हुआ । श्राप मिला जनक जी को पुत्र मोह में प्राण निकलने को तो अंतिम स्वांस राम नाम से मुक्ति धाम खुला  श्राप मिला अहिल्या को तो श्री हरि के  रामावतार में दर्शन और चरण स्पर्श का सौभाग्य मिला श्राप मिला शनि देव को कुदृष्टि का तो , निष्पक्ष न्याय का सिंघासन मिला  श्राप मिला चन्द्रमा को कुरूपता का तो  , अहंकार छोड़ने का ज्ञान मिला  श्राप मिला गंगा को पापियों से घिरे रहने का तो धरतीवासियों के उद्धार का द्वार खुला तुलसी से श्राप मिला तो श्री हरि शालिग्राम बनकर पृथ्वी पर सुलभ हुए  राजा परीक्षित को तक्षक नाग से डँसने का श्राप मिला तो  भागवद पुराण की महिमा का ज्ञान हुआ उत्तरा का गर्भ नष्ट करने पर अश्वत्थामा को श्राप मिला 3000 साल तक शरीर मे पिक और खून की बदबू के साथ धरती पर आम इंसान से दूर जिओगे और यह श्राप वरदान नही...

डॉक्टरों का कमाल हास्य काव्य

तू ही यमराज है तू ही धर्मराज है । रोगी के निदान में तेरा योगदान है ।। एनेस्थीसिया का असर समाधि सा हाल है। लोकल एनेस्थीसिया भांग चढ़ता कमाल है।। देखता औजार रोगी तनिक ना भान हो । आधा हिस्सा सुन्न पड़े बाकी चमत्कार है।।  बेहोशी के सुई से टांके वाले धागे से । चीरते शरीर मानो टेलर तू कमाल है।। दर्द से बेहाल हाल दवा से  मिले आराम ।  ड्रेसिंग कराने का झंझट बेहद दर्दनाक है ।। ट्रिगर पॉइंट पर रख के डॉक्टर रोगी को बुलाएं औजारों के ट्रिगर से करते घावों को खल्लास हैं।। मरहम पट्टी बेरहमी से कहते अपना काम है। सुई चुभोये  नस - नस कहते ऐलोपैथी इलाज है ।। नशा जब उतरता है तीनों लोक दिखता है । कमजोरी तन की भारी ' गुँजन 'हाहाकार है ।। सेहत का रखोगे ख्याल  रोग नहीं आएगा  पास। पिज्जा , बर्गर टाटा - बाय कंद मूल उपचार है ।। तू  ही यमराज  है तू  ही  धर्मराज है । रोगी  के इलाज  में  तेरा योगदान है ।।

साला जीजा की दुश्मनी कबीरा सारा रा रा

मैं साले को माफ ना कर सका तो,बीवी ने मेरी रिश्तेदारियां त्याग दी मैं भाई भांजों के साथ खड़ा रहा  तो बच्चों ने मुझसे बगावत कर लिया जिंदगी भर अड़ियल रहा मैं एक अपमान के कारण और साले के अपमान को मैं भूल ना सका अपने रिश्तेदारों के लालच धोखा तक को नजरंदाज किया और अपने ही ससुरालियों के दुर्व्यवहार को गुनाह मान लिया खूब नेकी किया रिश्ते नातों को निभाकर जानता हूं अपना घर मैं  संभाल ना सका कितना बेबस हूं आज किसी से कुछ कह नहीं सकता मर्द हूं खुलकर रो भी नहीं सकता मां की कसम हैऔर रोल मेरा उद्धारक का है इस खता से घरवालों की नजर में मैं विलन बन गया मत करना ऐ दोस्तों तुम ऐसी खता ज्यादा अच्छा बनने का हो शौक तो कोई बाबा ही बन जाना।।

