सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

जून, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

हनुमान और राम के बीच युद्ध का क्या परिणाम निकला ?

एक  बार काशी नरेश ययाति नें ऋषियों का अपमान करके अपने बल और शौर्य के मद में चूर होकर रघुकुल  के सम्मान को ठेस पहुंचाया था और इस दृष्टता के कारण  प्रभु राम ने शपथ लिए की काशी नरेश  को उनकी दुष्टता का दण्ड देंगे ।अब अपने प्राण बचाकर राजा ययाति यहाँ वहाँ भागे अंततः उन्होंनेे छल से अंजना के घर आश्रय लिया जो हनुमान की माता थी। और शरणागति की रक्षा का वचन लेकर माता को प्रतिबद्ध कर दिया। प्रभु राम ने भी हनुमान को माँ के पास भेज दिया कि पहले माँ पुकार रही हैं तुम मेरी सेवा छोड़ो और माँ की आज्ञा मानो!  यहाँ हर तरफ से हनुमान पर ही। तलवार लटक रही थी । जब हनुमान कुटिया में गए तो ययाति को देखकर प्रभु राम को सौंपने की बात कही तो  माता ने शरणागति की रक्षा के वचन में बांधकर हनुमान को विवश कर दिया। अब गुप्तचरों से ज्ञात हुआ कि हनुमान ने विद्रोह कर दिया है । और राम की सेना हनुमान की ओर बढ़ने लगी। हनुमान ने सैकड़ों सेना को मार गिराया । और राजा ययाति हनुमान की प्रसंशा करने लगे तब हनुमान को क्रोध आया और राजा को बोला अपनी चिंता करो ना कि मेरा गुणगान करो । ऐसे में राजन ने पूछा कि ......

सीता का पत्नीधर्म और राम का राजधर्म (एक मूल्यांकन)

  राम और सीता धर्म की मूर्ति थे यह तो पूरी अयोध्या और रघुकुल में विख्यात था। । प्रश्न यह है कि रामराज्य जैसी सुंदर अयोध्या नगरी में  मंगल ही मंगल होगा तो फिर मानव लीला का  मायने क्या रह जायेगा ? कुछ तो अमंगल भी हो ! सुख है तो दुःख भी हो! यदि '  नर लीला है प्रभु का,  तो अज्ञानियों के लिए प्रभु की लीला जिज्ञासा का विषय भी तो बने । तभी तो ब्रम्हा की रचना सार्थक होगी!  इसलिए कहा गया है मानव तन कर्म करने के लिए है। और  सूक्ष्म शरीर मे आप क्या कर्म करेंगे सोचिये?  उस शरीर मे तो कोई पाप पुण्य बनता नहीं है केवल भोग भोगने की सामर्थ्य होगी इससे ज्यादा कुछ नहीं! भोग कर्मों का ही तो होगा अब आपके कर्म अच्छे हैं या बुरे आपका मन ही दर्पण है "! कोई और तो नहीं जान सकता।  तो प्रभु की लीला में एक और कड़ी आती है । सीता पर लांछन क्यों लगा ? जब अयोध्या में दीपावली मनाई गई तो नगरवासी आनन्द विभोर हुए , समय अच्छा व्यतीत हो रहा होता है।   राम ने 5 साल के लिए प्रजा से लगान वसूलने पर रोक लगा दी और जनता में सोने की मुद्राएँ  बांटने का आदेश दिया।  कुछ स...

परामनोविज्ञान की समझ को मनोविज्ञान अवैज्ञानिक क्यों करार देता है।

  इस विषय पर कोई भी विचार रखने से पहले मैं यह स्पष्ट करूँगी कि  परामनोविज्ञान / parapsychology  यह psychology  से match नहीं करता और कोई relevent भी नहीं  है क्योंकि.... psychology, scientific research पर based है तो दूसरी तरफ parapsychology इस material world से अलग एक दूसरी दुनिया का subject है  जैसे भूत-प्रेत , आत्मा की दुनिया , किसी घटना के घटित होने का पूर्वाभास होना इत्यादि ! यही वजह है कि कानूनी तौर पर यह विषय एक debate है  मान्यता नहीं है , अंधविश्वास से ज्यादा तवज्जो नही है और  पैरानॉर्मल एक्सपर्ट्स को  गुमराह करने और गुमराह रहने वाले व्यक्ति के तौर पर भी देखा जाता है । क्योंकि विज्ञान के पास कोई  प्रमाण नहीं है अलौकिक दुनिया का प्रैक्टिकल विज्ञान के उपकरण  नही कर सकते !  उदाहरण के लिए मैं कहूँ कि बाबा  वेंगा जिसने कई सारी prediction की थी उन भविष्यवाणी में कितनी तो सत्य सिद्ध हुई थी। मीडिया ने यह न्यूज़  कवर भी किया  । तो  हम कैसे झुठला सकते हैं इन्ही संकेतों को परामनोविज्ञान स्पष्ट करता है। इस उदाहर...

