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दिसंबर, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मौत का मंजर

आंखों में ख्वाब थे जिंदगी जीने के लिए  कोई गम ना था दुश्वारियाँ झेलने के लिए  सोचा न था जिंदगी ये दिन भी  दिखाएगी हम अपनो की लाश को तड़पते रह जाएंगे  जीते जी मुर्दों के साथ रहकर इंसानियत रोयेगी सिलसिला यूं मौतों का कुछ और नहीं है  दफन है जिंदगी अमानवीय क्रूरता तले  इंसान भगवान नहीं जो खुद को तार ले चीखें गूंजती है विभत्सना देख मानव का  दुनिया में महामारी का ग्राफ बहुत है  मोक्ष की कामना फिजूल है करना  मौत के बाद लाशों का गार्जियन कौन है  शमशान में लाशों का ढेर है बहुत  लाइनें वहां भी लंबी है अंतिम सफर में कितना डरावना है हकीकत -ए,-मंजर जीते जी इंसान का ठिकाना कहाँ है।।

युद्ध का परिणाम

युद्ध एकल नहीं हर ओर गूंजे स्वर विभत्सनाएँ  सैनिकों के गाँव परिवार तक आती हैं सूचनाएँ किसी के आँख का तारा किसी का सुहाग है प्यारा न जाने कब कहाँ किस ओर से खबरें डराती हैं  युद्ध केवल दे जाता है ना मिटने की पीर  भारी  देह से रूह तक कंपन करे कैसी प्रलय आयी कहीं चूल्हे बूझे तो किसी बहन का सुहाग उजडे है किसी के बुढ़ापे की लाठी किसी के आंख का तारा कफ़न बांधे निकलकर के तिरंगा लिपटा आता है युद्ध हरगिज ना होने पाए बेशक पक्ष अपना दो उदारवादी सिद्धान्तों से ही बेशक युद्ध टालना है ।।

कोरोनकाल की त्रासदी का राजनीतिकरण

कलिकाल का अंत है , घोर विपत्ति छाई है  त्राहिमाम चहुँ ओर है , देश-विदेश बेहाल है भारत -पाक के बीच तनाव, गोलीबारी थमती नहीं  अमेरिका और चीन में शीतयुद्ध सा मंजर है  सैनिक कैसे सुरक्षित हों , कोरोना के दंश से  देश की सैन्य सुरक्षा नहीं तो क्या होगा इस देश का  धमकी जिहाद,कोरोना  जिहाद , धर्म जिहाद विस्तार है भारत के लोकतंत्र पर खतरा ,पाकिस्तानी चाल है साम्यवादी चीन व्यवस्था में ,शासन के विरुद्ध आवाज उठा हर एक देश में साजिशों का जाल भयंकर  व्याप्त है  आतंकवाद का रूप कोरोना , दोनों ने मिलकर खेल किया मौके तलाश रहे आतंकी , ख़ुफ़िया सूत्र हवाले से  रक्षा नीतियां कूट चाल से कब तक इनसे लड़ते रहेंगे आर्थिक विपदा में राहत या आतंक विरुद्ध हथियार चुनें 

भक्त के वश में है भगवान

भक्त के वश में हैं भगवान *************** माता शबरी के अटूट प्रेम और निश्छल भक्ति की अनूठी मिसाल ! एक छोटा सा प्रयास किया है इस काव्य के माध्यम से यह बताने का कि भक्ति गर्व और उत्कृष्टता नही प्रेम और झुकाव का रास्ता है जिसमे तनिक भी संशय हो तो प्राणी भवसागर से छूट नहीं पाता । *भक्त के वश में हैं भगवान* ★★★★★★★★★★ भक्ति का रूप ले अनुपम धरा पर आज है उतरी, मतंग आश्रम में आश्रय ले रही है मात वह शबरी। थी वह इस बात से अज्ञात एक दिन राम आयेंगे, है खोला भेद मुनिवर ने तुझे दर्शन दिखाएंँगे। बिछाना दिन प्रतिदिन पुष्प प्रतीक्षा राम की करना, जलाकर आस का दीपक नयन पथ पर सदा रखना। चले सुरलोक को गुरुवर बताकर भेद ये मुनिवर, देह को त्याग कर निकले परम गोलोक को मुनिवर। किया है दृढ़ भक्ति का प्रतीक्षा दीर्घकालिक की, उम्र के अंत तक तकती रही वह राह मालिक की। जब आयेंगे श्री रघुवर यह जीवन धन्य जानूँगी, चली जाऊंँगी इस दुनिया से नवधा भक्ति मानूँगी। वो शबरी आंँख पथराई आस का पुष्प मुस्काया, मतंग आश्रम के चारों ओर उजियारा ही है छाया। योग के बल से बलवति था विहंगम दृश्य कुटिया का, योग के तेज से...

चिंतन का रुख (स्वप्नावस्था)

एकाएक चिंतन का रूख तुम्हारी ओर मुङा आँखों में नींद भरी जहन में कुछ बातें सिमटी हुई सी स्वप्नलोक का विचरण करती हुई सी हमेशा तुम्हारे साथ की चाह लिए मन में वो घङी नजदीक था मैं मग्न रही संगीतमय ध्वनियों के बीच तुम्हे याद करके जो नजारा दूर से देखा करती थी वह मैने बहुत करीब से देखा तुम्हारी एक आवाज ने जैसे मुझे मेरे काम में निपुणता प्रदान किया हो जो मेरे निश्छल स्वार्थरहित कर्म की ओर झुकाव था कि आज तुमसे फुर्सत में गुफ्तगू हुई सभी की नजरें मेरी तरफ थी परंतु मेरी नजर सिर्फ तुम्हे निहारती रही कि ये पल बीत ना जाए और तुम मेरी आंखो से ओझल ना हो जाओ एक आत्मिय चुंबकीय संचार रग रग में समाहित हुआ ऐसा आभास जैसे कि चातक को स्वाति नक्षत्र का जल बिंदु मिल गया हो और उसे पीकर अपना जीवन प्राण बचा लेता है एक सलोना स्वप्न जो हमेशा की तरह नवीन अनुभवों को जहन में समेटता हुआ सा प्रतीत हुआ हर बार की तरह एक बार फिर यह पल जिसमें तुम मेरे साथ नजर आए मैं स्वप्नों की दिग्दर्शिका तक ही सीमित कैसे रह सकती थी यह जो अपार आत्मिक साम्राज्य मेरे पास है इसके आगे सभी स्थान ,पदार्थ ये जहान शायद कुछ भी नहीं है

नजरों से नजारों तक (स्वप्नावस्था)

दर्शन की लंबी कतारें लगी हुई थी महक भी जाकर शामिल हो गई ,इतने श्रद्धालु थे की बस नजारा  देखते ही बनता था  लड़ियों से सजा माँ का दरबार और चहल पहल एक अलौकिक समां नजर आ रहा था। आश्चर्य कितनी प्यारी मूरत है तपाक से बोल पड़ी!  कोई देखकर नजरें हटाए कैसे ? माँ की सूरत में पूरे ब्रम्हांड की खूबसूरती जो समाया है । श्रद्धालु आते रहे  सजावट का सारा सामान उपलब्ध था एक जूड़ा रह गया था जिसको संभाल कर रखा गया था  सुंदर मोती जडा हुआ, लंबे आर्टिफीसियल घने बालों से बना हुआ, किसी कलाकारी के हाथों का कमाल होगा । अब तो सब ब्यवस्थित हो गया सिवाय जूड़ा के ,उसे लेकर कहाँ घूमती अचानक सजावट में उसकी जरूरत पड जाती तो क्या होता महक ने चौकी के पीछे दीवार में लगी कील पर लटका दिया । दर्शन खत्म हो चुके थे चौकी ख़ाली थी श्रद्धालु जा चुके थे कुछ लोग जो वहाँ रुके थे वे भी अपने काम में लग गए, कुछ देर महक ने माँ की ओर देखा तो मंत्रमुग्ध हो गई वह  इच्छाएं जो जाहिर करना चाहती थी मन में ही रह गई और ऐसा लगा वो दिव्य मूरत उसे सुनना चाहती हों पर वो अपनी सुध बुध खो बैठी । धीरे से किसी की मधुर आवाज सुनाई द...