पिता की रिश्तेदारियां

दूसरों पर खूब दिल खोलकर उड़ाते देखा ,पिता को बखूबी रिश्तेदारी निभाते देखा झूठे रिश्ता के दम पर ढींगे हांकते रहे इस कदर कि ,खुशामद के चक्कर में अपना घर बिगड़ते देखा पिता ने  कहा मायके ना  जाऊंगा ना जाने दूंगा ,मां से उनके ससुरालियों को खंगालते देखा दादी के अंतिम वचन साथ निभाना भाई भाभी का,इस आखिरी ख्वाहिश  से घर परिवार उजडते देखा मरने वाले विदा हो जाते हैं ख्वाहिशें बताकर,उन ख्वाहिशों के घुटन में जिंदों को मरते देखा पिता ने पूछा बच्चों  से तुम्हे तकलीफ क्या है ,रिश्तेदार ही तकलीफ हैं हमने खुद को घुंटते देखा माना कि फर्ज में रिश्तेदारी निभाना है जरूरी,  लोगों को खुश करते हुए अपनों को लाचार होते देखा

युथनेसिया (द प्रोसेस ऑफ डाइंग फ्रॉम सेल्फ विल )

युथनेसिया   (द प्रोसेस ऑफ डाइंग फ्रॉम सेल्फ विल ) स्वैच्छिक मृत्यु अर्थात  मैं समाधिष्ट प्राण त्यागने  के  आध्यात्मिक प्रक्रिया की बात  नहीं कर रही हूं यहां मसला है कानूनी तौर पर जीवन को खत्म करने की जायज़ मांग  । विदेशों में इस पर बहस है और कई देशों में स्वीकृति भी है पर हमारे भारत में धर्म और कानून आड़े आते हैं क्योंकि आत्महत्या (धारा 309 ) अपराध है धार्मिक तौर पर भी और कानूनी तौर पर भी  यानि आत्महत्या किसी भी एंगल से ठीक नहीं है । तो क्या हम  मान लें कि युथनेसिया अर्थात इच्छा मृत्यु /रहम पर मरने की अपील की मांग उचित है??? मेरे दिमाग में यह प्रश्न आता है कि  जब आप डॉक्टर को कहते हैं मुझे अब नहीं जीना , जहर  दे दीजिए , बच्चे घर में नहीं रखना चाहते, पति गुजर गया है , आय का जरिया खत्म है ,  मानसिक संताप है या ससुराल में, कार्यस्थल में मानसिक संताप की स्थिति है जो बेहद  असहनीय है  , यदि आप यह डॉक्टर को कहेंगे तो वह   क्या आपको जहर दे सकता है ??  नहीं ... कभी नहीं ..! ! ऐसे मामले तो मनोचिकित्सक के दायरे मे...

श्रीकृष्ण द्वारा राधा को गोलोक की स्मृतियों को याद दिलाना

प्राणप्रिया , सुनो बालसखी,  मैं प्रेम निवेदन करता हूं , आंसू की धारा रोक लो तुम मेरे पथ में बाधक मानता हूं।। नहीं कहूंगा  निष्ठुर बनने को नहीं कहूंगा मुझसे रूठो तुम,  जरा धैर्य धरो मैं कहता हूं अब विचलित ना हो जाना  तुम।।  राधा के मन में हलचल है  अंतस तूफान  भयंकर है , नयनों से प्रश्न छलकते हैं शंका मन राधे निरंतर है ।। मां राधा कठिन परीक्षा दे तो विधाता कटघरे प्रश्न घिरे , कान्हा बोले  हतप्रभ ना हो ,तुम अयन से करो विवाह प्रिये।। राधा बोली क्या पाप किया जो  स्वयं से दूर किया मुझको, इस मृत्युलोक पर आने  की  यही सजा दिया तुमने मुझको।। तुम स्मरण करो गोलोक प्रिये श्रीदामा संग जब उलझी थी,  दोनो ने श्राप श्राप खेला तब मति क्रोधाग्नि में झुलसी थी।। निर्धन ब्राम्हण का श्राप लगा श्रीदामा भूलोक में दुखी रहा, तुम शत वर्षो का विरह सहो उस श्राप से  बिसरी स्मृति रही ।। हम दोनो  का प्रेम अमरता है संग हो ना हों मन  तार जुड़े , अज्ञानतावश  दो शरीर कहे वह प्राणी नर्क के द्वार  पड़े।। मेरा मत अकाट्य समझना तुम मानव लीला मे...