मुक्तक

 नियति से हार मत मानो ! प्रयासों के गढ़े पत्थर हमे मोती बनाते है  प्रगाढ़ इच्छा के बल बूते जहाँ मे जीत पाते हैं  नहीं क्षमता यदि तुममें  लेख नियति बदलने की बदलकर कर्म को अपने लेख टाले विधाता का   परमारथ के पथ पर इच्छाएं पूर्ण होती है प्रबल तब भाग्य होता है  करो शुकराना मालिक का ,वो नेमत बख्श देता है  बहुत अवसर मिले होंगे ,खुशी में लीन होने को  बढ़ो परमार्थ सेवा में तो , जीवन तर ही जाता है ।।  सुखः का सवेरा !  सज़ा जीवन है ये अपना जो सेवा धर्म वंचित हो प्रयासों की विफलताएं अगर   रोडे  लगाती हों नहीं रुकना नहीं थमना मनोबल दृढ़ बनाने तक चलोगे चीरकर दुःख तो सवेरा सुख का आएगा।। खुशियाँ स्थायी नहीं ! क्षणिक सुखों में हम अक्सर उलझे उलझे से रहते हैं  माया के लोलुपताओं में जीवह्वा स्वाद पर मरते हैं गति हमारी अंत काल यम पाश में जकड़े  जाना है   माया ममता लोभ ना छोड़े लिपटे लिपटे रहते हैं।। दुश्मन का सत्कार   घर पर आए दुश्मन को भी अतिथि ईश्वर रूप कहें  कैसे उचित हो इज्जत देना गर दीमक से लग जाये  ...

मनुष्य की कुदृष्टि का सत्य

  एक बार माता सीता अपने कक्ष में  आइने के समक्ष बैठकर  एकटक  अपना प्रतिरूप निहार रहीं थी । उसी क्षण प्रभु राम कक्ष में पधारते हैं तो क्या देखते हैं कि सीता आइने के सामने बैठी कुछ सोच रही हैं  । प्रभु ने प्रश्न किआ कि सीता " तुम इस तरह क्या सोच रही हो !  सीता जी ने उत्तर  दिया कि "प्रभु   मैं कुछ सोच नही रही थी मैं तो अपने भाग्य की सराहना कर रही थी कि मुझे अपजैसा पति मिला । जो धर्म का प्रतिरूप है और मुझे सम्मान देने वाले रघुवीर को मैं हर जन्म में  पति के रूप में चाहूंगी ।  तब राम ने उत्तर दिया कि सीता सम्मान तो उसी को  मिलता है जो सम्मान देता है और तुम तो मेरी प्रतिरूप हो हम दोनों एक दूसरे के बिना अपूर्ण है । माता को बराबरी का  यह सम्मान उनके मन में भय उत्पन्न कर दिया । उन्होंने अनहोनी की चिंता जाहिर  की कि  कल को किसी की बुरी नजर लग गई तो हमारे रिश्ते में कोई दरार ना आ जाये ।  प्रभु ने  बहुत सुंदर जवाब दिया  । उन्होंने कहा " सीता किसी भी मनुष्य की दृष्टि कुदृष्टि नहीं होती । जो कुछ होता है वह नियति...

हनुमान की प्रेम भक्ति

  रामायण में प्रसंग आता है कि एक बार माता सीता  सुहाग की निशानी सिंदूर लगते हुए नजर आईं । जैसे ही हनुमान ने यह दृश्य देखा तो मन मे एक अबोध बालक की तरह जिज्ञासा हुई कि  पता लगाया जाए कि  माता सिंदूर क्यो लगाती हैं ? अब उत्सुकतावश हनुमान ने प्रश्न किआ कि मां "आप हर रोज अपनी मांग में सिंदूर क्यों लगाती हैं .."! हनुमान के इस प्रश्न से माता को हंसी आई और वो मुस्कुराते हुए बोलीं कि " पुत्र मैं सिंदूर इसलिए लगाती हूँ क्योंकि इससे प्रभु श्री राम प्रसन्न होते हैं और उनकी लम्बी उम्र बढ़ती है ।  ज्यों ही हनुमान ने यह जाना कि प्रभु प्रसन्न होते हैं तुरन्त उन्होंने कहा कि अगर मैं पूरे शरीर मे सिंदूर लगा लूं तो क्या प्रभु मुझसे भी प्रसन्न होंगे माता "!  हनुमान को माता ने तुरंत जवाब दिया क्यों नहीं पुत्र ...." लेकिन तुम सिंदूर लगाओगे  ?? तो हनुमान ने कहा कि माता मैं अपने प्रभु को प्रसन्न करने के लिए सिंदूर जरूर लगाऊंगा।  अगले दिन सभा पुनः आयोजित होती है ।  सीता - राम की जोड़ी पहले  राजसभा में हजारों कामदेवों को लजा देने वाली  भव्य और मनमोहक लग रही थ...

हनुमान का अहंकार भंग

रामायण में एक प्रसंग आता है कि जब प्रभु श्री राम 14 वर्ष की तपस्या पूरी करके वापस अयोध्या प्रस्थान को थे तो  अयोध्या वापसी के दो दिन पहले  उन्होंने रावण वध को  लेकर चिंता ब्यक्त की । वह ब्रम्हहत्या के पाप से निष्पाप  होना चाहते थे इसी कड़ी में शिवलिंग स्थापित करना अनिवार्य था। जब हनुमान जी को कैलाश से शिवलिंग लाने का सौभाग्य मिला तो उन्होंने अपनी विद्वता का बखान करना शुरू कर दिया । हनुमान ने बड़े सारे तर्क रखे कि रावण की लंका  में मैंने अपने बल से घुसपैठ किया। राक्षसों के बीच माता सीता से भेंट की , कितने वीर राक्षसों का वध किया और लंका को अग्नि के भेंट चढ़ाया । और प्रभु का आदेश होता तो मैं सीता माता को भी साथ ले आता । यह सब सुनकर प्रभु राम को हनुमान के  अहंकार का आभास हुआ। वहीं माता सीता मन ही मन मुस्कुरा रही थीं। अब रावण वध के बाद प्रभु राम पर एक ब्राम्हण के हत्या का दोष न लगे  इसके लिए शिवलिंग की स्थापना करना अनिवार्य था । हालांकि रावण एक राक्षस के कर्म से पतित हो चुका था जिसका वध करने पर राम को ब्रम्ह हत्या का दोष तो बिल्कुल नहीं लगा । किन्तु उनके मन क...