उमंग से भरी ,मन की गति
प्यास है कोई,मिटती नहींदूर तक घनी, निशा की रोष से
पीर भर ह्रदय, सजल नैन है
मृगतृष्णा ये जहाँ,किस खोज में है
भटक रहा है क्यों, है रास्ता कहाँ
धरती गगन मीलों, दूर मिल रहे है
जैसे भरम काई, मन में जम रही है
ख्वाब अनगिनत नाजुक सा है दिल
किसे ये समेट ले किसको वो तोड़ दे
वक्त का मरहम ,वक्त के चोट पर
औषधि है कभी, कभी दर्द बन रहा
क्या यही रीत है ,खाक ये जिंदगी
जीना मरना यहाँ ,नहीं आसान है।
गायत्री शर्मा
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