रक्षाबंधन पर पितृसत्ता का बंधन

राखी मिठाई कपड़े लत्ते त्योहारों पर  काज,   देखो घर आई है बहना लूट ले जायेगी आज।। बेशक लूटें बहन की संपत्ति और भरी हो तिजोरी, जोर जोर से भाई चिल्लाएं आएंगी बहनें लुटेरी।। दौलत भाई विरासत पाएं बहनें किस्मत की मारी रहीं, बहने घर आए तो सहमें जेबें अपनी खाली रही ।। भाभी बोली दीदी आई  किससे लेंगे उधार जी, बस थोड़े  ही देर में दूजी बहना घर पर पधारे जी।। भईया बोले सुनो हे प्रिये , खर्चा लूंगा बचाय, बस तुम मेरा कमाल देखना बीवी गई लजाय।। बोली प्रियवर कितने शातिर चला है तुमने चाल, बहनों के आगे दुखड़ा कह खर्चा लिया बचाय ।। बहनों का संसार न अपना खाली हाथ ससुराल आईं, पिता के संपत्ति त्याग के बहनें हिस्सेदारी भूल गईं ।। कानाफूसी करते हुए भाभी की बात को सुन बहना , अपमानों के विष को पीकर इज्जत से कहती भईया ।। मान गई दोनो बहने क्या खाक करेंगे रक्षा भाई, मां बाबूजी याद आते हैं आंसू छलकाई बहना ।। मन में पीड़ा हंसता चेहरा भाई को राखी बांध दिया, अपमानो के वार को सहकर फर्ज बहन ने निभा दिया।। रक्षाबंधन का त्योहार तुम्हे मुबारक हो खुशियां भाई भाभी साथ निभाना मेरा क्या अ...

राष्ट्र हितों को ऊपर रखना संविधान मुस्काएगा

टुकड़ों में हम बंटे हुए हैं शुद्र , नारी कर भेद , अस्पृश्यता, अमानवता से ईश्वर को है खेद।। धर्म नहीं नफरत का घोतक सभी को दे सम्मान, धर्म की परिभाषा ना कदापि नारी का अपमान।। पुरुष प्रधान की वेद ऋचाएं,  नारी मन को पढ़ ना पाए देव ऋषि नारी पर  मोहित  लंपट कामी वो कहलाए ।। इंद्र, चंद्र , बाली , रावण छल कर नारी अस्मिता हरे , परमेश्वर पति उपमा पाकर युगो युगों तक भ्रमित करे।। वैश्या , विधवा, बांझ , कुलक्षिणी शब्द उजागर किए है वो, विधुर, नपुंसक  , लंपट , कामी ,  इंद्रिय दोष को ढंकते जो ।। स्वर्ग नर्क भय मति भ्रमित  कर  धर्म को कट्टर दिखलाते, अति सरल है धर्म का वर्णन , हम  इंसान ही बन जाते ।। करो धर्म जप तप व्रत पूजा वैदिक  अनुष्ठानों के संग , व्यक्तिवाद, स्वतंत्र विचार पर  चढ़े सभी का अपना  रंग पुरुषवाद के महिमामंडन से नारी को ना छलना , परिभाषा वह स्वयं गढ़ेगी नारीसत्ता से ना डरना ।। पूजा पाठ करो बेशक  ईश्वर को अलंकृत उपमा हो , सहनशील, अबला, बेचारी शब्द कदापि ना स्वीकृत हो।। जातिवाद की जड़े मिटा दो , नास्तिकता मिट जाय...

