दर्शन की लंबी कतारें लगी हुई थी महक भी जाकर शामिल हो गई ,इतने श्रद्धालु थे की बस नजारा देखते ही बनता था
लड़ियों से सजा माँ का दरबार और चहल पहल एक अलौकिक समां नजर आ रहा था।
आश्चर्य कितनी प्यारी मूरत है तपाक से बोल पड़ी! कोई देखकर नजरें हटाए कैसे ? माँ की सूरत में पूरे ब्रम्हांड की खूबसूरती जो समाया है । श्रद्धालु आते रहे सजावट का सारा सामान उपलब्ध था एक जूड़ा रह गया था जिसको संभाल कर रखा गया था सुंदर मोती जडा हुआ, लंबे आर्टिफीसियल घने बालों से बना हुआ, किसी कलाकारी के हाथों का कमाल होगा । अब तो सब ब्यवस्थित हो गया सिवाय जूड़ा के ,उसे लेकर कहाँ घूमती अचानक सजावट में उसकी जरूरत पड जाती तो क्या होता महक ने चौकी के पीछे दीवार में लगी कील पर लटका दिया ।
दर्शन खत्म हो चुके थे चौकी ख़ाली थी श्रद्धालु जा चुके थे कुछ लोग जो वहाँ रुके थे वे भी अपने काम में लग गए, कुछ देर महक ने माँ की ओर देखा तो मंत्रमुग्ध हो गई वह इच्छाएं जो जाहिर करना चाहती थी मन में ही रह गई और ऐसा लगा वो दिव्य मूरत उसे सुनना चाहती हों पर वो अपनी सुध बुध खो बैठी । धीरे से किसी की मधुर आवाज सुनाई दी आज मौसम बहुत सुहाना है और हो भी क्यों ना आज माँ की चौकी सजी है उसने आकाश की ओर देखा मंद शीतल पवनें चल रही थी आकाश पूरा नीला था कि मानो इंद्रदेव कभी भी बरस सकते हैं।
तभी वह चौकी के पीछे वाली संकरी गली से गुजरी कुछ छोड़ आई थी शायद, ओह! वह थी माँ की चरण पादुका। जो काले रंग का सफ़ेद मोतियों से जडा हुआ और बेहद खूबसूरत था । स्टेज सज चुका था लेकिन चरण पादुका की कमी रह गई हमने उसे भी यथास्थान रख दिया,अब जो जूड़ा था वह भी सजा दिया गया निरीक्षण के बाद द्वार को पुनः श्राद्धालुओं के लिए खोल दिया गया।
दरबार का नजारा देखते ही बनता था।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें