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मौत का मंजर

आंखों में ख्वाब थे जिंदगी जीने के लिए  कोई गम ना था दुश्वारियाँ झेलने के लिए  सोचा न था जिंदगी ये दिन भी  दिखाएगी हम अपनो की लाश को तड़पते रह जाएंगे  जीते जी मुर्दों के साथ रहकर इंसानियत रोयेगी सिलसिला यूं मौतों का कुछ और नहीं है  दफन है जिंदगी अमानवीय क्रूरता तले  इंसान भगवान नहीं जो खुद को तार ले चीखें गूंजती है विभत्सना देख मानव का  दुनिया में महामारी का ग्राफ बहुत है  मोक्ष की कामना फिजूल है करना  मौत के बाद लाशों का गार्जियन कौन है  शमशान में लाशों का ढेर है बहुत  लाइनें वहां भी लंबी है अंतिम सफर में कितना डरावना है हकीकत -ए,-मंजर जीते जी इंसान का ठिकाना कहाँ है।।

युद्ध का परिणाम

युद्ध एकल नहीं हर ओर गूंजे स्वर विभत्सनाएँ  सैनिकों के गाँव परिवार तक आती हैं सूचनाएँ किसी के आँख का तारा किसी का सुहाग है प्यारा न जाने कब कहाँ किस ओर से खबरें डराती हैं  युद्ध केवल दे जाता है ना मिटने की पीर  भारी  देह से रूह तक कंपन करे कैसी प्रलय आयी कहीं चूल्हे बूझे तो किसी बहन का सुहाग उजडे है किसी के बुढ़ापे की लाठी किसी के आंख का तारा कफ़न बांधे निकलकर के तिरंगा लिपटा आता है युद्ध हरगिज ना होने पाए बेशक पक्ष अपना दो उदारवादी सिद्धान्तों से ही बेशक युद्ध टालना है ।।

कोरोनकाल की त्रासदी का राजनीतिकरण

कलिकाल का अंत है , घोर विपत्ति छाई है  त्राहिमाम चहुँ ओर है , देश-विदेश बेहाल है भारत -पाक के बीच तनाव, गोलीबारी थमती नहीं  अमेरिका और चीन में शीतयुद्ध सा मंजर है  सैनिक कैसे सुरक्षित हों , कोरोना के दंश से  देश की सैन्य सुरक्षा नहीं तो क्या होगा इस देश का  धमकी जिहाद,कोरोना  जिहाद , धर्म जिहाद विस्तार है भारत के लोकतंत्र पर खतरा ,पाकिस्तानी चाल है साम्यवादी चीन व्यवस्था में ,शासन के विरुद्ध आवाज उठा हर एक देश में साजिशों का जाल भयंकर  व्याप्त है  आतंकवाद का रूप कोरोना , दोनों ने मिलकर खेल किया मौके तलाश रहे आतंकी , ख़ुफ़िया सूत्र हवाले से  रक्षा नीतियां कूट चाल से कब तक इनसे लड़ते रहेंगे आर्थिक विपदा में राहत या आतंक विरुद्ध हथियार चुनें 

भक्त के वश में है भगवान

भक्त के वश में हैं भगवान *************** माता शबरी के अटूट प्रेम और निश्छल भक्ति की अनूठी मिसाल ! एक छोटा सा प्रयास किया है इस काव्य के माध्यम से यह बताने का कि भक्ति गर्व और उत्कृष्टता नही प्रेम और झुकाव का रास्ता है जिसमे तनिक भी संशय हो तो प्राणी भवसागर से छूट नहीं पाता । *भक्त के वश में हैं भगवान* ★★★★★★★★★★ भक्ति का रूप ले अनुपम धरा पर आज है उतरी, मतंग आश्रम में आश्रय ले रही है मात वह शबरी। थी वह इस बात से अज्ञात एक दिन राम आयेंगे, है खोला भेद मुनिवर ने तुझे दर्शन दिखाएंँगे। बिछाना दिन प्रतिदिन पुष्प प्रतीक्षा राम की करना, जलाकर आस का दीपक नयन पथ पर सदा रखना। चले सुरलोक को गुरुवर बताकर भेद ये मुनिवर, देह को त्याग कर निकले परम गोलोक को मुनिवर। किया है दृढ़ भक्ति का प्रतीक्षा दीर्घकालिक की, उम्र के अंत तक तकती रही वह राह मालिक की। जब आयेंगे श्री रघुवर यह जीवन धन्य जानूँगी, चली जाऊंँगी इस दुनिया से नवधा भक्ति मानूँगी। वो शबरी आंँख पथराई आस का पुष्प मुस्काया, मतंग आश्रम के चारों ओर उजियारा ही है छाया। योग के बल से बलवति था विहंगम दृश्य कुटिया का, योग के तेज से...

चिंतन का रुख (स्वप्नावस्था)

एकाएक चिंतन का रूख तुम्हारी ओर मुङा आँखों में नींद भरी जहन में कुछ बातें सिमटी हुई सी स्वप्नलोक का विचरण करती हुई सी हमेशा तुम्हारे साथ की चाह लिए मन में वो घङी नजदीक था मैं मग्न रही संगीतमय ध्वनियों के बीच तुम्हे याद करके जो नजारा दूर से देखा करती थी वह मैने बहुत करीब से देखा तुम्हारी एक आवाज ने जैसे मुझे मेरे काम में निपुणता प्रदान किया हो जो मेरे निश्छल स्वार्थरहित कर्म की ओर झुकाव था कि आज तुमसे फुर्सत में गुफ्तगू हुई सभी की नजरें मेरी तरफ थी परंतु मेरी नजर सिर्फ तुम्हे निहारती रही कि ये पल बीत ना जाए और तुम मेरी आंखो से ओझल ना हो जाओ एक आत्मिय चुंबकीय संचार रग रग में समाहित हुआ ऐसा आभास जैसे कि चातक को स्वाति नक्षत्र का जल बिंदु मिल गया हो और उसे पीकर अपना जीवन प्राण बचा लेता है एक सलोना स्वप्न जो हमेशा की तरह नवीन अनुभवों को जहन में समेटता हुआ सा प्रतीत हुआ हर बार की तरह एक बार फिर यह पल जिसमें तुम मेरे साथ नजर आए मैं स्वप्नों की दिग्दर्शिका तक ही सीमित कैसे रह सकती थी यह जो अपार आत्मिक साम्राज्य मेरे पास है इसके आगे सभी स्थान ,पदार्थ ये जहान शायद कुछ भी नहीं है

नजरों से नजारों तक (स्वप्नावस्था)

दर्शन की लंबी कतारें लगी हुई थी महक भी जाकर शामिल हो गई ,इतने श्रद्धालु थे की बस नजारा  देखते ही बनता था  लड़ियों से सजा माँ का दरबार और चहल पहल एक अलौकिक समां नजर आ रहा था। आश्चर्य कितनी प्यारी मूरत है तपाक से बोल पड़ी!  कोई देखकर नजरें हटाए कैसे ? माँ की सूरत में पूरे ब्रम्हांड की खूबसूरती जो समाया है । श्रद्धालु आते रहे  सजावट का सारा सामान उपलब्ध था एक जूड़ा रह गया था जिसको संभाल कर रखा गया था  सुंदर मोती जडा हुआ, लंबे आर्टिफीसियल घने बालों से बना हुआ, किसी कलाकारी के हाथों का कमाल होगा । अब तो सब ब्यवस्थित हो गया सिवाय जूड़ा के ,उसे लेकर कहाँ घूमती अचानक सजावट में उसकी जरूरत पड जाती तो क्या होता महक ने चौकी के पीछे दीवार में लगी कील पर लटका दिया । दर्शन खत्म हो चुके थे चौकी ख़ाली थी श्रद्धालु जा चुके थे कुछ लोग जो वहाँ रुके थे वे भी अपने काम में लग गए, कुछ देर महक ने माँ की ओर देखा तो मंत्रमुग्ध हो गई वह  इच्छाएं जो जाहिर करना चाहती थी मन में ही रह गई और ऐसा लगा वो दिव्य मूरत उसे सुनना चाहती हों पर वो अपनी सुध बुध खो बैठी । धीरे से किसी की मधुर आवाज सुनाई द...

जीवन का रंगमंच

परिस्थितियाँ चाहे कैसी भी हो हमें हताश नहीं होना चाहिए उससे निकलने का प्रयास करना चाहिए दिन के उजाले में सब स्पष्ट दिखता है सांझ ढलते ही स्पष्ट बिंदु धुंधला पङ जाता है यह जिंदगी भी धूप छांव सी है किसी पल खुशी है तो किसी पल मातम का माहौल । दुख सुख के जाल में जीवन एक जंजाल बना हुआ है और वह परमेश्वर अपनी उंगलियों पर मानव कठपुतली को नचा रहा है और मानव नाच रहा है कर्म कर रहा है और आशाएं इच्छाएं तृष्णाओं के साथ गुजर बसर कर रहा है जिंदगी जब परीक्षा लेती है गरीब अमीर जाति और संप्रदाय नहीं देखती कुदरत की नजर में सभी प्राणी समान हैं प्राणी यानि ( स्त्री-पुरूष) इस समानता में लैंगिकता की कोई जगह नहीं शायद तभी पंचत्व निर्मित यह मानव जीवन अनेकानेक चुनौतियों कठिनाईयों और न जाने इस जीवन के रंगमंच में कितने ही कष्टों से होकर गुजरता है अंत तक वह सब कुछ देखता है जीवन जीता है या हारकर इस रंगमंच से कोई पहले ही चला जाता है पर जो बिना रूके बढता जाता है वही अंतिम बाजी जीतता है।

मानव स्वभाव में संवेदना का स्थान

मानव स्वभाव से ही चंचल आतुर लालची क्रोधी स्वार्थी होता है दूसरा पहलू  इसके ठीक विपरीत है हम अपने अच्छे व्यवहार से ही अच्छे समाज को गढते हैं जिसमें सभी नैतिक जीवन मूल्यों का सम्मिश्रण होता है   आखिर संवेदना का होना ही तो जीवन का होना है  जिस समाज से हम बहुत कुछ प्राप्त करते हैं उस समाज को समर्पित होना उसके बेहतरी के लिए प्रयासरत  रहना। केवल अपना हित सोचना  और करना यह प्रवृति मानव को  स्वार्थी बनाता है मूल्यों का ह्वास होने से सामाजिक संरचना पर असर पङता है परस्पर प्रेम की कङी में हमें समाज को जोङना है भ्रातृत्व प्रेम को बढाना है क्योंकि हम मानव हैं और धरती के सबसे बुद्धीजीवी प्राणी वर्ग की श्रेणी में प्रथम हैं  तो इस शरीर के सूक्ष्म संरचना में नैतिक मूल्य जरूर समाहित होंगे । अन्यथा जीवन तो नीरस बना रहेगा। जिस देह में प्राण ना हो वह निष्प्राण शरीर राख का ही ढेर होता है ठीक वैसा ही जैसे चैतन्य  में संवेदनहीनता का बने रहना या संवेदना का क्षीण होना है ।

दिव्य पथ (स्वप्नावस्था )

दिव्य- पथ एक गहरी खाई जो मेरे अनुमान से परे था हालांकि मेरे पाव फिसलने से बच गए , एवम् भय की कोई ऐसी अवस्था उत्पन्न नही हुई लेकिन  उस गहरी खाई में से निकलना संभव भी नहीं था,एक बार जो कदम  लड़खड़ा गए फिर वो उठ पाये बहुत कम मुमकिन होता है। साहस चाहिए आत्मविश्वास चाहिए  सम्भलने की आत्मिक क्षमता चाहिए । लेकिन मुझमे वो क्षमता कहाँ से उत्पन्न हुई मैं आश्चर्य में पड़ गई कुछ समझ नही सकी । मेरी नजरें किसी तलाश में थी और मैं सब कुछ  भूलकर उस दिशा की ओर बढ़ी मन बहुत विभोर था मानो जैसे सारी कायनात की खुशियाँ मुझे मिलने वाली है ,मात्र एक पल में । क्या सचमुच मैं उस  स्थिति को पा चुकी थी? जिसके लिए मैंने सारी बाधाएँ पार की, परंतु हाँ यह सच था मैंने हर्षित ह्रदय में संकल्प लिए हुए अपने क़दमों को आगे बढ़ाया  और अलौकिकता में समां गई  यहां मैं कुछ और नहीं सोच सकती थी। कुछ देख नहीं सकती थी ।कुछ समझ नही सकती थी । जिस  आभास को मैंने पाया वह अद्भुत था जिस प्रभाव में मैं बंध गई। वो डोर बंधनरहित था उन्मुक्त शिखर पर पहुचकर मैं सब कुछ भूल चुकी थी ,माना कि जिन राहों से मुझे गुजरना...

ग़ज़ल

चमन में गुलजार है ,मन में  उजाड़ है धड़कनों में आग है ,राख़-ए-जहान है फूलों में खुशबू है ,बगिया में बहार है मुरझाये फूलों की फिर कहाँ बिसात है आँखों में नमी कहीं जैसे ,गम-ए- सैलाब है उचटी नींदों में कहीं ,गफलत की नींदे आम है ख्वाहिशों की चाभी का ,दिल-ए-मकां बंद है हसरत-ए-जिंदगी  का  ,खुले में कत्लेआम है जिंदगी के किस्सों के ,अधूरे से अफसाने हैं चाहतों के तरकशों में,ख्वाबों का कमान है  जरिया मेहनतों से है ,तकदीर का लिखा टले चलना अविराम जब तलक न जिंदगी ढले।।

यंत्र का प्रयोग हमारे लिए कितना जरूरी है ?

हमारे पुरातन ऋषि परम्परा से ही यज्ञ हवन यंत्र मन्त्र आदि गूढ़ विद्याएँ विद्यमान रही हैं जो कि हमे विरासत में मिली है जिसका उपयोग करके जीवन को सुखमय बनाया जा सकता है । आप जब किसी परेशानी का हल ढूंढते हैं तो ज्योतिष के पास जाते हैं जब आप उपाय करके थक जाते हैं तो ईश्वर से भी भरोसा उठ जाता है क्योंकि उपाय कितना करेंगे और ग्रहों का खेल पल भर के लिए तो नही होता । वह नियत समय तक बना रहता है । ऐसे में यंत्रो का महत्व क्यों है? असल मे पूजा पाठ और कीमती रत्नों को पहनकर भी जब आप परेशान रहते हैं तो यंत्र आपकी मदद करते हैं इसकी खासियत है कि यह रत्नों की तरह उल्टा असर नही करता क्योकि आप बिना ज्ञात किये गलत रत्न अंगूठी ,लॉकेट पहनते हैं तो ग्रह की चाल उल्टा करके अज्ञानता वश अपना अमंगल कर लेते हैं । पर यंत्र बिल्कुल आपको प्रभावित करेगा । इसका कोई गलत प्रभाव नही होता है । जानते हैं कि किस तरह निर्मित होता है । कागज,भोजपत्र और तांबे पर बनते हैं यदि आप मार्किट से बना यंत्र खरीदते हैं तो विशेष मुहूर्त में निर्मित किआ गया हो इसका कोई आधार नहीं है जब भी खरीदें किसी विश्वसनीय ज्योतिष की मदद से ही यंत...

बागी औरत

 औरत घर चलाये और पुरुष ऑफिस जाए औरत खाना बनाये और पुरूष कमाकर लाये पति  अपनी बदहाल हालत कैसे खुलकर कह दे  कि ऑफिस में बॉस की फटकार खिन्न कर देती है उसे कहीं तो गुस्सा फूटेगा चलो घर चलकर खबर लेते हैं बिना कुसूर के औरत पिटती जा रही थी  पति बॉस का गुस्सा उतार रहा था  एक बेजुबान जानवर समझकर उसे धोता गया अपनी ही गृहलक्ष्मी को जिसका अनादर कर धन की लक्ष्मी कमाने ऑफिस जाता है  औरत सहती गई हर जुल्म को कि अर्थी उतनी है ससुराल से जो बागी हो गई अपने अधिकारों के लिए सम्मान के लिए वह महिला पापी हो गई  और पुरुष लांछन से बच निकला कुछ कीचड़ उसके दामन में छींटकर कैसे हार मान लेती घुटने टेक देती सहन कर लेती पिटती रहती वह कैसे मान लेती कि स्त्री निर्जीव वस्तु नहीं है जिसे जैसे चाहो वैसे रौंदों स्त्री प्रकृति है जो सिर्फ प्रेम लुटाती है   प्रकृति का मनमोहक दृश्य मन को लुभाता है तो क्या उसका विकराल रूप तुम सहन कर पाते हो  ज्वारभाटा , ये आपदाएं जो प्रकृति का दोहन करते  जाओ और वो विकराल ना हो कैसे सम्भव है तो क्या वह सजीव स्त्री जिसे रौंदकर उसे निष्प्राण हो...

सत्संग एवं संतों का सानिध्य

;;;;;;;;;;;;;;;;;**;;;;;;;;;;;;;;;;;; अंकुर जैसे नवजीवन लेकर धरती पर आते हैं संत समागम हरि कथा के बीज धरा पर बोते हैं सूखा अकाल तबाही से जब त्राहिमाम मच जाता है जीवन के आसार कहीं भी नजर नहीं आता है करूणानिधान जीवों पर तब प्रेम की वर्षा करते हैं फसलें लहराने लगती और धरती हरित हो जाती है अन्न फलों मेवों से जीव पेट क्षुधा मिटने लगता है उसकी करूणा प्रेम को मानव शनै शनै भूले जाता है मानवता के विनाश की गाथा मानव स्वयं लिखने लगता है लोक परलोक सुधारने का प्रयास विफल होने लगता है चौरासी के दारूण फंदे में जीव उलझने लगता है प्रभु कृपा से संत जीवों के दारूण दुख हरने आते हैं ज्योति पूंज का ध्यान कराकर हरि से भेंट कराते हैं अंतर्मन छल कपट के परदे को प्राणी धूमिल कर देता है निर्मल मन के दर्पण में वह हरि से नेह लगाता है सत्संग है अति दुर्लभ जिसको संत कृपा से मिलता है ना जाने किस शब्द चोट से आत्मा जागृत हो जाए फिर फिर गोता भवसागर और पुनर्जन्म से बच जाए बारंबार जन्म रूपी अंकुर बनने से वह बच जाए बीज ही रहकर ज्ञान अग्नि में भुन जीवन मुक्त हो जाए सब तीर्थों का तीरथ सत्संग जिसको तीरथराज कहा है राम को हृदय म...

गरीब की दीपावली

उसके घर मे खाने को अन्न बेशक कम था वह गरीब था कोई अमीर ना था  सुबह उठकर रोजी रोटी को चल पड़ता घर लौटकर 2 पैसा भी  कम था  रोटी का जुगाड़ करता कि शॉपिंग महंगे शौख पूरा करने का औकात नही था खुशी के त्योहार को कैसे मनाता भला दीया बाती कुछ  साज ओ समान भी ठीक था दीप जलाने को तेल की कीमत में उछाल बहुत था महंगाई की मार और पगार कुछ कम था रोज पुराने कपड़े पहनता आज कुछ नया तो नहीं  जरूरते अपनी भुलाकर परिवार का पेट तो पलता था  रंगीन मिठाईयों कपड़ों की ख़लिश बेशक थी मगर उसके घर मे शक्कर बताशे मिठाई से कमतर तो ना था वह जीता है परिवार के ख़ातिर रोजी रोटी की चिंता में महंगाई के जालिम मार  से वह त्रस्त  बहुत था  कोई पूछ लें उसकी हालत या मदद को हाथ बढ़ाये वह मेहनतकश था कोई भिखारी ना था जज्बा अमीरों से कहीं ऊंचा रहा उसका  भीख मांगने से बेहतर मजदूरी अच्छा था  उसके घर मे खाने को अन्न  बेशक कम था  वह गरीब था कोई अमीर ना था  .....!! 

तुम एक औरत हो!