प्रश्नोत्तर काव्य - कालिया नाग को मारने के बाद कृष्ण द्वारा दावानल से गाय और गोपों की रक्षा

 प्रश्नोत्तर काव्य - कालिया नाग को मारने के बाद  कृष्ण द्वारा दावानल से गाय और गोपों की रक्षा  ब्रज मंडली भय त्रस्त है  अग्नि प्रकोप भारी पड़ी ,  इक कालिया का भय  मिटा संकट निकट दूजा खड़ा।। अन्न जल  बिन त्रस्त हैं सब ग्वाल बाल श्रीकृष्ण संग ,  शैय्या धरा तट यमुना का बेसुध सोएं सब ही बेढंग ।। हाय ! ज्वाला ये दहकती ढाए कहर चहुं ओर से , लपटें लिपटतीं फैलती  ललकारते प्रभु जोर से।। करुणानिधान लीला अपार बल शौर्य दाऊद, कृष्ण का, केवलमात्र ग्वालों की आस अग्नि बुझे  वन क्षेत्र  का ।। बाल भक्त सब ग्वालन पीड़ित  कर रहे त्राहिमाम,  आंख मूंदकर ग्वाले सभी कृष्ण को किए प्रणाम।। नीलकंठ  सम दयालु गिरधर धरें  अग्नि मुख मांहि , पलक झपकते ग्वाले , गईयाँ भांडीर वट पर जाहिं।। रामावतार में सीता सुरक्षा किए थे अग्निदेव , मुख में आश्रयस्थान लिए कृतज्ञ रहेंगे सदैव।। श्री कृष्ण है त्रिलोकेश्वर सत- रज - तम गुण से परे  माया अपार महिमा अपार सुर - असुर- नर जिसने रचे ।। धर्मो रक्षती रक्षित का  ज्ञान पुंज  प्रज्वलित करे ।। वही दैत...

राष्ट्र की एकता में धर्म की परिभाषा !

 देश सदियों से प्रथाओं, आडंबरों ,जातिवाद, छुआछूत में फंसा है  जबकि वर्ण व्यवस्था जैसी कोई चीज होनी ही नहीं चाहिए थी  वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो हर इंसान एक ही प्रक्रिया से होकर जन्म लेता है और माता के गर्भ में मल मूत्र से लिपटा हुआ बाहर आकर  खुद को वेदों के ज्ञाता कहकर समाज की कमान अपने हाथों में rkh  लेटे हैं और शास्त्रों का हवाला देकर समाज के मानसिकता को कमजोर बनाया जाता है इसलिए लोग धर्म से विमुख हो रहे हैं , नास्तिक हो रहे हैं किंतु धर्म जो मानवता को एक धागे में पिरोता है वह धर्म कभी दूषित नहीं था  बस एक वर्ग विशेष ने खुद को धर्म का ठेकेदार  बना दिया और आज भी  हमारी रगो में जातिवाद, खून खराबा, वैमनस्यता, आरक्षण विरोध, या आरक्षण के पक्षधर मिलकर लड़ रहे हैं ऊपर से कहा जाता है कि देश एकजुट रहे तो कोई भी  पड़ोसी मुल्क हमला नहीं कर सकता।  मुझे लगता है धर्म की नई परिभाषा होनी चाहिए ।   ✓कोई आपका हक छीने तो आवाज उठाओ ✓महिलाओं को मानसिक गुलाम बनाए तो यह सोचकर चुप ना रहो कि नर्क मिलेगा कृष्ण ने मामा, और बुआ के बेटे का वध करके अन्याय के...

प्रश्नोत्तर काव्य - नंद और वासुदेव जी का मिलन

प्रश्नोत्तर काव्य - नंद और वासुदेव जी का मिलन भ्राता मिलन की चाह लेकर नंद मथुरा को चले   कर कंस का चुकता किये वसुदेव पीड़ा मिल कहे  झरझर बहा पावन अश्रु  निष्प्राण दोनों ही खड़े  अन्तस् सराहे भाग्य को  कर दोनों के कर में पड़े  प्रेम से हृदय लगे मिल भ्राता उपजा  हर्ष विशेष शोक सन्ताप नहीं उर उनके अब क्या रहा अशेष हरिमाया को प्रबल ही जानो पुत्र वियोग  सहा ना जाये  कुशलक्षेम कहो नंद कृष्ण की  हरि की लीला समझ ना आये पुत्र चाह की थी  उत्कंठा उम्र तुम्हारी ढलती आई  किस्मत के तुम धनी हो भाई पुत्र सन्तति आखिर पाई  हम अपना सौभाग्य ही जाने दुर्लभ मिलन अति हर्षाये सृष्टि चक्र  यह  क्रीड़ास्थल है मानो पुनर्जन्म हम पाये  सगे सम्बन्धी प्रियजन अपने सदा सर्वदा साथ ना रहते  पाप पुण्य का संग्रह जीवन हम अपना प्रारब्ध समझते  कहो वृक्ष, पशु आश्रय स्थान वहाँ सदा अनुकूलता रहता मेरे पुत्र को पाला तुमने यशोदा को क्या माता कहता  चिंता बड़ी गहन है भीतर स्वजनों संग प्रीति घनी  तनिक सुखों की लालसा में अनीति कर्म हितका...

