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जुलाई, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

पितृसत्ता के दौर में रिसाइकल हो रही बेटियाँ

  ................................. रिसाइकल हो रही बेटियाँ आखिर सच ही तो है जिन वस्तुओं का हम इस्तेमाल कर चुके हैं उनका दुबारा से इस्तेमाल करने के लिए रीसायकल करते हैं प्लास्टिक हो मेटल हो या कागज ।हम उन सभी चीजों को दुबारा इस्तेमाल करते हैं तकनिकी द्वारा हम बिलकुल नवनिर्माण से चीजें आसान कर पाने में धुरंधर हो गए हैं ।मानव समाज में स्त्री हो या पुरुष दोनों के साझा सहयोग से ही  विकास होता है बेशक पुरुष समाज नारी के योगदान को झुठला दे,या अपनी शाख़ पर प्रहार होने के डर से  मानव के रूप में एक स्त्री को लज्जित करे और जब बात पितृसत्ता सोच की हो तब मसला वाकई और गंभीर हो जाता है तो क्या हम ये गांठ बांधे रह सकते हैं कि महिलाएं बेटियाँ भी कोई वस्तु हैं और उनको उसी अप्रायोगिक वस्तु की तरह उन्हें केवल शरीर(निर्जीव) मानकर ,उनकी भावनाओं को कुचलकर ,उनकी उडान के पर कुतरकर उनको मानसिक रूप से पंगु बनाकर उनके निर्णयों को शून्य करके पुरुष सत्ता अपना वजूद खड़ा रखने में सक्षम होगी? तो ये बिलकुल गलत है साहब! किसी भी लक्ष्य को पाने में घर की महिलाओं बेटियों और परिवार का अहम् रोल होता है ऐसा कदापि ...

चाणक्य नीति स्त्री विरोधी है??

  चाणक्य नीति स्त्री विरोधी है?? कॉलेज के दिनों में मैने नारीवाद और मनुस्मृति का अध्ययन किया था । बेहद अटपटा लगता था तब कि वह दौर कितना भयानक होगा जिस दौर में न जाने कितनी ही प्रथाएँ थीं। महिलाएं महिलाओं की दुश्मन हुआ करतीं थी । पुत्र की लालसा में ओझा तांत्रिको का सहारा लिया जाता था । पुत्रों को फल दूध मेवे खिलाकर लड़कियों को  पराया धन मानकर उनकी उपेक्षा की जाती थी यह तो आज भी विद्यमान है कुछ पिछड़े मानसिकता के लोगों में । चाहे वह शहर में हो या गांव में। मानसिक पंगु लोगों की  तदातें कम तो नहीं हुई ।  आये दिन अखबारों में  , tv में देखने सुनने को मिलता ही है ।  मैं बात कर रही हूँ धर्म ग्रंथो में फेरबदल की । अब  फेरबदल ही कहूंगी । क्योंकि जो ग्रंथ उस दौर के होंगे वे मूल प्रति में तो हमे और आप लोगों को साक्षात श्री हरि तो देने आएंगे नहीं । तो दौर जैसे जैसे बदला हमने हर धर्म ग्रंथ का संशोधित रूप ही पाया । फिर भी जितना हो सका अच्छे विद्वानों ने धर्म ग्रंथों को  मूल ही रहने दिया।  माना जाता है कि रामानन्द द्वारा रामायण धारावाहिक असल मे बिना तोड़े मरोड़े...