झुकोगे झुकाए जाओगे डरोगे डराए जाओगे आवाज उठाओगे तो धमकाए भी जाओगे पल पल मरना ठीक नहीं  समझौता करना ठीक नहीं लड़ते रहो बुराई के ख़िलाफ़ जब तक सांस आखिरी हो ताकि नजरें खुद से मिला पाओ  यह बेहद जरूरी है तुम्हारे लिए तुम औरत हो , बहन  हो ,बेटी हो  यह मत समझो छींटे तुम पर आएंगी बेशक आएंगी दोगले समाज का रिवाज है तुम लड़ना यूँ ही ना हार जाना  क्योंकि नजरें तुम्हे खुद से मिलानी है यह पुरुष प्रधान समाज है बेशक ताड़ी जाओगी चुप रहने को बाध्य की जाओगी  तुम ईंट को ईंट से तोड़ना हाँ तुम औरत हो चाल को चाल से जीतना प्रतिशोध को चतुराई से जीतना अपनी कमजोरी को अपनी ढाल बनाना तब नहीं छू पायेगा ये दोगला समाज और इसमें ब्याप्त वह कुरीतियाँ जो तुम पर हावी रही हैं या रह सकती थीं सिर्फ इसलिए कि तुम एक औरत हो ।।       

यह सच है कि सभी को जाना है

ये सच है कि सभी को जाना है कब और कैसे किसने जाना है भविष्य का ज्ञात होता गर तो ये काल ना होता काल की निरंतर गति को  किसने रोका है सोच फिक्र में ढलता है हर एक क्षण जीवन का  नई सुबह को आज तक किसने देखा है पल पल घटता है आयु अल्पायु में महज सांसो के घटते मोल को किसने जाना है   अंतिम क्षण कैसा होगा आखिर ये अनुमान अमरता का वरदान जहां में किसने पाया है ये सच है कि सभी को जाना है कब कैसे किसने जाना है| :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

तेरा ही गुणगान करूँ

मुख से क्या मैं बयाँ करूँ हर एक शब्द निशब्द खूबी अनन्त महिमा अनन्त वर्णन करते नहीं अंत अगर  सोचे ये मन कि छंदो में करती रहूँ गुणगान छंदो की गांठे स्वत: ही खुल खुल जाए नाथ करूणानिधान दयासिंधु हो प्रभु अनगिनत तेरे नाम महिमा अनंत गुण है अनंत बेअंत तूं है नाथ किस मुख से मैं गुणगान के शब्दों को लाउं नाथ  यह शब्द ही आधार है तेरी सृष्टि का हे नाथ     जो भी चढ़ाऊँ श्रद्धा से स्वीकार कर लेना उसे नादान अपने भक्तों को ना दूर करना स्वयं से  स्वीकार करना विनय हम आए है तेरे शरण में हृदय के गागर को हमारे भर दो अपने प्रेम से 

अहम के पर्दे कितने मोटे

अहंकार के पर्दे  ........................... देखो अहम के पर्दे  हो गए कितने मोटे मैं ही मैं की ध्वनि  सुन रहा हर कोई मैं हूँ सबसे दौलत वाला मैं हूँ सबसे शौहरत वाला मैं दुनिया में सबसे बङा दानी मेरे मैं मैं की चर्चा  हर दिशा में फैली है  सुनता हूँ जब मैं की चर्चा मन ही मन इतराता हूँ मैं ङाक्टर हूँ  मैं इंजीनियर  मैं अधिवक्ता  मैं वाचक हूँ मैं लेखक हूँ मैं नेता हूँ मैं ही मैं  सबकुछ मैं हूँ ओह ये क्या? अहंकार के पर्दे  देखो? सचमुच हो गए कितने मोटे चला गया तूं इस दुनिया से  राग अलापे मैं मैं करते काश तू समझ लेता अभिमानी मैं का पतन बहुत दुखदाई! मैं=अहंकार/अहम गायत्री शर्मा

ब्राम्हण कौन है?

ब्राम्हण कौन ? ब्रम्हा के मुख से उत्पन्न होने के कारण एक तरउ श्रेष्टता एवं दूसरी तरफ झूठ का प्रतीक ब्राम्हण को माना जाता है मनुस्मृति में वर्ण व्यवस्था आधारित सामाजिक जातिगत संरचना की व्याख्या है जिसके कारण हम अन्य वर्ण को नीचा दिखाते हैं ब्राम्हमत्व का खोखला राग अलाप करके ...! जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात् भवेत् द्विजः |  वेद-पाठात् भवेत् विप्रः ब्रह्म जानातीति ब्राह्मणः |   जन्म से मनुष्य शुद्र, संस्कार से द्विज (ब्रह्मण), वेद के पठान-पाठन से विप्र और जो ब्रह्म को जनता है वो ब्राह्मण कहलाता है ! केवल ब्राहमण के यहाँ पैदा होने से ब्राह्मण नहीं होता ! वास्तव में ब्राम्हण वही है जिसे शास्त्रों के साथ  ब्रम्ह का ज्ञान होगा वह ब्रम्हज्ञानी पुरूष ब्राम्हण होते हुए भी जातिगत संकीर्णता में न फंसकर वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना से समाज को जोङने की ताकत रखता है ब्राम्हण वह है जो हाथी में चीटी में चांङाल में छुद्र में ब्राम्हण में क्षत्रिय में समान रूप से उस आत्मा को देखे ॥ यही फर्क है ब्राम्हण और ब्रम्हग्यानी में यदि हमारे महर्षियों ने पूरे विश्व को अपना परिवार माना तो...

पौराणिक कथा -मातंग मुनि अमृत से वंचित रह गए

एक समय की बात है मातंग मुनि तपस्या करने लगे भगवान को प्रसन्न किया भगवान प्रगट हुए बोले बोलो वत्स कैसे याद किया  मातंग मुनि ने कहा प्रभु मैं एक लंबी यात्रा की ओर जा रहा हूँ जहाँ मरूस्थल है दूर दूर तक पानी नहीं है यदि मैं मुझे प्यास लगे तो आपसे इतनी सी विनती है कि आप मेरी प्यास बुझा देना भगवान ने कहा तथास्तु मातंग मुनि मरूस्थल मे पहुंचे वहां ध्यान साधना करने लगे अचानक प्यास लगी भगवान को पुकारा उन्होने देखा दूर से गदहे पर सवार  एक चांङाल चलकर आ रहा है उसके हाथ मे एक चमङे की मशक थी  मातंग मुन् मन ही मन भगवान को कोंसने लगे  चांङाल पास आया कहता मुनिवर आप पानी पी लिजिए मै बहुत दूर से चलकर आपके लिए आया हूँ वो कहते नहीं नहीं तुम अपना जल ले जाओ मुझे प्यास नहीं लगी है  वह चांङाल चला गया  वहीं भगवान प्रगट होते और समझाया वत्स.... जिसे तुम चांङाल समझ रहे थे वास्तव में मैने इंद्र को बोला था मेरे भक्त को पानी नहीं अमृत पिलाकर आओ  इंद्र कहते प्रभु मृत्युलोक में अमृत ? भगवान कहते हाँ मेरे प्रिय भक्त को अमृत पिलाकर आओ  वास्तव में मेरे आग्रह पर इंद्र यहाँ आए  मा...

