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नवंबर, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अध्यात्म एक रहस्य

  अध्यात्म एक रहस्य अध्यात्म रहस्य अति गूढ़ है,अपनी मति से जान जितनी आंतरिक यात्रा, उतनी ही पहचान अध्यात्म अलौकिक ज्ञान है ,विज्ञान फेल हो जाय स्वांसों की  इस डोर को , पकड़ सके ना कोय साधना के आकाश में प्राण-अपान के बीच योगी साधक ,साधिका ,साधे प्राण की डोर स्वेच्छा मृत्यु सहज योग, काल खड़ा जब पास काल के धावा बोलते , योगी हो लवलीन जल समाधि राम लें लक्ष्मण सरयू आये वाणशैया पर लेटे ही भीष्मपितामह जाये विवेकानंद समाधि में प्राण साध जग छोड़े गुरु मिले सम परमहँस , सहज योग तब होय अध्यात्म सहज क्रिया-कर्म, तंत्र-मंत्र ना जान भूत-प्रेत ,सब देवता , मोक्ष तत्व से दूर मानव का तन दुर्लभ है , मिले ना बारम्बार टूटा हुआ पत्ता नहीं , कभी शाख पर आये लाख़ 84 जन्म  है ,  जीव काल  का  ग्रास आत्मज्ञान जब तक नहीं, नर ना तरे भव पार।।

मानवता के राह पर

  मानवता के राह पर , अड़चन लाख हज़ार सच्चाई के पथ को बाधित, करता है अज्ञान अज्ञानता की उपज है , स्वार्थ खरपतवार कुसंस्कारों के बीज का , नहीं समूल विनाश सत्संगति के राह पर , चलने को अभिलाषी मार्ग दिखाने वाला हो , विश्व शांति का घोतक धर्म अधर्म के पाट में, पीसता है संसार नफरत,ईष्र्या से करे , स्वार्थ करे प्रगाढ़ सदाचार जिसमे नहीं , मानव दैत्य समान ऋषियों की संतान कहें , और लोक लाज नसाय कर भलाई हो भला,  सेवा , सद्कर्म महान मिटटी का तन धूर है, अंत काल ले जाये ।।

संवाद

  माता-पुत्री के बीच सुंदर संवाद ,"परमार्थ के पथ पर" माता प्रसन्न मुद्रा में ............. माता पुत्री संग में , कर रहीं वार्तालाप आज मातु अति प्रसन्न हैं कहे पुत्री सुन बात नैनों में भर नीर माता कहे , रिश्ता मिला है खास सोच रही हूँ ब्याह रचा दूँ , बसे तेरा घर बार मैं भी चैन से मर पाऊँगी, जब हो तेरा ब्याह दिवस रात्रि हर प्रहर में , मन होता है उदास पुत्री बोली.......... पुत्री कहे ओ प्यारी माता , सोच सोच मत हों परेशान नहीं करूँगी ब्याह मैं अपना, कर ले जितना प्रयास भावनाओं में बांध के  मुझको , मत ले शपथ सगाई का छोड़ चली जाउंगी कहीं , गर  नहीं सुनेगी मेरी बात माता मोहपाश में जकड़ी हुई ........ मातु मोहवश हुई बावली , कैसा पाठ पढ़ा है बेटी तू क्यों इतनी निर्मोही सी, बोल बोलकर मुझे सताये भगवा वस्त्र ना धरने दूंगी, हठ कर ले  तू चाहे जितना मेरी ख्वाहिश घर है बसाना, दुनिया से मुझको क्या लेना पुत्री माँ को मनाती हुई......... रीत नहीं यह भाती मुझको , मन मेरा सन्यासिन है वक्त आज जिस मोड़ ले आया, कहती हूँ मैं मन की बात ना शादी ना दुल्हन जोड़ा , सखियों सा कुछ मुझे ...

मौन प्रार्थनाएँ

 प्रार्थना मौन होती है दिल मे हलचल सी होती है हर एक शब्दों  से मालिक को नमन अरदास होती है  रहमतें लाख है  उसकी जरा दिल हुजरे को खोलो वो दृष्टिगोचर नहीं होता  वही एकांत मिलता है सुखद आगोश में खोए , बिताते दिन जो मौजो में जिसे तुम भूल जाते हो वही  महसूस  होता है बादलों का जो आना हो , जिंदगी दुख थपेडों से  पलक आंसू बहाते हो उसे वो कुबूल करता है  चढ़ावा आंसुओं का भी सुदामा, शबरी सा जो हो दुर्योधन के मेवे छोड़ , विदुर घर साग खाते हैं  पुरातन और पौराणिक कथाओं में जिसे सुनते तुम्हारे सामने तो नहीं मगर वह साथ रहता है  कोई नेकी करे तुमसे , समझ जाना प्रभु रहमत  पुकारोगे अगर प्रभु को , वो दौड़े आ ही जाते हैं प्रत्यक्षम किम प्रमाणम है , ये कहना भी फिजुली है कि ईश्वर अंश हैं हम सब , उसी का नूर फैला है ।।