स्वप्न शास्त्र - आईने वाला चेहरा

आईने वाला चेहरा स्वप्नशास्त्र आईना और चेहरे की बड़ी  गहरी मित्रता है जिस प्रकार मधुमक्खी को पराग , तितलियों को पुष्प,चातक को स्वाति नक्षत्र और मयूर को नृत्य पसंद है ऐसे ही आईना को मुस्कुराहट  भाता है  चूंकि आईना भी सजीव है जो रोज सुबह खिल जाता है एक प्यारी मुस्कान से , चेहरे को देखकर किंतु...............! ये क्या  कमल अपना चेहरा देखने का प्रयास कर रहा है वह बहुत दुखी नजर आ रहा है और ऑफिस जाना भी जरूरी है उसके लिए , आखिर बैठकर पेड़ से पैसे तो नहीं बरसेंगे ......' उसे जल्दी निकलना है । सफेद कुर्ता, काला पेंट पहने , लाल टाई बांधे हुए सिर के बाल किसी जेल से सेट करके डैशिंग पर्सनालिटी में हाथ में आईना लेकर खड़ा  है और सोच रहा है । लेकिन इतनी जल्दबाजी में किसको आईना से बात करने का समय है ? कमल के मन में हलचल  चल रही थी जैसे एक शांत समंदर कब विकराल रूप धर ले , नदी कब बागी हो जाए , ओलावृति कब फसलों का काल बन जाए , कमल के मन की हलचल भी कुछ अलग नहीं थी  तभी उसे एक परछाई दिखी ।  जैसे वह  उसे कुछ कहना चाह रही हो  कौन है वो  जिसे ...

प्रश्नोत्तर काव्य - यमुना तट पर बाल कृष्ण और बाल राधिके की मीठी झड़प

प्रश्नोत्तर काव्य - यमुना तट पर बाल कृष्ण और बाल राधिके की मीठी झड़प खिली हुई चंपा के जैसे अंग सुकोमल जिसके भाए, नख से शीख तक  देख राधिका कृष्ण को तंज कसे ही जाए।। कहो ऐ बालक प्रश्न क्यों करते यमुना तट पर हम क्यों आए, सुनो ! मां यमुना हैं हम सबकी  प्रश्न तुम्हारा नहीं सुहाए ।। भ्रम में तनिक ना रहना ग्वाले बातों में ना  राधा आए, खड़े हैं आतुर उत्तर  हेतु कृष्ण ' राधिका देख मुस्काए ।। सौंदर्यजगत के पुष्प हैं दोनो कामदेव  जिन्हे देख लजाएं, नीलकमल सी नैनो वाली राधा रानी अड़ी ही जाए ।। प्रश्न पूछकर घिरे हैं कान्हा खरी खरी खड़े सुनते जाएं, नैनो से मिले नैन कान्हा कहें ' बालिके  क्रोध ना तुम पर भाए।। चंचल यमुना वायु तरंगे वस्त्र उड़े हैं पायल थिरके, नाकों के नकबेसर सुंदर चंपा अंग वायु से महके।। बलखाती मदमाती चाल नागिन जैसे  जिसके बाल, पारिजात गल माला सोहे अंजन नैन  हठीले चाल।। मोहपाश में फंसे हैं कृष्णा जिनपर जग न्यौछावर रहता, राधा - कृष्ण हैं बंधन तारण जग बुद्धि से जान ना सकता।। यमुना  की शीतल सी तरंगे तट से टकराती इतराती, चंद्रमु...

