कवियों पर तो बहुत से हास्य परिहास और वाद होते ही रहते हैं आज मेरी ये खास पेशकश कवयित्रियों के लिए है उत्तराखंड काव्य महोत्सव बुलंदी अंतर्राष्ट्रीय द्वारा आयोजित कार्यक्रम .....
कुछ सवालों का मेरे मन में ना उठना होता
गर सहेली ने मुझको रूबरू ना कराया होता
मुझको मालूम ना था कवयित्रियां कैसी होंगी
महफिलों में अगर शिरकत ना किया होता ।।
उनको जींस टॉप बेहद बेशुमार जंचता है
किंतु कवि महफिलों में सूट साड़ी जमता है
गालों की लाली और मुस्कान ये बताती हैं
गोटे वाला चमकता दुपट्टा कमाल लगता है ।।
महफिलों में वो इश्क मोहब्बत गुनगुनाती हैं
अपनी अदाओं से खिलकर खूब मुस्कुराती हैं
किंतु नारीशक्ति का खुलकर समर्थन कर दे तो
संजीदे विषयों पर आह वाह भी ना मिलती है ।।
फिर भी नारी शक्ति पर लिखना ना वो भूला करतीं
और व्यवस्थाओं कुरीतियों पर बेवाक ही कहती
कोई कुछ भी कहे इनको ना घंटा फर्क पड़े
साहित्य की धरोहर इनसे ही रक्षित होती।।

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