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नवंबर, 2023 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

गुरु महिमा है अपार जगत में _स्तुति

  गुरु सब तीर्थों के तीरथ हैं  गुरु त्रिवेणी की धारा हैं गंगा की पावनता के जैसे शिष्य को शीतल छाया गुरु हैं गुरु तरुवर के मीठे वृक्ष सम गुरु गिरिराज से ऊंचे शिखर हैं उनकी छाया जिस पर पड़ता आशीष से जीवन गुल खिलता पुष्पों की फुलवारी में दमके चंद्रमुखी से चमक गुरु हैं चंदा के मुखड़े के जैसे शीतल भाव समान गुरु हैं गुरु की आज्ञा सर माथे हो , चौखट पर माथा नवता हो दिल में मूरत राख गुरु का , गुरु  में रमता शिष्य अजेय है गुरु काल के महाकाल हैं  आदि अंत से सदा परे हैं गुरु हैं अगम अगोचर रूपक  गुरु वेदों में उपनिषद है गुरु सार शब्द गीता ज्ञान है गुरु भक्त का कल्पवृक्ष है गुरु कर्ता करतार   गुरु है पारब्रह्म से परे गुरु है गुरु पारलौकिक महामंत्र हैं गुरु आध्यात्मिक विश्लेषण है गुरु ज्ञान का बाण अमोघ हैं  शिष्य के खातिर संजीवनी है गुरु के वचनों में विश्वास हो  शिष्य को यम से भय ना व्याप्त हो गुरु की शक्ति तीनो लोको में सुर  गण देव अथाह बतावें जिनका अंतर अन्वेषण हो , अध्यात्म  ज्ञान का परिचायक हो बिन गुरु कृष्ण त्रिलोकीनाथ ना...

मुक्तक आध्यात्मिक

  सांसारिक उपलब्धियों के बावजूद एक कोना है इस मानव हृदय में जो  अध्यात्म की कमी को महसूस  करता है यह सदियों से चला आ रहा है अगर अध्यात्म जीवन की आवश्यकता न होती तो युद्ध क्षेत्र में भगवान अर्जुन को राजविद्या का ज्ञान ना दे रहे होते ...... आध्यात्म की बैसाखी के बिना नर पंगु होता है ,  भौतिकी लाख हो उपलब्धियां क्षण भंगुर होता है  छिपा है अनंत अद्भुत शक्तियां मानव हृदय पट में  कुंडलिनी जागृति से चक्र आवागमन मिटता है ।। ********** और सच्चे गुरु की  पहचान क्या होती है कैसे हम आप यह जानें की किसकी शरणागति होनी है  तो कुछ लक्षण अपने शब्दों में उजागर किया है अध्यात्म के इन गूढ़ रहस्यों को हृदयोंदगार कर। जान गुरु की पहचान कर सकते हैं  कि जगमग जिसका अंतर्मन हो बाहर भीतर स्थितप्रज्ञ हो सुध हो जिसकी आत्म संयमित जीवों को कर दे जो भय हीन धर्म संहिता का ज्ञाता हो राम राज्य सा उसका दर हो  नीच अधम पतित मानव का करता जो उद्धार है  देव स्द्रीश चैतन्य महाप्रभु सदगुरु तुम्हे प्रणाम है।।

