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मर्दवाद Vs नारीवाद (समीक्षा लेख सामाजिक)



मर्दवाद Vs नारीवाद

विवादों की कड़ी में औरत , मर्द और हर आयु वर्ग के युवा , युवती शामिल हैं यह दोनो वर्ग एक लैंगिक पहचान होने से पहले मानव के रूप में अस्तित्व में हैं 
कैसे ?? जब हम वैज्ञानिक दृष्टि से  दोनो को देखते हैं तो खून, मांस,  मज्ज़ा , अस्थि, मल मूत्र  में लिपटे एक मानव के रूप में जन्म लेते हैं ,और जन्म लेने की प्रक्रिया समान है ।
 जब हम आदर्शवाद की नजर से देखते हैं तो त्याग करना करुणा , दया, उपकार, नीति - न्याय, मर्यादा, यह सब दोनो वर्ग में शामिल है तो फिर असमानता कैसी ???
यहीं से विवाद शुरू होता है महिलावाद के लिए समानता, स्वतंत्रता, और तो और ट्रेंड में चलने वाला एक  मेरा  देह मेरा अधिकार का सोशल मीडिया पर भरपूर समर्थन मिल रहा है। 
दूसरी ओर आलोचना हो रही है कि नारी को नारी ही रहना चाहिए , वह पुरुषों से खुद को ना तोले, घर के काम करे, पति की पूजा करे , और बच्चो के पालन पोषण में ही नारीत्व का सुख देखे । 
यह सब बेतुकी बातें वही लोग कर रहे हैं जिन्हें डर है कि शिक्षित महिला अपने हक के लिए खड़ी हो गई तो उस पर अधिकार जताने की मर्दवादी  परंपरा खत्म हो जाएगी।
मैने मशहूर लेखिका तस्लीमा नसरीन जी की पुस्तक औरत के हक में जब पढ़ा तो वाकई यह समझ आया कि नारीवाद क्यों  जरूरी है ???
इसलिए मैं मानती हूं जब  नसरीन जी जैसी प्रखर लौह महिला कट्टरता से ,रूढ़ियों से लड़ सकती है तो  सामान्य नारी अपने अवैतनिक शोषण, घरेलू अत्याचार चाहे मायका हो या ससुराल दोनो जगह पिता, पति, बेटा, भाई  इनकी अधीनता   की बेड़ियों से खुद को आजाद क्यों नहीं कर सकती ।  आजादी का मतलब घरों को तोड़ना नहीं है बल्कि टूटी हुई  औरतों को उनका हक, सम्मान, इज्जत से जीने का नागरिक अधिकार दिलाना है । कानून अपनी जगह है , सामाजिक सुधार जब तक नहीं होगा तब तक यही चलता रहेगा अधीनता की बेड़ियों में नारी हर बार जकड़ती जायेगी।
अब इस पर भी कुछ पुरुषों की राय है कि मर्द बुरे नहीं होते औरतें भाई को भाई से अलग कराती हैं , सास ससुर के साथ रहना पसंद नहीं करती , वह  घर का कोई काम नहीं करती,  पति के जायदाद पर नजर रखती हैं आशिक के साथ भाग जाती हैं , पति को प्रताड़ित करती हैं और महिला कानून ऐसा है कि पुरुषों को ही विलन बना देता है ।
असल में पुरुषों की यह दलीलें कितनी सही है। चलिए  मान लेती हूं कुछ प्रतिशत पुरुष प्रताड़ित होंगे क्योंकि महिला लिंग होने से पहले एक मानव है तो इसी आधार पर एक मानव गलती भी करता है तो गलती करने वाले इंसानों में सिर्फ महिला ही कैसे ?? 
एडवोकेट भव्या रॉय  को जब पुलिस ने अरेस्ट किया तो खबरें बड़ी जोरदार तरीके से हर जगह ट्रेंड करने  लगी। 
मैं मानती हूं कि उन्होंने एक समुदाय को टारगेट किया जबकि हम सब जानते हैं बिहार एक ऐसा प्रदेश है जहां सिविल सर्विस में बड़े बड़े  होनहार , प्रतिभावान  युवक , युवतियां चयनित होते हैं और देश की सेवा करते हैं  ।
मैं यह भी मानती हूं कि एडवोकेट भव्या रॉय ने सोसाइटी के जिस गार्ड पर  गालियों की बौछार की  वह गलत है  जिसके लिए उनपर 5 धाराएं भी लगी  लेकिन.....
