रामायण में एक प्रसंग आता है कि जब प्रभु श्री राम 14 वर्ष की तपस्या पूरी करके वापस अयोध्या प्रस्थान को थे तो
अयोध्या वापसी के दो दिन पहले उन्होंने रावण वध को लेकर चिंता ब्यक्त की । वह ब्रम्हहत्या के पाप से निष्पाप होना चाहते थे इसी कड़ी में शिवलिंग स्थापित करना अनिवार्य था।
जब हनुमान जी को कैलाश से शिवलिंग लाने का सौभाग्य मिला तो उन्होंने अपनी विद्वता का बखान करना शुरू कर दिया । हनुमान ने बड़े सारे तर्क रखे कि रावण की लंका में मैंने अपने बल से घुसपैठ किया। राक्षसों के बीच माता सीता से भेंट की , कितने वीर राक्षसों का वध किया और लंका को अग्नि के भेंट चढ़ाया । और प्रभु का आदेश होता तो मैं सीता माता को भी साथ ले आता ।
यह सब सुनकर प्रभु राम को हनुमान के अहंकार का आभास हुआ।
वहीं माता सीता मन ही मन मुस्कुरा रही थीं।
अब रावण वध के बाद प्रभु राम पर एक ब्राम्हण के हत्या का दोष न लगे इसके लिए शिवलिंग की स्थापना करना अनिवार्य था । हालांकि रावण एक राक्षस के कर्म से पतित हो चुका था जिसका वध करने पर राम को ब्रम्ह हत्या का दोष तो बिल्कुल नहीं लगा । किन्तु उनके मन की शांति के लिए यह भी किया गया।
हनुमान शिव जी से शिवलिंग लेकर आये । रास्ते मे उन्हें एक रेत का शिवलिंग दिखा जो राम सीता ने निर्माण करके स्थापना की।
अब हनुमान के हाथ मे शिवलिंग था वे निराश होकर समुद्र में विसर्जन करने के लिए पीछे मुडे।
तभी माता सीता ने उन्हें रोका ।
लक्ष्मण को भी उनकी व्यथा देखी नहीं गई।
राम ने शुभ मुहूर्त के टलने के भय से यह तर्क दिया कि तुम्हे देर हो सकती थी। पर कोई बात नहीं अब तुम रेत का शिवलिंग उखाड़कर विसर्जन कर दो और शिव जी द्वारा दिए गए शिवलिंग को स्थापित कर दो।
तब हनुमान खुश हुए अपने बल और शौर्य पर अभिमान जो था।
अब वह शिवलिंग तो नहीं उखाड़ पाए
तब हनुमान का अहंकार भंग हुआ और प्रभु के लीला को देख भावविभोर हो उठे।
राम ने अपने भक्त हनुमान के अहंकार को भंग करने के लिए ही बालू के शिवलिंग के निर्माण की लीला रची थी ।

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