मुक्तक राष्ट्र भक्ति

 राष्ट्र भक्ति कलाकारी अदाकारी हुनर कुछ खास जिनमे हो  मुकाम ए शौहरते सम्मान ओहदे खास उनके हों  कला का धर्म ना कोई नहीं मजहब की बंदिश है अनेकता में एकत्व फले ये हिंदुस्तान बेहतर हो।।  गांधी जी  वृति हिंसक हो तो धरती पाप के बोझ ढोती है  आजादी की तड़प हुंकार चींखे मन में गुंजती है जंग_ए_आजादी में घेरे लुटेरों और फिरंगियों को अंग्रेजो के वस्त्र स्वाहा कर बापू पहने धोती हैं। वीरों के सम्मान में आजादी के सिर-मोर-मुकुट जन-मानस में जो रमते हैं, निज स्वार्थ से ऊपर उठकर जो राष्ट्र हितैषी होते हैं, सम्मान में अपने देश के खातिर शत्रु से टकराएं जो, करबद्ध नमन उन वीरों को जो मातृभूमि पर मिटते हैं।। राष्ट्रीय एकता पर प्रेम ही प्रेम है जग मे , ना पालो नफरतें दिल में पशु ,पक्षी, वृक्ष ,फूलों , से सीखो कुछ हुनर खुद में विधाता ने विविधता से , सजाया है जहाँ को खुद आदायगी करके ऋण अपना ,करो जन्नत जहां को तुम।। कवि और लेखक का धर्म राष्ट्र के हित की बातें हो सामाजिक आपबीती हो गीत गजलों में कविताओं में केवल बात सच्ची हो सरल अनुपम मनोहर वीर और श्रृंगार अद्भुत है गढ़ो जब ...

भोर के स्वप्न में

  इस भोर के स्वप्न में जाने कैसी ये  आहट है। उलझूं जब खुद में मेरे मुरशिद का दीदार हो ।। ख्वाब बेवजह तो नहीं कि  कह सकूं सब बेहतर है  । तू संभाल लेना मुझे कि तुझ पर यकीं खुद से ज्यादा हो। तेरी नजरों के सामने भरे दरबार का वो मंजर । कि तेरे कदमों को चूमकर मेरे रूह में हरारत हो ।। दुनिया की भीड़ में एक रूहानी दर है तेरा । तुझे एकटक देखूं तो मेरे नसीब का जागना हो।। क्या करम है मेरे मौला जो मुझे महफूज किया तूने। महसूस करता है दिल मेरा तू मुझमें कतरा कतरा हो ।। दुनियावी तिलिस्मों में एक रूहानी छाया है ऐसा। तूं मुझ  में रचा बसा है ऐसे जैसे मृग में कस्तूरी हो।। एक फरियादी बन तुझसे गुजारिश करती है गुंजन। दुनियावी ख्वाहिशें खत्म हो तेरा दीदार ही मेरी जन्नत हो ।। ©®

कवयित्रियां कैसी होती हैं part 2( लेख)

  संस्कार न्यूज में प्रकाशित लेख  कवयित्रियां  कैसी होती हैं  दीक्षा ने पूछा ....."   हंसी मजाक और ठहाँको के बीच  दीक्षा बोली ...''  चलो अब कौन  क्या परफॉर्म  करेगा सब बताओ   एक एक करके !!  गजाला ऑफिस से थकी हारी आई  कुछ देर आराम करने को लेटी ही थी कि  कवि हृदय की झंकार और गुंजन उसके कानो में मिश्री घोल रही थी।  वह तुरंत उठकर बैठ जाती है कि दोनो सहेलियां उसकी उत्सुकता को देख  हंस  पड़ती हैं "हां हम बेवकूफ हैं " घरेलू औरतें हैं हमे नहीं आता पैसों का हिसाब करना "   वाह वाह वाह वाह क्या खूब लिखती हो यार और वो भी इतना संजीदा विषय बहुत खूब.... दीक्षा और गिन्नी की तारीफ  सुनकर गजाला हल्की सी मुस्कान लिए पंक्तियां  खत्म करती है   अब बारी गिन्नी की आती है सब तालियां बजाते हैं  गिन्नी  भी सफर से थकी हुई थी कि उसका गला उसका साथ नहीं दे रहा था  इस सर्द गर्म मौसम का असर  भी इस महफिल को उदास ना होने दिया । गिन्नी ने थोड़ा रुककर गीत शुरू किया  ...."  जो...