ग़ज़ल

अश्क आंखों में हो जरूरी तो नहीं कुछ नमी सा दिल में होना चाहिए गम ए सैलाब उमड़ना भी चाहे तो बेशक  दिल के तूफ़ान दिल में ही  थमने चाहिए आंखों से दिल का हाल जान लेते हैं  लोग दर्द के दरिया को थोड़ा सा झुकना चाहिए बेवजह तकदीर को यूँ कुसूरवार क्यों ठहराना जिंदगी के खेल को संजीदगी से समझना चाहिए  कि मेहनत के पटाखे ही फूटते हैं जलने वालों पर जीत के जश्न का पता दुश्मनों को होना चाहिए इस गफलत में न हो गुम कोई साथ देगा तेरा  गैरों से ज्यादा  खुद पर यकीन होना चाहिए शम्मा जलती है दूसरों के खातिर ही गुँजन कुछ नेकी कर दुनिया से विदा लेना चाहिए ।।

रहस्यमयी गर्ल्स हॉस्टल (भाग-2)

रहस्यमयी गर्ल्स हॉस्टल (भाग-2) अनुषी की मौत का सच  सामने आ चुका था । गीतांजलि मैम जैसे ही आंख खोलती  हैं अपने सामने रूचि को देख एक पल को अनुषी समझ बेड से गिर जाती हैं ,डर उनके चेहरे पर साफ झलक रहा था ....माथे से पसीने टपक  रहे थे  और गिरने से उनको चोट आई थी जो अब आभास नहीं हो रहा था उस वक्त वह गहरी नींद से जागी थी और रूचि इस बार उनके सारे राज जान चुकी थी किन्तु......रूचि का इस तरह बूत बनकर खड़े रहना गीतांजलि के शक को मजबूत करता गया ,उन्हें एक और डॉ सताने लगा कि कहीं रूचि ने उनका बड़बड़ाना सुन तो नहीं लिया....? क्या रूचि को अनुषी के मौत का सच पता चल चुका है ...? अपने ही बनाये षड्यंत्रों में। आज वह बुरी तरह फंस चुकी थी ....गीतांजलि मैडम सोचते हुए ,,,,,,  अपने आप को संभाला और फट से उठकर अपने  बेड पर बैठ गई और बूत बनी  रूचि की तरफ झल्लाते हुए,,,,,, 'तूँ यहां क्यों खड़ी है ....मेरा मजाक उडाने आयी है...' क्यों ..? चल जा अपने कमरे में ! रूचि जैसे ही मुड़ी मैडम ने फिर आवाज लगाया ..'सुन लड़की ' .....रूचि पीछे मुड़ी ...मैडम ने कड़े चेतावनी के साथ बोला"अगर तूने किसी को क...

रहस्यमयी गर्ल्स हॉस्टल ( भाग 1)

रहस्यमयी गर्ल्स हॉस्टल ( भाग 1 ) कमरे में गहन अँधेरा छाया हुआ था बिजली के पोल में शॉट लगने से बत्ती गुल हो गई थी और रूचि को अपने कमरे में जाने से डर लगने लगा , वो खाना खाकर सोने जा रही थी कि उसने भयानक चित्कारी सुनी ! आआआआह,,, ऊऊई,,,, मेरा दम घूंट रहा है ...'' "रुचि...!मैं यहां हूँ... मुझे बचा लो...वरना वो औरत मुझे मार देगी....' रूचि ..बिलकुल सन्न' 'चौकन्नी होकर चारों तरफ देखने लगी.... यहां..वहां...नीचे....ऊपर.... ऊफफ़्.... अँधेरे में तो वो खुद को ही नहीं देख पा रही थी कि पुकारने की आवाज बढ़ती ही जा रही है ...जैसे कोई रूचि के आस पास हो.... रूचि डर के मारे नीचे भागती हुई...' सीढ़ियों पर लड़खड़ाते पैर और माथे पर पसीना टपक रहा था । जैसे-तैसे साहस करके नीचे हॉस्टल के प्रथम तल पर पहुंच गयी ,उस वक्त सब गहरी नींद में सो रहे थे रूचि चिल्लाते हुए ,,, कोई है.....?? बचाओ......! मुझे डर लग रहा है , मैंने किसी की आवाज सुनी वो बहुत विकराल स्वर में जैसे मुझे मदद को पुकार रही थी .....'' आवाज में एक अलग तरह का खौफ़ था उसकी आवाज भी स्पष्ट नही लग रही थी  कि वार्...

बाल्मीकि आश्रम मे सीता का आगमन

  वाल्मीकि जी को एक बार ब्रम्हा की भविष्यवाणी सुनाई दी  कि भगवती लक्ष्मी का मानवीय प्रतिरूप सीता का वन गमन होगा और ब्रम्हा जी के कथन के अनुसार महर्षि को ही सीता की देखरेख करनी है एक निश्चित समय तक जब तक कि यह कलंक ना  मिट जाए। महर्षि की तपस्या सफल हुई वह साक्षात भगवती को पुत्री के  रूप में पाकर धन्य हो गए। शायद भी तय था कि महर्षि की कोई पुत्री नही थी तो यह इच्छा भी साक्षात भगवती को ही पूरी करनी थी ।  मां हमेशा अपने भक्तो का ख्याल रखती है । इसलिए तो वह चाहती तो सीता के रूप मे अपने मायके जाकर पुत्रो को जन्म दे सकती थी किन्तु नियति का हर कदम भक्तों के लिए सुखदाई रहा। वहीं दूसरी तरफ लक्ष्मण आहत थे  कि राम ने अन्याय किआ , सीता भाभी के त्याग को नही देखा उन्हें अकेला छोड़ दिया वन में। तब  वो रुष्ट होकर महल छोड़कर  चले गए । लक्ष्मण नहीं जानते थे कि इन घटनाओं के पीछे  क्या रहस्य  छिपा था। । दरसल सतयुग में  श्री हरि को श्राप मिला था एक बार 10 देव दानव संग्राम हुआ जिसमें  देवता जीत गए और असुर हार गए । कुछ राक्षस  बच गए वे भाग गए और भृग...