महिलावाद का तर्क है कि समाज ने उसे गालीबाज   कहा , और उससे भी बड़ी बात कि एक गालीबाज औरत यानी लिंग से जोड़कर देखा आखिर क्यों...???  
जब गालीबाज श्रीकांत त्यागी को अरेस्ट किया गया इस पर भी सवाल उठे कि महिला को बेल मिलता है और पुरुष को जेल और पुरुष कानून पर ही सवाल  उठाने लगे हैं। 
असल में कानून सबके लिए बराबर है श्रीकांत त्यागी को भी 4 धाराओं में अरेस्ट किया गया था जो गैंगस्टर वाले मामले से  अब भी आजाद नहीं हो पाए हैं।
गालीबाज औरत और गालीबाज पुरुष इन लैंगिक सूचक शब्दों का प्रयोग   बंद होना चाहिए ।
 इन पुरुषों का क्या जो रोज  उठते , बैठते , सोते, जागते अपनी ही मां बहन, बेटी को गाली देते हैं 
तेरी उसकी, तेरी उसकी,  यह सब  कब बंद होगा ....??  
कॉलेज के दिनों में  जब नारीवाद मेन विषय के रूप में पढ़ती थी तो  आक्रोश  होता था इस दोगले समाज पर   जो सदियों से बेड़ियों में बांधकर जकड़े रहने का काम करते  रहे ।  घूंघट प्रथा जिसमे  औरत मटकी लेकर , बच्चे गोद में लिए दूर दराज से पानी भरकर लाती थी, कभी चोट लग जाए कोई परवाह नहीं,  पति के मरने पर  जिंदा चिता पर लिटाकर ढोल नगाड़ों  की आवाज में उन्हें जलाया जाता रहा । सिर्फ इसलिए कि पति की दौलत उसके सगे रिश्तेदारों को  पूरा मिल जाए।  
इस पर भी  कुछ विद्वानों का मानना है कि वो स्वेच्छा से सती होती थी , पता  नहीं कौन सी घूंटी पीकर ये बड़े हुए है क्या इतना भी नहीं जानते अपना शरीर एक इंच कट जाने, जल जाने पर अथाह पीड़ा होती है तो  क्या महिला काठ की लकड़ी या कोई लोहे की वस्तु है जो ऐसा करेगी । 
असल में  अनपढ़ रखने की चाल थी  कि वह सवाल ना कर सके , ज्ञानोदय के युग से पहले तक उसे  प्रलोभन दिया जाता रहा कि स्वर्ग जायेगी और पति के साथ स्वर्ग सुख भोगेगी तो
अब नारीवादी यह मानते हैं कि   यह नियम पुरुषो के लिए भी होना चाहिए था कि पत्नी मर जाए तो दूसरी शादी ना करे , पहली पत्नी के साथ पुरुष खुद को भी सती कर ले  लेकिन...  नहीं 
यहीं से स्पष्ट होता है कि दोहरा समाज और खोखली रीति जो वाकई महिला जाति के लिए ठीक नहीं है।  ऊपर से पति परमेश्वर का टैग आधुनिक समाज में भी हद हो गई है । सारे नशेड़ी, शराबी, अत्याचारी  परमेश्वर  कहलाते हैं  !!!   उनको जीने के लिए औरत सारे व्रत  करे लेकिन क्या पुरुष ऐसा करता है शौक से नहीं अनिवार्य रूप से पुरुष अपनी पत्नी के लिए  सारे व्रत  रखता है  ?? क्या महिला को लंबी उमर नहीं चाहिए या वो कंटीले कैक्टस की तरह है जिसे खाद पानी की कोई जरूरत नहीं है । यही तो दोहरा चरित्र है  लेकिन  पुरुष मानते हैं कि अग्निपरीक्षा  अब उनकी हो रही है  और बेहद चिंतित हैं जिसके कारण पुरुष आयोग की मांग  उठने लगी है ।
