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मुक्तक काव्य श्रृंखला 6


*बीज धरती पर गिरे ढक जाए  बाह्य  जो आवरण
एक नियत अवधि में उठे जागृत  हुआ वह अनावरण
इंसान बाधाओं में भी हंसकर बढ़े  नित सुगमतम
मिल जाएगा एक दिन मुकाम धीरे  सही पर सहजतम

*तूफानों की कश्ती बड़ी भारी विपत्ति पास हो
आंखों के आगे विवशता के पर खुले अंदाज हों
उड़ने दो उन परों को जो  बाधाओं ने फैलाये हैं
प्रबल इच्छा से क्षितिज को  तुम नया आयाम दो ।।

*अयोध्या राम जी का गढ़ , हिंदुत्व की यह निशानी है
जो हिस्से में मिला हमको बहुत उपकार भारी है
विवादों में था सालों से घिरा निर्णय अधूरा  जो
बनेगा राम मंदिर अब , हुई पूरी तैयारी है ।।

*बनारस का छटा अनुपम, सीप सा चमकता पानी
योग के तेज से ओजस , समन्वय सांस्कृति अपनी
सैलानी जब यहां आते करें अर्चन विनय कर जोड़
कि भारत की अनूठी शान दुनिया ने स्वीकारा है ।।

*प्रेम दिल में रखो हर पल, नहीं उपजे बैर का शूल
मर्यादा सभ्यता संस्कृति का हो सदा  सम्मान
इंसानियत नहीं है नफरतों के आग में जलकर
कि ढह जाएंगे  सब बैरी  टीले सद्भावना भर कर ।।

*भक्ति करो तो शबरी जैसी  हठ करना  ध्रुव तारा सा
क्रोध करो दुर्वासा जैसा विनय करो तो सुदामा सा
जायज है  जाहिर करना हर  भाव  हृदय में ज्यों उपजा
हिरण्यकश्यप ,महिषासुर  सा अक्श धूमिल कभी मत करना।।

*कि रिश्तों का समुंदर है बहुत खारा उफ़ानों सा
कभी नदिया कभी चट्टान सा भारी  हृदय कुचाल
बरसते है जो अहमों के गरजते से कभी बादल
कभी शीतल कभी उफ़ान से रिश्तों के बंधन हैं।।

*जो तुमको दिल से चाहे तो ,उसे दिल से लगा लेना
ये रिश्ते कांच के जैसे , खनक लगने नहीं देना
झुका लो खुद को थोड़ा तुम ,अगर जो बात बन जाये
गलतफहमी में सच्चे दिल के रिश्ते , तोड़ ना देना।।
.
*ख्वाहिशें लाख हैं दिल में , जिंदगी है बहुत छोटी
हसरतें दिल जो पाले हैं , नहीं उनका ठिकाना है
यूं घुट घुट कर भी जीना क्या , गमों से राब्ता ना हो
कि खुलकर आज को जी लो, नहीं कल का ठिकाना है ।।

*दुआओं में जो तुम मांगों, हसरतें लाख दिल में हो
आरजू सिर्फ पाने की , यह मुमकिन भी नहीं तो है
किसी की जिंदगी पर हक नहीं , बस सिर्फ अपना है
कई बंधन के पाटों में , उलझते  दिल के रिश्ते हैं ।।

*प्रकृति है मनोहारी ,छटा इसकी बड़ी न्यारी
बिना विभेद कर  तृप्ति  हमें भरपूर देती है
जो कुदरत ने नहीं रखा भेदभावो की सीमाएं
तो क्यों करते हो मज़हब से अलग इंसान इंसा को ।।

*बाधाएं लाख  जीवन मे , जो आये तो उसे सहना
किसी महफ़िल में दर्दे गम , नुमाइश तुम नहीं करना
मुकद्दर में मिला जो गम , उसे हंसकर के सह लेना
ये दुनिया पीर का दरिया है , इसमें बह नहीं जाना।।

*राजनीति , अध्यात्म का यदि समन्वय होय
कर्म , प्रार्थना शक्ति में विज्ञान समन्वित होय
गूढ़ ज्ञान ,उर तेज से नीतियाँ सफल हो जाये
भ्रष्ट आचरण  खाक हो यह देश समृद्धि पाये ।।

*मन से हारो नहीं, मन से जीतो सदा
धीरे धीरे  सही ,बढ़ते जाओ सदा
थाम लो तुम अगर , सहसों का शिखर
ध्वस्त हो  जाए राहों का, हर एक गम।।

वंशवाद का रोग मिटाकर, मानव आपस ना द्वन्दी हो
सत्ता ,पावर, कूटचालों से , कोई प्राणी ना आहत हो
संकल्पित आदर्श देश में ,प्रेरित कार्य सहज निश्छल हो
राष्ट्र प्रेम अन्तस में भरकर  परहितार्थ में कार्य उचित हो।।

*शौर्य गूंजेगा अम्बर तक , तिरंगा मुस्कुरायेगा
सैन्य क्षमता,अदम्यता देख , आतंकी चकराएँगे
कि जल,थल,नभ में व्यापे है ,किस्से हिन्द वीरों के
चौकसी देख  भारत की , दुश्मन थरथरायेगा ।।

प्रेम में फासले की अहमियत वो शख्स क्या जाने
जो खुद के ही लिए जीने की कसमें वादे हैं करते
प्रेम की अमर गाथा सुन लो तुम एक बार वीरों से
जो अपने प्रेम और घर बार छोड़े देश रक्षा में ।।

●लोकतंत्र की हत्या करके ,कितना खैर मना लोगे
संविधान को  तार तार कर , जन विद्रोह दबा दोगे
अगर समझते हो पावर ,सत्ता में तुम बलशाली हो
निकलो जल्द भरम से अपने , शेर नहीं तुम गीदड़ हो ।।

*जज्बा दिल मे जो रखते हैं वतन पर जान देने की
शून्य डिग्री ताप हिम पर  अटल विश्वास भरकर के
हिन्द की शान जिनसे है अर्थ जिनसे है हम सबका
हिफाजत लोकतंत्र की करने वाले वीर रक्षित हों ।।

*ग़ैरतें मर गई उनकी शर्म जो बेच खाते हैं
हत्या ,दुष्कर्म से प्रेरित लोग हैवान होते हैं
गुनाहों के राह चलकर घृणित कृत्यों को करते जो
करो परित्याग हैवानों को जो अपराध करते हैं।

*जो रखते हैं कदम अपराधों के ज़ालिम डगर पर वे
छणिक लालच, लोभ, मद में कुकृत्यों को बढ़ाकर के
ताक पर रख के मर्यादाएं जघन्य अपराध करते जो
नहीं हक जीने का उनको शर्म से क्यों न मरते हैं।।

*धुन्ध कुछ दूर से देखो सभी अस्पष्ट दिखता है
पास  जितना पहुंच जाओ नजारा स्पष्ट दिखता है
ये जीवन है घने कोहरे सा धीरज ,धैर्य रखते जो
वही अक्सर किनारा मुश्किलों से पार करते हैं ।।

*जिंदगी ज्यों रुलाती है वही एक पल हंसाती है
धूप और छांव सा सुख:दुख हमें अक्सर दिखाती है
यूँ घूंट घूंट कर भी जीना क्या गमों से राबता ना हो
कि खुलकर आज को जी लो नहीं कल का ठिकाना है।।


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