राम दरबार (दोहावली काव्य)

द्वादश गृह है जन्म कुंडली स्थिर हैं लग्नेश कुछ दलबदलू गोचर ग्रह अतिथिगण बन करें प्रवेश आज उपाय एक करना है दूजा कल पर टाल ऐसे ही भय ग्रहों से खाकर होता है बुरा हाल शनि मनाऊं मंगल रूठे , किसके आगे किसको पूजे पीपल  पूजूं  शम्मी को पुजूं  अब तो चंदा मामा रूठें कुंडली माहीं खोट यद्यपि ग्रहों की मिश्रित चाल एक दूजे को देख के जलते , करते है वाचाल साढ़े साती खौफ है भारी शनि हैं शिव के दास चंदा पर जब शनि कुपित हों मन को करें उदास चंदा जी शिव के प्यारे हैं  आभूषण बन सजे जटा शिव के अनन्य भक्ति से सुधरे चाल ग्रहों का उल्टा राहु केतु छाया बनकर देव ग्रहों को ग्रहण लगाए बिना मौत अकाल ही मृत्यु किसके कारण आए मंगल दोष अति घातक या नियति का है हाथ टारो विपदा दोष कटे अब हे हनुमंत दो साथ कौन है किससे सर्वोपरि राम हैं किसके आराध्य हनुमान शिव शम्भू करते हर पल किसका ध्यान प्रभु राम को हृदय में ध्याओ यही जगत का सार ग्रहों के मनके ,यंत्र -तंत्र का तनिक नहीं आसार राम ,रुद्र,हनुमंत हृदय धर ' गुंजन ' करे पुकार छोड़ - छाडि जग उलझन सारी पूजे राम दरबार ।। https://www.sahityarac...

स्वप्न शास्त्र - भव्य मंदिर के दर्शन

आज मौसम का मिजाज काफ़ी बेहतरीन रहा ,कितने दिनों बाद आज इंद्र देव के कमान से बादलों ने ज़मीं को तर कर दिया अक्रांत बोला"..!!  उसकी हां में हां मिलाते हुए विक्रम ने भी कहा..' और दिल को भी तर कर दिया ' ...!  हा.... हा...... हा...... हा....... दोनो ठहाके मारकर हंसने लगे   -"तेरा घर आ गया  अक्रांत ने कहा ... '' ! विक्रम  ऑटो से उतरा  ,घर पहुंचकर खाना खाया और किसी से बिना बात किए डिनर टेबल से उठ खड़ा हुआ, सबकी निगाहें विक्रम की  तरफ थी , ऐसा लग रहा था विक्रम कुछ बात ,हंसी मजाक करेगा पर वह चुपचाप वहां से खिसक लिया ।   अपने रूम में पहुंचकर घड़ी देखा जिसमे रात के 11 बज रहे थे  - ' शायद कुछ ज्यादा थकान भरा दिन रहा होगा ....!  "खैर कोई बात नहीं "...!! विक्रम के पिता कमलेश  मन ही मन सोचने लगे और वे भी अपने कमरे में चले गए । उधर जल बोर्ड वालों का धरना पिछले कुछ दिनों से  चल रहा था मुसीबत इतनी कि सभी को दूर दराज से पानी की व्यवस्था करनी पड़ गई ।   विक्रम घर का बड़ा है और किसी काम में आनाकानी  करता है तो अंत में मान ज...

