................................. रिसाइकल हो रही बेटियाँ आखिर सच ही तो है जिन वस्तुओं का हम इस्तेमाल कर चुके हैं उनका दुबारा से इस्तेमाल करने के लिए रीसायकल करते हैं प्लास्टिक हो मेटल हो या कागज ।हम उन सभी चीजों को दुबारा इस्तेमाल करते हैं तकनिकी द्वारा हम बिलकुल नवनिर्माण से चीजें आसान कर पाने में धुरंधर हो गए हैं ।मानव समाज में स्त्री हो या पुरुष दोनों के साझा सहयोग से ही विकास होता है बेशक पुरुष समाज नारी के योगदान को झुठला दे,या अपनी शाख़ पर प्रहार होने के डर से मानव के रूप में एक स्त्री को लज्जित करे और जब बात पितृसत्ता सोच की हो तब मसला वाकई और गंभीर हो जाता है तो क्या हम ये गांठ बांधे रह सकते हैं कि महिलाएं बेटियाँ भी कोई वस्तु हैं और उनको उसी अप्रायोगिक वस्तु की तरह उन्हें केवल शरीर(निर्जीव) मानकर ,उनकी भावनाओं को कुचलकर ,उनकी उडान के पर कुतरकर उनको मानसिक रूप से पंगु बनाकर उनके निर्णयों को शून्य करके पुरुष सत्ता अपना वजूद खड़ा रखने में सक्षम होगी? तो ये बिलकुल गलत है साहब! किसी भी लक्ष्य को पाने में घर की महिलाओं बेटियों और परिवार का अहम् रोल होता है ऐसा कदापि ...
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