देशभक्ति

ना घात करना राष्ट्रद्रोहों जागो अबकी बार  इस देश की मिट्टी के हम कण कण हैं कर्जदार  कुचले फनों को  विषधरों को राष्ट्र के जवान बापू की जन्मभूमि है ये  देश है गुलजार   ना घात करना राष्ट्रद्रोहों ..... जहां जन्मे पटेल तांत्या टोपे लाल बाल पाल सेल्युलर जेलों का काला पानी थी वीभत्सना  दृढ़ राष्ट्रवादी नौजवां भगत ने त्यागे प्राण भारत का गांव गांव और शहर है बेमिसाल ना घात करना राष्ट्रद्रोहों..... स्वतंत्रचेतना  जनजागरण  उदघोष से  राष्ट्र वाद भाव  प्रेरित  राष्ट्र कवियों से। सोनेकी  चिड़िया आज बेड़ियों से मुक्त है जिसके बचाव में  लगा था पूरा हिंदुस्तान ना घात करना राष्ट्रद्रोहों..... पुष्प की अभिलाषा हो या इंकलाब स्वर  खदेडे थे उन गिदड़ों को भारती के लाल  निर्भय हो दुर्ग लांघे  'गुंजन' दर ओ दिवारें  असंख्य बलिदानों की गाथा मेरा हिंदुस्तान।। ©®

रुद्रपुर उत्तराखंड की स्मृतियां

 रुद्रपुर, उत्तराखंड   ये शहर मुझको एक अनजान शहर लगता था  इसकी फिज़ाओं में सुर संगीत वास करता था  मैने देखा है  बुलंदी को छू  लेते हैं जो  वो शख्स अहम के पाले मगरुर  रहता था  ये गलत धारणा मेरी जो अब खारिज होगी  अपनो को नाराज करना अब ना ये वाजिब होगी  भर के  आकाश तक प्यार  जो लुटाया है  ऐसे एक शक्श को गुंजन की सलामी होगी।।  ©®

कवयित्रियां कैसी होती हैं?

  कवियों पर तो बहुत से हास्य परिहास और वाद होते ही रहते हैं  आज  मेरी ये खास पेशकश कवयित्रियों के लिए है  उत्तराखंड काव्य महोत्सव बुलंदी अंतर्राष्ट्रीय द्वारा आयोजित कार्यक्रम ..... कुछ सवालों का मेरे मन में ना उठना होता गर सहेली ने मुझको रूबरू ना कराया होता मुझको मालूम ना था कवयित्रियां कैसी होंगी महफिलों में अगर शिरकत ना  किया होता ।। उनको जींस टॉप बेहद बेशुमार  जंचता है किंतु कवि महफिलों में सूट साड़ी जमता है गालों की लाली और मुस्कान ये बताती हैं गोटे वाला चमकता दुपट्टा कमाल लगता है ।। महफिलों में वो इश्क मोहब्बत गुनगुनाती हैं अपनी अदाओं से खिलकर खूब मुस्कुराती हैं किंतु नारीशक्ति का खुलकर  समर्थन कर दे तो संजीदे विषयों पर आह  वाह भी ना मिलती है ।। फिर भी नारी शक्ति पर लिखना ना वो भूला करतीं और व्यवस्थाओं कुरीतियों पर बेवाक ही कहती कोई कुछ भी कहे  इनको ना  घंटा फर्क पड़े साहित्य की धरोहर इनसे  ही रक्षित होती।। ©®

दीवाली

  ये त्योहारों का सीजन अग्रिम खुशियां लाता है और ये मशगूल  रखकर वर्क लोड बढ़ाता है लड़कों का काम क्या है पूछे आखिर उनसे भी  साफ सज्जा में कौन कितना  परिश्रम करता है।। जालों से भर गई है दीवारें कोने कोने तक   नींद  आलस्य छोड़े  फुरसत ना है सोने तक  और ये फर्श टाइलें चमके कि  ये जिद ठान लिये  अब तो एक धूल कण मिट्टी जमे ना दीवारों तक।। बचके रहना  पेड़ो और दूध मिष्ठानों से  कोई आसार नहीं कि शुद्ध है घर के खाने से भारी तादातों में है मांग  मिलावट का बाजार घर पर ही बनाना हर पकवान इस दिवाली में।।   भूख के पटाखों में असहायों की पीड़ा  जानी है किसी की जिंदगी गुलजार किसी की पीर घनी है पूछती है ये गुंजन  हे विधाता क्यों ऐसा जगत रचा  किसी का  उजला जहां तो किसी की दिवाली काली है ।। ©®