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अप्रैल, 2023 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मुक्तक काव्य श्रृंखला 6

* बीज धरती पर गिरे ढक जाए  बाह्य  जो आवरण एक नियत अवधि में उठे जागृत  हुआ वह अनावरण इंसान बाधाओं में भी हंसकर बढ़े  नित सुगमतम मिल जाएगा एक दिन मुकाम धीरे  सही पर सहजतम *तूफानों की कश्ती बड़ी भारी विपत्ति पास हो आंखों के आगे विवशता के पर खुले अंदाज हों उड़ने दो उन परों को जो  बाधाओं ने फैलाये हैं प्रबल इच्छा से क्षितिज को  तुम नया आयाम दो ।। * अयोध्या राम जी का गढ़ , हिंदुत्व की यह निशानी है जो हिस्से में मिला हमको बहुत उपकार भारी है विवादों में था सालों से घिरा निर्णय अधूरा  जो बनेगा राम मंदिर अब , हुई पूरी तैयारी है ।। *बनारस का छटा अनुपम, सीप सा चमकता पानी योग के तेज से ओजस , समन्वय सांस्कृति अपनी सैलानी जब यहां आते करें अर्चन विनय कर जोड़ कि भारत की अनूठी शान दुनिया ने स्वीकारा है ।। * प्रेम दिल में रखो हर पल, नहीं उपजे बैर का शूल मर्यादा सभ्यता संस्कृति का हो सदा  सम्मान इंसानियत नहीं है नफरतों के आग में जलकर कि ढह जाएंगे  सब बैरी  टीले सद्भावना भर कर ।। * भक्ति करो तो शबरी जैसी  हठ करना  ध्रुव तारा ...

दोहा छंद (गुरु की तलाश)

कौन से पाप प्रहार किए हैं  कि कौन से पग उद्धार करेंगे  कौन से संत सहज होंगे ज्ञानी कौन सुमति का ज्ञान कराए पंथ हुए चहुं ओर ना सूझे कि कौन से गुरु  सत्संग में जाएं  मति रचो  हरि लीला अनोखी कि प्राणी नरक  से पार ना पाए  धर्म विशुद्ध था होगा विशुद्ध  नहीं  पाप  उसका मान घटाए दंगे फसादों में और अपराधों में आतंक  दुष्ट दुराचारी जो छाए धर्म ध्वजा धरती पर सुहाए  नहीं नर नारी में भेद कराए  मानव धर्म का ज्ञान कराए कोई संत सन्यासी संसर्ग पाएं।।

ठोकरों से चलना है (मुक्तक काव्य )

मेरी राहें कठिन हों तो उन्हें आसान मत करना फिरूं अभिमान में मगरूर मेरी संभाल मत करना मुझे ठोकर से चलना है ना फूलों सा हो जीवन ये सदा सन्मार्ग दिखलाकर मेरी भक्ति प्रबल करना।। मुझे कुछ सीख लेना है जिज्ञासु बन के रहना है  ना हो अभिमान जीवन में मुझे अज्ञात रहना है मेरे कर्मों के पतरे में नियति का लेख क्या जानूं मैं जानूं एक ईश्वर को मुझे खुद से ही मिलना है खिले मुस्कान अधरों पर दुखों का पात गिर जाए मेरे हिस्से में हो पतझड़ या जीवन में वसंत आए घिरे बदरी घनी काली घिरे तूफान जीवन में फिरूं बेफिक्र मलंग होकर उमंग ए बहार आ जाए।। अगर दुख की बयारें हों तो पुरवाई सुखों की हो मिलेगा जन्म दोबारा ना रुसवाई जहां में हो ये जीवन है तो पतझड़ भी खिलेंगे पुष्प दोबारा  हमें हर हाल में जीना सुखद अंतिम विदाई हो।। -गायत्री शर्मा गुँजन

मां के लाड़ले

बेटियाँ पापा की परी होंगी बेशक मां के लाडले भी कमतर नहीं हैं बेटियां पराई होती हैं तो कोई गम ना करे बेटे भी घर रहने को वरदान ना पाते हैं जरूरतें ,जिम्मेदारियां इस कदर हावी हैं उन पर  नई गर्लफ्रेंड बनाने को टाइम नहीं है  वालिदैन की दवाई बच्चो की जरूरत  बीवी की जिम्मेदारी काम बहुत है खुद के लिए फुरसत ही नहीं किंतु कोल्हू के बैल से वे खटते बहुत हैं  फिर भी कहते हैं लोग निकम्मे निठल्ले और आवारा होते हैं लड़के मगर  अपने दुख में रोना उन्हे आता नहीं है ©®

रावण प्रवृति के मानुष (मुक्तक काव्य)

पद और धन के लोभ में मद में चूर चूर वे रहते हैं  नारी को नारी ना समझे क्रूर क्रूर बन छलते हैं  धर्म की आड़ में नीच अधम निर्णायक पुरुष हो जाएं तो नारी के अपमान अग्नि में खाक खाक हो जाते हैं । धर्म कर्म परिवार सामाजिक रीति रिवाजें हमसे हैं  लंबी उम्र को करवा , वट पत्नी से कराते पूजन हैं  पत्नी पीड़ित पुरुष कुछेक भरी सभा में वक्ता बन खिल्ली का खुद पात्र बने तो हमे गंवारन कहते हैं। दुशासन की दुष्ट प्रवृति रावण का अभिमान घटा  मर्यादा के प्रवर्तक श्री राम का जग में मान बढ़ा कंस बहन को बहन ना समझा लाचारी पर घात किए  पलट के देखो साक्ष्य पुराने दुष्टों का क्या हाल हुआ। ©®