पितृसत्ता के दौर में रिसाइकल हो रही बेटियाँ

  ................................. रिसाइकल हो रही बेटियाँ आखिर सच ही तो है जिन वस्तुओं का हम इस्तेमाल कर चुके हैं उनका दुबारा से इस्तेमाल करने के लिए रीसायकल करते हैं प्लास्टिक हो मेटल हो या कागज ।हम उन सभी चीजों को दुबारा इस्तेमाल करते हैं तकनिकी द्वारा हम बिलकुल नवनिर्माण से चीजें आसान कर पाने में धुरंधर हो गए हैं ।मानव समाज में स्त्री हो या पुरुष दोनों के साझा सहयोग से ही  विकास होता है बेशक पुरुष समाज नारी के योगदान को झुठला दे,या अपनी शाख़ पर प्रहार होने के डर से  मानव के रूप में एक स्त्री को लज्जित करे और जब बात पितृसत्ता सोच की हो तब मसला वाकई और गंभीर हो जाता है तो क्या हम ये गांठ बांधे रह सकते हैं कि महिलाएं बेटियाँ भी कोई वस्तु हैं और उनको उसी अप्रायोगिक वस्तु की तरह उन्हें केवल शरीर(निर्जीव) मानकर ,उनकी भावनाओं को कुचलकर ,उनकी उडान के पर कुतरकर उनको मानसिक रूप से पंगु बनाकर उनके निर्णयों को शून्य करके पुरुष सत्ता अपना वजूद खड़ा रखने में सक्षम होगी? तो ये बिलकुल गलत है साहब! किसी भी लक्ष्य को पाने में घर की महिलाओं बेटियों और परिवार का अहम् रोल होता है ऐसा कदापि ...

चाणक्य नीति स्त्री विरोधी है??

  चाणक्य नीति स्त्री विरोधी है?? कॉलेज के दिनों में मैने नारीवाद और मनुस्मृति का अध्ययन किया था । बेहद अटपटा लगता था तब कि वह दौर कितना भयानक होगा जिस दौर में न जाने कितनी ही प्रथाएँ थीं। महिलाएं महिलाओं की दुश्मन हुआ करतीं थी । पुत्र की लालसा में ओझा तांत्रिको का सहारा लिया जाता था । पुत्रों को फल दूध मेवे खिलाकर लड़कियों को  पराया धन मानकर उनकी उपेक्षा की जाती थी यह तो आज भी विद्यमान है कुछ पिछड़े मानसिकता के लोगों में । चाहे वह शहर में हो या गांव में। मानसिक पंगु लोगों की  तदातें कम तो नहीं हुई ।  आये दिन अखबारों में  , tv में देखने सुनने को मिलता ही है ।  मैं बात कर रही हूँ धर्म ग्रंथो में फेरबदल की । अब  फेरबदल ही कहूंगी । क्योंकि जो ग्रंथ उस दौर के होंगे वे मूल प्रति में तो हमे और आप लोगों को साक्षात श्री हरि तो देने आएंगे नहीं । तो दौर जैसे जैसे बदला हमने हर धर्म ग्रंथ का संशोधित रूप ही पाया । फिर भी जितना हो सका अच्छे विद्वानों ने धर्म ग्रंथों को  मूल ही रहने दिया।  माना जाता है कि रामानन्द द्वारा रामायण धारावाहिक असल मे बिना तोड़े मरोड़े...

तीसरे नेत्र की शक्ति का आधुनिक रूप टेलीपैथी

  दिव्यदृष्टि क्या है ?? अष्टांग योग द्वारा अपने मन ,चित्त, इन्द्रियाँ इनको अपने वश में करके योग साधना से  हरि नाम का स्मरण करके जब अलौकिक शक्ति यानी कुंडली जागरण करते हैं तब जाकर दिव्यदृष्टि खुलती है कुंडली जागरण के बाद ही मनुष्य की 3rd eye यानी दिव्य नेत्र/दृष्टि खुलती है और वह भूत ,भविष्य, वर्तमान की बातें देखकर बता देगा । पुरातन काल में कोई विज्ञान की आधुनिक लेबोरेट्री नहीं थी इसलिए परामनोविज्ञान को समझने के लिए ऋषियों ने योग द्वारा अपने हृदय को ही परलौकिक विज्ञान की लेबोरेट्री बनाई ! घृतराष्ट्र ने जो पूरी महाभारत सुनाई थी वह भी दिव्यदृष्टि का प्रभाव था।    आधुनिक टेलीपैथी क्या है ?? चित्त यानी मन से परे का सम्प्रेषण  है टेलीपैथी ! अर्थात जब आप परचित्तज्ञान /टेलीपैथी की बात करते हैं  फैड्रिक डब्लू एच मायर्स  को आप जानते ही हैं  1882 में यानी 18वीं सदी में इस विज्ञान को उन्होंने टेलीपैथी नाम दिया और बहुत से अनुसंधान भी हुए ताकि आधुनिक पद्धति में मानव मस्तिष्क और कंप्यूटर की सहायता से एक विज्ञान के रहस्य को समझा जा सके । वस्तुतः यह शोध तो ज्ञान ...

भावनाएँ उमङती हैं

  भावनाएँ उमङती हैं निश्छलता झलकती है शायद किसी ने  करीब से देखा हो भावनाओं के बदलते रूप को यह सच है कि-भावनाएँ उमङती हैं माँ के लिए बेटे का प्यार जीवन भर एक समान रहता है बेटे के लिए माँ की अहमियत धीरे धीरे कम हो जाती है  तब भावनाएँ उमङती हैं माँ की ममता का निरादर करना दिल में छल और जुबां पर मीठे शब्द इन सब बातो से अंजान  एक माँ यह विश्वास लिए कि -उसका बेटा बुढापे का सहारा बनेगा वह अपनी संपति बेटे को सौंप निश्चित ही बेफिक्र हो जाती है तब भावनाएँ उमङती हैं वह मक्कार बेटा अपनी चालों से माँ को उलझाकर  दो मीठी बातो से उसके दिल पर प्रहार करता है संपत्ति पर हक जताकर घर से बेदखल कर देता है तब भावनाएँ उमङती हैं दर दर की ठोकरें खाकर दर्द से कराहती वह माँ अपने जिगर के टुकङे की नफरत साथ  लिए एकाकी जीवन जीती है  वह कोई शिकायत नहीं करती उसका रोम रोम बेटे के लिए मंगल कामना करता है तब भावनाएँ उमङती हैं जा बेटा तूँ अपनी दुनिया में खुश रहना यह कहकर वह अंतिम सांस लेती है और बेटे को आशीष देती है तब भावनाएँ उमङती हैं बेटे के हर कृत्य को एक माँ नादानी समझ माफ करती है कितना...

