मानवता के राह पर , अड़चन लाख हज़ार
सच्चाई के पथ को बाधित, करता है अज्ञान
अज्ञानता की उपज है , स्वार्थ खरपतवार
कुसंस्कारों के बीज का , नहीं समूल विनाश
सत्संगति के राह पर , चलने को अभिलाषी
मार्ग दिखाने वाला हो , विश्व शांति का घोतक
धर्म अधर्म के पाट में, पीसता है संसार
नफरत,ईष्र्या से करे , स्वार्थ करे प्रगाढ़
सदाचार जिसमे नहीं , मानव दैत्य समान
ऋषियों की संतान कहें , और लोक लाज नसाय
कर भलाई हो भला, सेवा , सद्कर्म महान
मिटटी का तन धूर है, अंत काल ले जाये ।।
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