तीसरे नेत्र की शक्ति का आधुनिक रूप टेलीपैथी

  दिव्यदृष्टि क्या है ?? अष्टांग योग द्वारा अपने मन ,चित्त, इन्द्रियाँ इनको अपने वश में करके योग साधना से  हरि नाम का स्मरण करके जब अलौकिक शक्ति यानी कुंडली जागरण करते हैं तब जाकर दिव्यदृष्टि खुलती है कुंडली जागरण के बाद ही मनुष्य की 3rd eye यानी दिव्य नेत्र/दृष्टि खुलती है और वह भूत ,भविष्य, वर्तमान की बातें देखकर बता देगा । पुरातन काल में कोई विज्ञान की आधुनिक लेबोरेट्री नहीं थी इसलिए परामनोविज्ञान को समझने के लिए ऋषियों ने योग द्वारा अपने हृदय को ही परलौकिक विज्ञान की लेबोरेट्री बनाई ! घृतराष्ट्र ने जो पूरी महाभारत सुनाई थी वह भी दिव्यदृष्टि का प्रभाव था।    आधुनिक टेलीपैथी क्या है ?? चित्त यानी मन से परे का सम्प्रेषण  है टेलीपैथी ! अर्थात जब आप परचित्तज्ञान /टेलीपैथी की बात करते हैं  फैड्रिक डब्लू एच मायर्स  को आप जानते ही हैं  1882 में यानी 18वीं सदी में इस विज्ञान को उन्होंने टेलीपैथी नाम दिया और बहुत से अनुसंधान भी हुए ताकि आधुनिक पद्धति में मानव मस्तिष्क और कंप्यूटर की सहायता से एक विज्ञान के रहस्य को समझा जा सके । वस्तुतः यह शोध तो ज्ञान ...

भावनाएँ उमङती हैं

  भावनाएँ उमङती हैं निश्छलता झलकती है शायद किसी ने  करीब से देखा हो भावनाओं के बदलते रूप को यह सच है कि-भावनाएँ उमङती हैं माँ के लिए बेटे का प्यार जीवन भर एक समान रहता है बेटे के लिए माँ की अहमियत धीरे धीरे कम हो जाती है  तब भावनाएँ उमङती हैं माँ की ममता का निरादर करना दिल में छल और जुबां पर मीठे शब्द इन सब बातो से अंजान  एक माँ यह विश्वास लिए कि -उसका बेटा बुढापे का सहारा बनेगा वह अपनी संपति बेटे को सौंप निश्चित ही बेफिक्र हो जाती है तब भावनाएँ उमङती हैं वह मक्कार बेटा अपनी चालों से माँ को उलझाकर  दो मीठी बातो से उसके दिल पर प्रहार करता है संपत्ति पर हक जताकर घर से बेदखल कर देता है तब भावनाएँ उमङती हैं दर दर की ठोकरें खाकर दर्द से कराहती वह माँ अपने जिगर के टुकङे की नफरत साथ  लिए एकाकी जीवन जीती है  वह कोई शिकायत नहीं करती उसका रोम रोम बेटे के लिए मंगल कामना करता है तब भावनाएँ उमङती हैं जा बेटा तूँ अपनी दुनिया में खुश रहना यह कहकर वह अंतिम सांस लेती है और बेटे को आशीष देती है तब भावनाएँ उमङती हैं बेटे के हर कृत्य को एक माँ नादानी समझ माफ करती है कितना...

कविता लिखी नहीं जाती

  कविता लिखी नहीं जाती वह तो स्वत: ही लिख जाती है भावनाएँ व्यक्त नहीं की जाती वह तो स्वमेव व्यक्त हो जाती है प्रेम किया नहीं जाता, जीवन की राहो में असमय प्रेम हो जाता है जीवन काटा नहीं जाता बल्कि मुश्किलें हमें जीना सिखा देती हैं जहर पिया नहीं जाता बल्कि दो कङवे बोल हमें जहर पिला देते हैं नम्रता सीखी नहीं जाती  बल्कि यह तो हमारे अंतर्मन में  मृग कस्तूरी सी छिपी होती है महान बनने की कोशिश नहीं की जाती अक्सर हमारे अच्छे कर्म हमें स्वत: ही महान बना देते हैं मैं फिर से यही कहूँगी कविता लिखी नहीं जाती यह तो स्वत: ही लिख जाती है! "गायत्री शर्मा"

शब्द पहेली

  एक एक अक्षर से जुङकर नित शब्द नए बनते जाते हैं भाव हो दिल का कोई भी शब्द अक्षर से बया होता है कितने गहरे अर्थ हैं इनके हर एक मोती में माला है सुख दुख आहत  प्रेम प्रलोभन कूट शब्द का जाल रचा है अक्षर वही हैं सीधे साधे  जगह बदलकर अर्थ बनाते शब्दों का कर उलटफेर मानव बुद्धि का वजन बढाते  ॥ गायत्री शर्मा

मेरी कविता

  मेरी कविता बन गई मेरी हृदय गीत की परिभाषा शेरो शायरी भूलकर अब मैं लिखने लगी अंत:अनुभूति मेरे दिल की हर एक बात जुबा जिसे ना बयाँ कर पाए आँसू जब स्याही  बन जाए कलम हृदय की व्यथा कहे आँसू अविरल धारा बनकर जीवन को गतिशील करे जब चिंतन को विस्तृत किया महसूस किया पीङा समाज का कविता मन का  दर्पण बनकर समाज का दारूण व्यथा दिखाए मैं कामिनी बन प्रेमी रूप को दर्पण में न  निहारूं...... इन आँखो के अश्कों से उपजी  गरीबी दरिद्रता की परिभाषा मेरी कविता बन गई मेरी हृदय गीत की 'परिभाषा'! "गायत्री शर्मा"

मझधार है ये संसार तेरा

  मझधार है ये संसार तेरा मांझी बन खेवन आ जा तूँ मैं उलझ रही इस दुनिया में उलझन सुलझाने आ जा तूँ दुर्गम पथ है घनघोर घटा दीपक बन राह दिखा जा तूँ सुख-दुख मे एक समान रहूँ समता का मार्ग बता जा तूँ हृदय पीर,व्याकुलता को मुरली की धुन से हर ले तूँ इस चंचल चित को मोङकर मुक्ति का मार्ग दिखा जा तूँ गायत्री शर्मा

Deep pain पीड़ा

  पीङा क्या है ?क्या यह मात्र  आभास है जो हमें प्रतीत होता है यह किस प्रकार का एहसास होता है जिसे हम महसूस करते  हैं जिसके उग्र स्वरुप में समाकर दिल रोता है ,आत्मा कराहती है एवं हमारे व्यवहार में परिवर्तन दीखता है चूंकि यह संभव है की इस दर्दनाक अनुभूति को कोई नहीं भूल सकता है जहन में कैद हो जाती हैं जिसका प्रभाव हम अपने नियमित जीवन में देखते हैं महसूस करते हैं।  पीङा एक सूक्ष्म प्रभाव है मन पर जो मानव को आहत करता है बारंबार मानव हृदय टूटता बिखरता और जुङता है एक सूक्ष्म प्रक्रिया के रूप में हमारे कल्पना में सोच में हर पल में समाहित होकर हमें वेदना से व्यथित करता जाता है क़ि हमारे नियमित कार्यशैली प्रभावित होती है। क्या कोई किसी शक्श के पीड़ा का अनुमान लगा सकता है? पर सवाल यह है कि कैसे ? यदि वह व्यक्ति स्वयं उस स्थिति से जूझ चूका हो वह बेहतर समझ सकता है परंतु आज के समय में किसी के पास इतना समय होगा किसी का दर्द साझा करने का! शा यद् नहीं। यदि हम विचार करें तो प्रश्न यह उठता  है कि पीङा क्या शारीरिक  होती है या केवल मात्र मानसिक ? जिसका आभास केवल जागृति में है य...

भ्रष्टाचार

  राष्ट्र की प्रतिभा ,युवा, जवानी जनसँख्या पर बलि चढ़ी है लोभ,प्रलोभन,घृणित राज में सुशासन पर भारी पड़ी है अर्धविक्षिप्त अवस्था में सड़कों पर प्रतिभाएं पड़ी हैं चंद सोने के सिक्कों खातिर मर्यादाएं यहाँ धरी पड़ी हैं कृषि, व्यवस्था की हालत वस्तु मूल्यो में इजाफा हुआ जीवन का आसार नहीं है प्रकृति का कोप बढ़ा है  इस धरती की सभी धरोहर माफियाओं ने सोख लिया है मान लो अब इस देश में यारों लोकतंत्र औंधे मुँह पड़ा ।। गायत्री शर्मा

फूलों की सुरक्षा में काँटों का होना

जन्मी है एक नन्ही परी रोशन हुआ है घर आँगन पिता की ऊँगली थामकर घूम रही है वो परी नहीं है फ़िक्र भूत का और फिक्र नहीं भविष्य की खुद में ही वो खिलखिलाती मदमाती सी वो परी खेलती है कांच के और काठ के खिलौनों से झूम झूम नाचती है चुलबुली नन्ही परी यौवन की दहलीज पर कदम उसने ज्यों रखा समाज की नजरों में अब उतर गयी है वो परी एक वक्त वात्सल्य भरा पूर्ण प्रेम को पा रही थी आज इस यौवन को अब हैवानों से बचा रही दंश टीस ह्रदय की तीव्रता से बढ़ने लगी घूरती मवालियों के नजरों से  वो बच रही यौवनावस्था में प्रवेश कर ,बचपन को पार किया सोचकर विचार कर व्याकुल  माँ हो रही है  शुभ विवाह की जोरों -शोरों से तैयारी चल पड़ी फूल सी आँगन में जहाँ चहकती थी वो परी छोड़कर संसार अपना अब किसी की हो चली मायके को भूलकर माँ का वचन निभा रही बन गयी है आज वो किसी की जीवनसंगिनी रिश्तों की डोर खुद संभालती है वो परी नाजों साज में पली -बढ़ी हिंसा से वो तड़प रही पुष्प की कोमलता से काँटों भरा  उसका सफ़र प्रताड़ना को सहते हुए माँ की बातें सोच कर बेटी उस  पराये घर को अपना स्वर्ग समझना रूखी सूखी खाकर भी मुँह ना अपना खोलना स...

क्या यही रीत है

  उमंग से भरी ,मन की गति प्यास है कोई,मिटती नहीं दूर तक घनी, निशा की रोष से पीर भर ह्रदय, सजल नैन है मृगतृष्णा ये जहाँ,किस खोज में है भटक रहा है क्यों, है रास्ता कहाँ धरती गगन मीलों, दूर मिल रहे है जैसे भरम काई, मन में जम रही है ख्वाब अनगिनत नाजुक सा है दिल किसे ये समेट ले  किसको वो तोड़ दे वक्त का मरहम ,वक्त के चोट पर औषधि है कभी,  कभी दर्द बन रहा क्या यही रीत है ,खाक ये जिंदगी जीना मरना यहाँ ,नहीं आसान है। गायत्री शर्मा

ढाबे का छोटू

  काम करता रहा ,ख्वाब बुनता रहा ढाबे का छोटू  बचपन को खोता रहा अनगिनत ख्वाब और आँख में भर नमी इस फ़िकर में पड़ा वो सिसकता रहा घर में बीमार माँ ,ना दवाई का खर्च तंगी भारी पड़ी कैसे  रह पायेगा कुछ बचत से कभी आँखों में भर चमक तीजो त्यौहार महंगे  बजट से बड़े मन को मारे रुआंसा न खर्चा किया सुखी रोटी खा उसमे गुजारा किया उस बचत से कभी दाल-रोटी मिले बिगड़े दिन में कहाँ कोई करता भला छोटू का बचपन खोते माँ सब देखती जब मोहल्ले के बच्चे गए थे स्कुल किस मुह से कहे ढाबा को छोड़ दे घर में तंगी हो छोटू स्कूल चल दे वक्त की ठोकरों ने ये क्या कर दिया पेट की भूख ने उसका बचपन छिना उम्र से पहले छोटू बड़ा हो गया काम के बोझ में बालपन खो गया।। गायत्री शर्मा