रिश्तेदारों को सौ तोपों की सलामी (ग़ज़ल)

रिश्तेदारों से खुंदस है बेवजह नहीं वाजिब  है , सौ तोपों की सलामी दें क्या ठीक है कहते हैं फलां काम कर लो ऐसे नहीं वैसे  कर लो , खाली पीली मुंह सुजाना क्या ठीक है अरे सांस भी कोई पूछकर लेता है भला, समाज के नियम में कुछ रियायत ठीक है हर काम में टांग अड़ाना मकसद हो जिनका , झूठी शान की कसीदें क्या ठीक है मत करो दखलंदाजी दूसरों की जिंदगी में , तुम्हारे घरों के गुपचुप  झगड़े क्या ठीक है हमारी पोल खोलोगे दो चार हम भी होंगे, सिर्फ तुम ही गालियां बको यह क्या ठीक है खातिरदारी करके भी बुरा भला सुनो, अब भी उतनी इज्जत करें क्या ठीक है जितनी भी  कर लो सीधे मुंह बात इनसे , मुंह टेढ़ा कर झंडा गाड़ना क्या ठीक है ताने पर ताने और मुफ्त की सलाहे देकर , अपनी झंड आप करना क्या ठीक है माहौल गर्मागर्मी का हो न मंजूर है "गुंजन''   दूर के ढोल सुहाने लगे बस यही ठीक है ।  

महिलाओं का युग (काल्पनिक कहानी)

एक समय की बात है एक  छोटे से कस्बे में मांसाहारी लोगो के बीच एक विष्णुभक्त परिवार रहता था उनके घर मे सुख समृद्धि इतनी थी कि किसी के आगे भीख ना मांगना पड़े  और सभी हंसी खुशी गुजर बसर कर रहे थे कि रामानन्द के घर एक रिश्ता आया उनकी बड़ी बेटी नेहा के लिए ।  अब नेहा इस बात से अनजान थी कि कोई शत्रु उनकी खुशियों में आग लगाने के मनशे से रिश्ता भेज रहा है । जब उसे यह बात अपनी माँ शोभा से पता चली तो उसने माँ को चेताया कहा...." माँ ....... तुम जानती हो कि मेरे लिए जो  रिश्ता भेजा है वह हमारे दुश्मनों की चाल है पापा को समझाओ कि वो उनके झांसे में ना आये और कह दें कि मैं अपनी बेटी का रिश्ता अपने दम पर तलाश करूंगा!  नेहा के तेवर और ऊंची आवाज में बोलते हुए सुनकर उसके पिता रामानंद अपने कमरे से उठकर आये और नेहा को जोर से डांटा! ए लड़की चुप हो जा ..." तू मुझे बताएगी कि किसके कहने में आना है और किसकी बात माननी है । माँ के साथ मदद कर और जाते जाते शोभा को भी खड़ी खोटी सुना दिया !  मेरी प्यारी पत्नी देवी आप प्लीज बच्ची के भाव मत बढ़ाइए ।  अगर आपको उसकी फिक्र है तो कीचन का कुछ काम...

ज्योतिष- पितृदोष को कैसे समझें

शंकर बहुत ही दुखियारा  इन्सान है उसने बहुत से ऐसे काम किये थे जो बड़े बुजुर्गों के इज्जत और शान को धूल चटाने जैसा था वे लोग तो गुजर गए पर शंकर के जीवन मे कई सालों बाद बेटे ने जन्म लिया ,बेटा  5 साल का हो गया परन्तु बीमारियां जैसे उसका  पीछा नहीं छोड़ती।   बेटे  रोहन की तबियत  अचानक खराब हो गई  गाँव में साधन का अभाव भी एक अलग ही समस्या है  । शंकर एक अति निम्न परिवार का  व्यक्ति है जो मुश्किल से ही घर खर्च चला पाता है।  आज कोई साधन नही मिल रहा क्या करूँ , बेटे को कैसे हॉस्पिटल ले जाऊं ......" शंकर ने अपनी बीवी कानकट्टी से बोला ......!    कानकट्टी - अजी बच्चा बहुत सीरियस है देखिए तो बड़े भईया के यहां अपनी बाइक है जरा उनसे  कहिए वो मेरे बच्चे को हॉस्पिटल ले जाएं । शंकर-  हांफते हुए दौड़ा दौड़ा अपने बड़े भईया के पास गया , जिनसे कानकट्टी का झगड़ा हो गया था । मुसीबत के वक्त में अपने ही अपनो के काम आते हैं मैं भईया से माफी मांग लूंगा और बोलूंगा मेरे बच्चे को हॉस्पिटल ले चलें शंकर बड़बड़ाते हुए आंगन में पहुंचा तो उसकी भाभी...

ना हड़बड़ी ना दबंगगिरी , क्रॉस ड्राइविंग छोड़ें और लेन ड्राइविंग नियम का करें पालन!

यदि हम ट्रैफ़िक नियमों की बात करें तो आप पूर्ण विराम लगा देंगे कि  साहब हम लेट हो रहे  हैं गन्तव्य तक जाना  है  वह भी नियत समय पर ,और इसके लिए धैर्य नहीं धावा बोलेंगे हम ! वाकई   इन्ही मनमानियों के  कारण  ट्रैफिक नियम तोड़े जाते हैं  और बड़ा शानदार लुका छुपी  खेलते हुए ट्रैफिक पुलिस को दग़ा दे जाते हैं। और जब  पकड़े जाते हैं तो जितनी भी डिग्रियाँ  और  जान पहचान हो तो सब चेप देते हैं पुलिस पर ! यह कहकर कि हम देख लेंगे ! आप हमें जानते नहीं हम  कौन  हैं ? हमारी दूर तक चलती है आप हमें छोड़ो वरना?  बहरहाल दबंगगिरी  रोड पर अब काम नहीं आने वाली  है 1 अप्रैल 2022 से दिल्ली में  जो लेन ड्राइविंग नियम बना है उससे आप नहीं बच सकते  । यहाँ डीजल पेट्रोल की महंगाई मार डाली तो अब 10,000 ट्रैफिक चालान मार डालेगा । ऊपर से दूसरी बार आपने गलती की तो आपका परमिट, लाइसेंस रद्द हो जाएगा वहीं यह गुनाह तीसरी बार किया यानि  ट्रैफिक नियम तोड़ा तो जाहिर है आप पर गम्भीर ट्रैफिक नियम के उल्लंघन का चार्ज लगाकर कार्यवाही क...

कवि का कोमल हृदय

  सुना है मैने कविहृदय में कोमल मृदुल कोना होता है दिल की बात सहज ही वह पंक्तियों में बयाँ करता है खट्टी मीठी हर लमहों को स्मृतिपटल में संजोता है  जीवन की यात्राएँ सभी और व्यथा हर इंसान की विधाता की सुंदर रचना शब्द अलंकृत बयाँ करता है  कोमल कोमल भावों का वर्णन जाने कैसे करता है जिस भी रूप मे जैसा चाहो वैसा ही वह ढल जाता है सुना है मैने कवि हृदय में कोमल मृदुल कोना होता है गायत्री शर्मा

मन की स्थिति

  मरता शरीर नहीं  मरता ये मन है   तङपता ये देह नहीं  बिलखता ये मन है अ स्तित्व को नकारता  खंङित यह मन है बारंबार टूटकर  बिखरता ये मन है देह में प्राण संग  पीङित ये मन है कल्पना के जाल में उलझा ये मन है प्राण बिन देह जैसे मात्र एक शव है मृत मन की  स्थिति भी बङी विचित्र है   नीरसता भरा जहाँ मन में  कैद है एक गहन उदासी भरा  मनो- संसार है गायत्री शर्मा

मौत की आहट

  मौत एक सुखद एहसास है जिंदगी की हंसी शाम है मौत का सफर दर्दनाक है इस सफर का लुत्फ शानदार है मौत एक सुखद एहसास है जिंदगी से जिंदगी की दास्तां है प्रारब्ध से अंत की यह किताब है मौत को हंसकर गले लगाना कांटो भरे सफर का गुलजार है मौत एक सुखद एहसास है मांगने से कुछ नहीं मिलता यहां  मौत से किसको एतराज है जिन्हे मालूम है प्रारब्ध से अंत में मिलना यह सफर उनके  लिए  कुछ खास  है मौत  एक  सुखद  एहसास  है ख्वाबों की दुनिया को भुलाकर अपने वजूद को खाक में मिलाना एक अजनबी लोक में स्वत: सिमटकर जहाँ से रूख्सत होने को बेकरार है मौत एक सुखद एहसास है जिंदगी की हंसी शाम है गायत्री शर्मा