कविता लिखी नहीं जाती

  कविता लिखी नहीं जाती वह तो स्वत: ही लिख जाती है भावनाएँ व्यक्त नहीं की जाती वह तो स्वमेव व्यक्त हो जाती है प्रेम किया नहीं जाता, जीवन की राहो में असमय प्रेम हो जाता है जीवन काटा नहीं जाता बल्कि मुश्किलें हमें जीना सिखा देती हैं जहर पिया नहीं जाता बल्कि दो कङवे बोल हमें जहर पिला देते हैं नम्रता सीखी नहीं जाती  बल्कि यह तो हमारे अंतर्मन में  मृग कस्तूरी सी छिपी होती है महान बनने की कोशिश नहीं की जाती अक्सर हमारे अच्छे कर्म हमें स्वत: ही महान बना देते हैं मैं फिर से यही कहूँगी कविता लिखी नहीं जाती यह तो स्वत: ही लिख जाती है! "गायत्री शर्मा"

शब्द पहेली

  एक एक अक्षर से जुङकर नित शब्द नए बनते जाते हैं भाव हो दिल का कोई भी शब्द अक्षर से बया होता है कितने गहरे अर्थ हैं इनके हर एक मोती में माला है सुख दुख आहत  प्रेम प्रलोभन कूट शब्द का जाल रचा है अक्षर वही हैं सीधे साधे  जगह बदलकर अर्थ बनाते शब्दों का कर उलटफेर मानव बुद्धि का वजन बढाते  ॥ गायत्री शर्मा

मेरी कविता

  मेरी कविता बन गई मेरी हृदय गीत की परिभाषा शेरो शायरी भूलकर अब मैं लिखने लगी अंत:अनुभूति मेरे दिल की हर एक बात जुबा जिसे ना बयाँ कर पाए आँसू जब स्याही  बन जाए कलम हृदय की व्यथा कहे आँसू अविरल धारा बनकर जीवन को गतिशील करे जब चिंतन को विस्तृत किया महसूस किया पीङा समाज का कविता मन का  दर्पण बनकर समाज का दारूण व्यथा दिखाए मैं कामिनी बन प्रेमी रूप को दर्पण में न  निहारूं...... इन आँखो के अश्कों से उपजी  गरीबी दरिद्रता की परिभाषा मेरी कविता बन गई मेरी हृदय गीत की 'परिभाषा'! "गायत्री शर्मा"

मझधार है ये संसार तेरा

  मझधार है ये संसार तेरा मांझी बन खेवन आ जा तूँ मैं उलझ रही इस दुनिया में उलझन सुलझाने आ जा तूँ दुर्गम पथ है घनघोर घटा दीपक बन राह दिखा जा तूँ सुख-दुख मे एक समान रहूँ समता का मार्ग बता जा तूँ हृदय पीर,व्याकुलता को मुरली की धुन से हर ले तूँ इस चंचल चित को मोङकर मुक्ति का मार्ग दिखा जा तूँ गायत्री शर्मा

Deep pain पीड़ा

  पीङा क्या है ?क्या यह मात्र  आभास है जो हमें प्रतीत होता है यह किस प्रकार का एहसास होता है जिसे हम महसूस करते  हैं जिसके उग्र स्वरुप में समाकर दिल रोता है ,आत्मा कराहती है एवं हमारे व्यवहार में परिवर्तन दीखता है चूंकि यह संभव है की इस दर्दनाक अनुभूति को कोई नहीं भूल सकता है जहन में कैद हो जाती हैं जिसका प्रभाव हम अपने नियमित जीवन में देखते हैं महसूस करते हैं।  पीङा एक सूक्ष्म प्रभाव है मन पर जो मानव को आहत करता है बारंबार मानव हृदय टूटता बिखरता और जुङता है एक सूक्ष्म प्रक्रिया के रूप में हमारे कल्पना में सोच में हर पल में समाहित होकर हमें वेदना से व्यथित करता जाता है क़ि हमारे नियमित कार्यशैली प्रभावित होती है। क्या कोई किसी शक्श के पीड़ा का अनुमान लगा सकता है? पर सवाल यह है कि कैसे ? यदि वह व्यक्ति स्वयं उस स्थिति से जूझ चूका हो वह बेहतर समझ सकता है परंतु आज के समय में किसी के पास इतना समय होगा किसी का दर्द साझा करने का! शा यद् नहीं। यदि हम विचार करें तो प्रश्न यह उठता  है कि पीङा क्या शारीरिक  होती है या केवल मात्र मानसिक ? जिसका आभास केवल जागृति में है य...

भ्रष्टाचार

  राष्ट्र की प्रतिभा ,युवा, जवानी जनसँख्या पर बलि चढ़ी है लोभ,प्रलोभन,घृणित राज में सुशासन पर भारी पड़ी है अर्धविक्षिप्त अवस्था में सड़कों पर प्रतिभाएं पड़ी हैं चंद सोने के सिक्कों खातिर मर्यादाएं यहाँ धरी पड़ी हैं कृषि, व्यवस्था की हालत वस्तु मूल्यो में इजाफा हुआ जीवन का आसार नहीं है प्रकृति का कोप बढ़ा है  इस धरती की सभी धरोहर माफियाओं ने सोख लिया है मान लो अब इस देश में यारों लोकतंत्र औंधे मुँह पड़ा ।। गायत्री शर्मा

फूलों की सुरक्षा में काँटों का होना

जन्मी है एक नन्ही परी रोशन हुआ है घर आँगन पिता की ऊँगली थामकर घूम रही है वो परी नहीं है फ़िक्र भूत का और फिक्र नहीं भविष्य की खुद में ही वो खिलखिलाती मदमाती सी वो परी खेलती है कांच के और काठ के खिलौनों से झूम झूम नाचती है चुलबुली नन्ही परी यौवन की दहलीज पर कदम उसने ज्यों रखा समाज की नजरों में अब उतर गयी है वो परी एक वक्त वात्सल्य भरा पूर्ण प्रेम को पा रही थी आज इस यौवन को अब हैवानों से बचा रही दंश टीस ह्रदय की तीव्रता से बढ़ने लगी घूरती मवालियों के नजरों से  वो बच रही यौवनावस्था में प्रवेश कर ,बचपन को पार किया सोचकर विचार कर व्याकुल  माँ हो रही है  शुभ विवाह की जोरों -शोरों से तैयारी चल पड़ी फूल सी आँगन में जहाँ चहकती थी वो परी छोड़कर संसार अपना अब किसी की हो चली मायके को भूलकर माँ का वचन निभा रही बन गयी है आज वो किसी की जीवनसंगिनी रिश्तों की डोर खुद संभालती है वो परी नाजों साज में पली -बढ़ी हिंसा से वो तड़प रही पुष्प की कोमलता से काँटों भरा  उसका सफ़र प्रताड़ना को सहते हुए माँ की बातें सोच कर बेटी उस  पराये घर को अपना स्वर्ग समझना रूखी सूखी खाकर भी मुँह ना अपना खोलना स...