दर्पण चेहरा अंजाना सा

  साँझ तले बीते  रैना,अश्कों से भीगे हैं नैना पलकें दर पलक झपकती है अकुलाहट ना ,दिल में चैना मौसम ने रंग जमाया है ,वो ठंढी फुहारें अंगार लगे तपता भानू से धरा जहां ,वही धरा बना मन का अंगना विक्षोभ हो जिस पल अपनों से ,रिसने लगे जीवन की बगिया क्या लोभ पले इस जीवन में ,सेमल पुष्प सी ये दुनियाँ जड़ता ने पंख पसारे हैं, सपनों के पंख बेचारे हैं जो भोर हुआ किरणें छिटकीं ,आशाओं का तब दम निकला निशि से घिरी रैना ढल जाये ,कोई जख्म हरा फिर हो जाये मुरझाये चमन अन्तःमन का,  दर्पण चेहरा अंजाना सा  दुनिया का रंग फिजुली है ,ना फ़िक्र रहा मिट जाने का।। गायत्री शर्मा

बच्चे तुम तकदीर हो कल के हिन्दुस्तान की

  एक वक्त होता है हर बालक के जीवन में  चैन-ओ-सुकून भरा जिसमें न भविष्य की और न ही भूतकाल की चिंता होती है वर्तमान ही  उसका सबसे सुंदर पल होता है ख्वाब-ओ-अरमानों की टोली के संग  और हंसी ठिठोली के बीच वह बालक जब  दुनिया से नादाँ होता है और लोगो के पैंतरों ,दोहरे चरित्रों और मक्कारी से बेखबर एक दौर बचपन का दूसरे दौर को दर्शाता हुआ स्वाभाविक तौर पर अस्विकार्य निर्णय होगा वक्त संवेदना ,सजीवता, और विविधता को दर्शाता है तब हम समाज के साथ बढ़ने का लक्ष्य साधते हैं एक बालक समाज से अंजान खुद में मगन लेकिन जब हिस्सा बनाया जाता है उसे हर दायित्व का कर्तव्यों का भार वहन करने को सीख देकर लड़का और लड़की के बीच का भेद बताकर ऊंच नीच जाति और संप्रदाय के गंदे खेल में उलझाकर हर तरफ से स्व हितपोषण की बात कहकर षड्यंत्रों ,मक्कारियों के बीच फंसाकर संस्कारों ,मर्यादा के नाम पर प्रहार कर उस कोमल मन को यह बोध कराया जाता है वह भी दोहरा चरित्र अपना ले मक्कारी सीख ले तब उसे घृणा हो जाती है इस दोहरे चरित्र वाले समाज से न खुद समझ पाता है न किसी को समझा पाता है इस दरमियां कश्मकश का वो दौर जाने कि...

हार मत मानो

  नाचीज़ हो जीवन करना क्या , कायर बन जग में जीना क्या खुद के हालातों से टूटे जो ,वह शख्श भला फिर जिन्दा क्या लाखो हैं बुलंद फ़साने यहां, फिर भी गफलत में सोना क्या तूँ दांव चले जा दुनिया में, बाजीगर हार के रोना क्या पागल रस्ता रस्ता छाने, सब कुछ खोकर अब पाना क्या ठुकराए बेवक्त तेरा कोई, ले दर्द जिगर में घुटना क्या उस अतीम से जाकर पूछ जरा , हर हाल में खुश है कहना क्या वो गरीब अभाव में जिन्दा है, दौलत के पीछे मरना क्या दो पल की हैं जिंदगी जी ले, ख्वाहिश बेशुमार भी करना क्या हंसकर हर गम को भुला देना, शिकवा-ओ-शिकायत करना क्या मत बांध अंधेरों में खुद को ,मायूसी लिए अब फिरना क्या जीवन का मतलब लड़ना है , अब सोच फिकर में ढलना क्या । गायत्री शर्मा                              

धूप छाँव सा जीवन

  खुशियों से भरा हो लाखों पल ,कहीं नैन नमी से युक्त रहे झरझर बरखा  जो बून्द पड़े , फिर भी अंगना हो अनल  तले नभचर  ख़ग दाना- दाना को ,अन्न नीर बिना जैसे तरसें विचरे नभः में पंखे लहरा , उन्मुक्त गगन से दूर चले जो क्षितीज दिखे पंखों के परे ,भानू किरणों से तपता रहा अंकित जो करूँ दुःख का बादल ,चहुँ ओर घिरे पर भीग रहे ना उड़ पाया न ठहर सका, हर तरफ ही नीड़ तलाश रहा बेबसी के काले बादलों ने ,सपनों की उड़ानें रद्द कर दी चंचल ऋतुओं का क्या कहने,बेवक्त मिजाज बदल बैठे बेमानी लगे सावन भी उसे ,वो मयूर नहीं जो थिरक सके पंखें भीगी नम नैन हुए, किस ओर दिशा में नीड़ बसे। गायत्री शर्मा

ग्रामीण समाज

  ग्रामीण समाज नया परिवेश गाँवो का वो  मनोहर  दृश्य  आज प्रत्यक्ष अनुभव से जाना हमारे शहर और यहाँ के लोग अंतर जमीन आसमान का है लोग अजनबी हैं मेरे लिए परंतु शहरों से काफी बेहतर हैं जो खूबियाँ है यहाँ के लोगो में ग्रामीण सहयोग प्रेम और सौहार्द  आज शहरों की चकाचौंध में दफन है  समय के अभाव में रिश्तों में बढती दूरियाँ यही है हमारे शहरों की खूबियाँ बढ रही हूँ मैं निरंतर अंजाने ङगर पर चल मीठी यादें स्मृतिपटल में संजोए इस बार भी "एक नया अनुभव" !" गायत्री शर्मा"

चीन की चाल

  चीन के  कुचाल को समझ समझ के हार गए थोड़ा  आगे थोड़ा पीछे कूट चाल चलता है सीमाओं पर सैनिकों की घुसपैठ कराकर आधे सेअधिक जमीन भारत का हड़पा है चीन का चरित्र  बुरा दुनिया ने देख लिया ड्रैगन के भेष को  गीदड़ सा पहचान है नेपाल को झांसा देकर विरुद्ध भारत के  किया कोई चाल कूटनीति काम नहीं आनी है भारत की ताकत का अनुमान  तक नहीं आधुनिक परिप्रेक्ष्य पूर्व से अलग है चीन का सामान जनता को मंजूर नहीं मेक इन इंडिया का कार्य प्रगति पर आया है अमेरिका संग मिल कर कुछ देश ने  ही  व्यापारिक सम्बन्धों से नाता तोड़ डाला है यही है विदित सार्वजनिक  कथित रूप चीन के लिए ही तमाम दरवाजे बंद हैं जिसने रचा बनाया वायरस कोरोना को देश दुनिया तलक ने उसे दुत्कारा है। ................................................. गायत्री शर्मा

दो शब्द (सुविचार)

  ★ सुंदरता पर सुंदर तन  का आभूषण  , बाह्य सौंदर्य निखारे स्वच्छ मन का प्रतिबिंब , जीवन अनमोल बनाये।। ★माफी पर माफी शब्द मिटा देता है ,इंसान की हर गलती को आज यही हथियार बना है , नकाबपोश कुछ चेहरों का। ★गमों पर रिश्ते नाते सब झूठे हैं और झूठा है ये संसार दो पल की खुशियां है जहाँ में बाकी गमों का है सैलाब।। ★ जमाने पर बदल रहे हैं हम बदल रहा है जमाना किससे क्या उम्मीद करें यह समझ रहा है जमाना।। ◆ खुद का विश्लेषण  कितनी आसानी  से हम दूसरों की गलतियों को ढूंढ निकलते हैं काश की उतनी ही बारीकी से अपनी गलतियों का निरीक्षण कर पाते ।। ★ सद्भावना पर दिलों में तकरारें और आपस में ये दरार जैसे  दो बर्तन आपस मे करते हैं झंकार मिट जाना है वजूद हमारा क्यों करते अभिमान आपस मे मैत्री भावों का करते चलो संचार ।। ★ मंजिलों पर मंजिलों तक पहुंच गर इतना आसान होता तो जीवन में संघर्षों पर पूर्ण विराम होता ।। ★ हुस्न के अहम पर अजब जमाना  का है तमाशा हर एक शख्श का नया बहाना हुस्न ए सूरत राख हो जाना , फिर क्यों इतराना , बलखाना।। ★अहंकार पर अहम की फसलें जो काट ना सका संस्कारों की उप...