बाबा साहेब को  एक पुरुष होकर भी जातिवाद झेलना पड़ा था , तो सोच सकते हैं एक महिला को कितना कुछ सहना पड़ता  था और आधुनिक समाज में भी क्या कुछ नहीं सहन करती हैं यह एक महिला ही समझ सकती है। जिसमे पितृसत्ता को, रूढ़िवादिता को , पुरुष प्रधानता को ,  ऊपर से दलित शब्द से जुड़ी हो तो जातिवाद से भी उसे जूझना  पड़ता था।  
आज भी हालत  वही है जातिवाद एक जहर बन गया है । जहां एक तरफ हम आजादी का 75 वा अमृत महोत्सव मना रहे हैं वहीं दूसरी तरफ राजस्थान के लाल देश के गौरव ये मासूम बच्चे इंदर मेघवाल के  घड़े से पानी पीने पर उसे इतना मारा जाता है कि उसकी मौत हो  जाती है और हम देश की आजादी के जश्न में सामाजिक छुआछूत में जकड़ा समाज की मानसिकता पर मातम मना  रहे हैं यही 2022 है जो जितना आधुनिक हुआ है उतना ही राष्ट्र हित के मुद्दों से भटका हुआ है।
 तो सोचिए पुरातन व्यवथा कितनी क्रूर रही होगी । यह तो वही बात हो गई "जाके पांव ना फटे बेवाई सो क्या जाने पीर पराई "
एक वर्ग यह भी कहता है कि अंबेडकर को , बुद्ध को भगवान क्यों बनाया , भगवान तो  इंसान से बड़े हैं  राम को पूजे , कृष्ण को पूजे  ये लोग भगवान हैं 
 वहीं दूसरा वर्ग यह कहता है कि जिसने समाज को कुरीतियों , छुआछूत से निकाला , महिलाओं को संविधान में बराबरी का अधिकार दिलाया  असली भगवान वही है ।
बुद्ध ने मानवता को सर्वोपरि रखा और जनमानस के दिलो दिमाग पर राज किए वह एक शांति दूत थे और बौद्धिज्म विश्वभर का धम बन गया। 
मैं यहां वर्गों  को सूचक शब्दों से प्रयोग नहीं करूंगी , इसलिए कि सूचक शब्द बार बार हमें कुरीतियों , अन्यायों ,शोषण को याद दिलाते हैं , हाशिए पर धकेल देते हैं और इसलिए नास्तिक लोग बढ़ रहे हैं तो  कहीं लोग धर्म परिवर्तन करते नजर आ रहे हैं , कहीं पर धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा मिल रहा है उसी तरह नारीवाद और पुरुषवाद भी बराबर टक्कर पर दिख रहा है । 
 हमारा देश एकजुट  रहे इसके लिए बहुत जरूरी है वर्गवाद को खत्म होना। 
सोशल मीडिया पर कई ऐसे लोग हैं जो नाम के पीछे भारतीय लिखते हैं 
सही है। अखंड भारत की पहचान है भारतीय । इस पर कानून को भी नए नियम लाने चाहिए। 
उन्हे समर्थन देना चाहिए जो राष्ट्रवाद को  महत्व देते हैं । 
पुरुष और महिला में यह टकराव कब खत्म होगा मालूम नहीं 1970 से महिलावादी आंदोलनों ने आज 2022 तक पूरे 50-52 साल  पूरा कर लिया  मूल्यांकन करें तो हमने क्या पाया ??  
 यानि संघर्ष या बदलाव एक पल के नहीं आता  पूरी 2 से 3 पीढ़ी जूझती है तब कहीं जाकर आने वाले नए  पीढ़ी के लिए बदलाव संभव हो  पाता है।  अंत में .....
 क्या पुरुष आयोग  की मांग ही महिला आंदोलन की जीत है , या सिर्फ खीझ है । यह महिला पुरुष दोनों को  ही समझना होगा !!! और विवाद के इस श्रृंखला को तोड़ना होगा । जिससे आने वाले पीढ़ियों को लिंगवाद , जातिवाद से ना जूझना पड़े ।


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