क्या यही रीत है

  उमंग से भरी ,मन की गति प्यास है कोई,मिटती नहीं दूर तक घनी, निशा की रोष से पीर भर ह्रदय, सजल नैन है मृगतृष्णा ये जहाँ,किस खोज में है भटक रहा है क्यों, है रास्ता कहाँ धरती गगन मीलों, दूर मिल रहे है जैसे भरम काई, मन में जम रही है ख्वाब अनगिनत नाजुक सा है दिल किसे ये समेट ले  किसको वो तोड़ दे वक्त का मरहम ,वक्त के चोट पर औषधि है कभी,  कभी दर्द बन रहा क्या यही रीत है ,खाक ये जिंदगी जीना मरना यहाँ ,नहीं आसान है। गायत्री शर्मा

ढाबे का छोटू

  काम करता रहा ,ख्वाब बुनता रहा ढाबे का छोटू  बचपन को खोता रहा अनगिनत ख्वाब और आँख में भर नमी इस फ़िकर में पड़ा वो सिसकता रहा घर में बीमार माँ ,ना दवाई का खर्च तंगी भारी पड़ी कैसे  रह पायेगा कुछ बचत से कभी आँखों में भर चमक तीजो त्यौहार महंगे  बजट से बड़े मन को मारे रुआंसा न खर्चा किया सुखी रोटी खा उसमे गुजारा किया उस बचत से कभी दाल-रोटी मिले बिगड़े दिन में कहाँ कोई करता भला छोटू का बचपन खोते माँ सब देखती जब मोहल्ले के बच्चे गए थे स्कुल किस मुह से कहे ढाबा को छोड़ दे घर में तंगी हो छोटू स्कूल चल दे वक्त की ठोकरों ने ये क्या कर दिया पेट की भूख ने उसका बचपन छिना उम्र से पहले छोटू बड़ा हो गया काम के बोझ में बालपन खो गया।। गायत्री शर्मा

दर्पण चेहरा अंजाना सा

  साँझ तले बीते  रैना,अश्कों से भीगे हैं नैना पलकें दर पलक झपकती है अकुलाहट ना ,दिल में चैना मौसम ने रंग जमाया है ,वो ठंढी फुहारें अंगार लगे तपता भानू से धरा जहां ,वही धरा बना मन का अंगना विक्षोभ हो जिस पल अपनों से ,रिसने लगे जीवन की बगिया क्या लोभ पले इस जीवन में ,सेमल पुष्प सी ये दुनियाँ जड़ता ने पंख पसारे हैं, सपनों के पंख बेचारे हैं जो भोर हुआ किरणें छिटकीं ,आशाओं का तब दम निकला निशि से घिरी रैना ढल जाये ,कोई जख्म हरा फिर हो जाये मुरझाये चमन अन्तःमन का,  दर्पण चेहरा अंजाना सा  दुनिया का रंग फिजुली है ,ना फ़िक्र रहा मिट जाने का।। गायत्री शर्मा

बच्चे तुम तकदीर हो कल के हिन्दुस्तान की

  एक वक्त होता है हर बालक के जीवन में  चैन-ओ-सुकून भरा जिसमें न भविष्य की और न ही भूतकाल की चिंता होती है वर्तमान ही  उसका सबसे सुंदर पल होता है ख्वाब-ओ-अरमानों की टोली के संग  और हंसी ठिठोली के बीच वह बालक जब  दुनिया से नादाँ होता है और लोगो के पैंतरों ,दोहरे चरित्रों और मक्कारी से बेखबर एक दौर बचपन का दूसरे दौर को दर्शाता हुआ स्वाभाविक तौर पर अस्विकार्य निर्णय होगा वक्त संवेदना ,सजीवता, और विविधता को दर्शाता है तब हम समाज के साथ बढ़ने का लक्ष्य साधते हैं एक बालक समाज से अंजान खुद में मगन लेकिन जब हिस्सा बनाया जाता है उसे हर दायित्व का कर्तव्यों का भार वहन करने को सीख देकर लड़का और लड़की के बीच का भेद बताकर ऊंच नीच जाति और संप्रदाय के गंदे खेल में उलझाकर हर तरफ से स्व हितपोषण की बात कहकर षड्यंत्रों ,मक्कारियों के बीच फंसाकर संस्कारों ,मर्यादा के नाम पर प्रहार कर उस कोमल मन को यह बोध कराया जाता है वह भी दोहरा चरित्र अपना ले मक्कारी सीख ले तब उसे घृणा हो जाती है इस दोहरे चरित्र वाले समाज से न खुद समझ पाता है न किसी को समझा पाता है इस दरमियां कश्मकश का वो दौर जाने कि...

हार मत मानो

  नाचीज़ हो जीवन करना क्या , कायर बन जग में जीना क्या खुद के हालातों से टूटे जो ,वह शख्श भला फिर जिन्दा क्या लाखो हैं बुलंद फ़साने यहां, फिर भी गफलत में सोना क्या तूँ दांव चले जा दुनिया में, बाजीगर हार के रोना क्या पागल रस्ता रस्ता छाने, सब कुछ खोकर अब पाना क्या ठुकराए बेवक्त तेरा कोई, ले दर्द जिगर में घुटना क्या उस अतीम से जाकर पूछ जरा , हर हाल में खुश है कहना क्या वो गरीब अभाव में जिन्दा है, दौलत के पीछे मरना क्या दो पल की हैं जिंदगी जी ले, ख्वाहिश बेशुमार भी करना क्या हंसकर हर गम को भुला देना, शिकवा-ओ-शिकायत करना क्या मत बांध अंधेरों में खुद को ,मायूसी लिए अब फिरना क्या जीवन का मतलब लड़ना है , अब सोच फिकर में ढलना क्या । गायत्री शर्मा                              

धूप छाँव सा जीवन

  खुशियों से भरा हो लाखों पल ,कहीं नैन नमी से युक्त रहे झरझर बरखा  जो बून्द पड़े , फिर भी अंगना हो अनल  तले नभचर  ख़ग दाना- दाना को ,अन्न नीर बिना जैसे तरसें विचरे नभः में पंखे लहरा , उन्मुक्त गगन से दूर चले जो क्षितीज दिखे पंखों के परे ,भानू किरणों से तपता रहा अंकित जो करूँ दुःख का बादल ,चहुँ ओर घिरे पर भीग रहे ना उड़ पाया न ठहर सका, हर तरफ ही नीड़ तलाश रहा बेबसी के काले बादलों ने ,सपनों की उड़ानें रद्द कर दी चंचल ऋतुओं का क्या कहने,बेवक्त मिजाज बदल बैठे बेमानी लगे सावन भी उसे ,वो मयूर नहीं जो थिरक सके पंखें भीगी नम नैन हुए, किस ओर दिशा में नीड़ बसे। गायत्री शर्मा

ग्रामीण समाज

  ग्रामीण समाज नया परिवेश गाँवो का वो  मनोहर  दृश्य  आज प्रत्यक्ष अनुभव से जाना हमारे शहर और यहाँ के लोग अंतर जमीन आसमान का है लोग अजनबी हैं मेरे लिए परंतु शहरों से काफी बेहतर हैं जो खूबियाँ है यहाँ के लोगो में ग्रामीण सहयोग प्रेम और सौहार्द  आज शहरों की चकाचौंध में दफन है  समय के अभाव में रिश्तों में बढती दूरियाँ यही है हमारे शहरों की खूबियाँ बढ रही हूँ मैं निरंतर अंजाने ङगर पर चल मीठी यादें स्मृतिपटल में संजोए इस बार भी "एक नया अनुभव" !" गायत्री शर्मा"