प्रेम और आकर्षण का मनोविज्ञान

  लड़के जब सच्चे प्रेम में होते हैं तब उनकी मनोदशा क्या होती है ....... अक्सर  लोग प्यार और अट्रैक्शन को लेकर हमेशा डाउट  में रहते हैं बाहरी आकर्षण को प्यार समझने की भूल  कर बैठते है। दोनो बातें अलग अलग हैं जब आकर्षण होगा तभी प्रेम होगा किन्तु प्रेम आपको मानसिक और भौतिक सिक्योरिटी देता है तब क्या होता है यानी लड़के जब प्यार में होते हैं तो एक जिम्मेदारी का आभास करते हैं , भविष्य की प्लानिंग करते हैं , अपने पार्टनर के लिए समर्पण भाव से उसकी खुशियों का ख्याल रखते हैं एक सिक्योरिटी प्रोवाइडर के तौर पर वह अपनी फीमेल पार्टनर को देखते  हैं।  उनमें अपनी फीलिन्स को हाईड करने का प्रचलन अधिक होता है।  अपनी भावनाओं को वह बैलेंस रख सकते हैं क्योंकि सामाजिक परिवेश में रोना , अधिक चंचलता दर्शाना, बात बात पर हंसना जैसे लड़कियों के स्वभाव मानते हैं इसलिए लड़कों को मजबूत रहने गम्भीर रहने की सलाह देकर बड़ा किआ जाता है ।परंतु यह समाज भूल जाता है कि जैविक रूप से लड़के लड़कियां दोनों इंसान हैं और मानव अपने स्वभाव से कैसे विपरीत व्यवहार करें ।इसलिए लड़के अल्कोहल का सहारा लेते हैं ,...

मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी आत्महत्या का कारण तो नहीं?

  अवसाद से आत्महत्या का चक्रव्यूह!  क्यों गढ़ता है  इंसान ??  आज   युवा  आत्मदाह  की ओर अंजाम पर पहुंच रहे हैं हमने सुशांत सिंह राजपूत केस तो सुना ही होगा। अब यह साजिश थी या आत्महत्या यह तो विवादास्पद रहा है क्योंकि न्याय की लड़ाई  बीरबल की खिचड़ी नहीं है।   सब कुछ पा लेने वाला भी जब  निराश हो उठता है तो दुख होता है  इस पूरी आबादी का एक ऐसा तबका जो संसाधनों के पीछे भाग रहा है नाम, रुतबा, आराम के लिए संसार के मृगमरीचिका में दौड़ रहा है  यह सब क्या है ?? क्यों  प्रेरित करता है यह अवसाद  जीवन दाह को !  बहुत विडंबना है समाज की  आखिर  मुस्कुराहटों के पीछे भला जिंदगी की शाम का इन्तजार क्यों ........??? कहते हैं कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता , किसी को जमीं तो किसी को आसमां नहीं मिलता ।। "यह जीवन तो कुदरत की इनायत है  सृष्टि का आधार है मानव , सृष्टि का श्रृंगार है ,  मानव से ही यह धरती है , मानव से मानवता है ।।   इंसान की माकूल अहमियत बताते हैं हमारे वेद-शास्त्र और महापुरुष  , जो...