जीवन का रंगमंच

परिस्थितियाँ चाहे कैसी भी हो हमें हताश नहीं होना चाहिए उससे निकलने का प्रयास करना चाहिए दिन के उजाले में सब स्पष्ट दिखता है सांझ ढलते ही स्पष्ट बिंदु धुंधला पङ जाता है यह जिंदगी भी धूप छांव सी है किसी पल खुशी है तो किसी पल मातम का माहौल । दुख सुख के जाल में जीवन एक जंजाल बना हुआ है और वह परमेश्वर अपनी उंगलियों पर मानव कठपुतली को नचा रहा है और मानव नाच रहा है कर्म कर रहा है और आशाएं इच्छाएं तृष्णाओं के साथ गुजर बसर कर रहा है जिंदगी जब परीक्षा लेती है गरीब अमीर जाति और संप्रदाय नहीं देखती कुदरत की नजर में सभी प्राणी समान हैं प्राणी यानि ( स्त्री-पुरूष) इस समानता में लैंगिकता की कोई जगह नहीं शायद तभी पंचत्व निर्मित यह मानव जीवन अनेकानेक चुनौतियों कठिनाईयों और न जाने इस जीवन के रंगमंच में कितने ही कष्टों से होकर गुजरता है अंत तक वह सब कुछ देखता है जीवन जीता है या हारकर इस रंगमंच से कोई पहले ही चला जाता है पर जो बिना रूके बढता जाता है वही अंतिम बाजी जीतता है।

मानव स्वभाव में संवेदना का स्थान

मानव स्वभाव से ही चंचल आतुर लालची क्रोधी स्वार्थी होता है दूसरा पहलू  इसके ठीक विपरीत है हम अपने अच्छे व्यवहार से ही अच्छे समाज को गढते हैं जिसमें सभी नैतिक जीवन मूल्यों का सम्मिश्रण होता है   आखिर संवेदना का होना ही तो जीवन का होना है  जिस समाज से हम बहुत कुछ प्राप्त करते हैं उस समाज को समर्पित होना उसके बेहतरी के लिए प्रयासरत  रहना। केवल अपना हित सोचना  और करना यह प्रवृति मानव को  स्वार्थी बनाता है मूल्यों का ह्वास होने से सामाजिक संरचना पर असर पङता है परस्पर प्रेम की कङी में हमें समाज को जोङना है भ्रातृत्व प्रेम को बढाना है क्योंकि हम मानव हैं और धरती के सबसे बुद्धीजीवी प्राणी वर्ग की श्रेणी में प्रथम हैं  तो इस शरीर के सूक्ष्म संरचना में नैतिक मूल्य जरूर समाहित होंगे । अन्यथा जीवन तो नीरस बना रहेगा। जिस देह में प्राण ना हो वह निष्प्राण शरीर राख का ही ढेर होता है ठीक वैसा ही जैसे चैतन्य  में संवेदनहीनता का बने रहना या संवेदना का क्षीण होना है ।

दिव्य पथ (स्वप्नावस्था )

दिव्य- पथ एक गहरी खाई जो मेरे अनुमान से परे था हालांकि मेरे पाव फिसलने से बच गए , एवम् भय की कोई ऐसी अवस्था उत्पन्न नही हुई लेकिन  उस गहरी खाई में से निकलना संभव भी नहीं था,एक बार जो कदम  लड़खड़ा गए फिर वो उठ पाये बहुत कम मुमकिन होता है। साहस चाहिए आत्मविश्वास चाहिए  सम्भलने की आत्मिक क्षमता चाहिए । लेकिन मुझमे वो क्षमता कहाँ से उत्पन्न हुई मैं आश्चर्य में पड़ गई कुछ समझ नही सकी । मेरी नजरें किसी तलाश में थी और मैं सब कुछ  भूलकर उस दिशा की ओर बढ़ी मन बहुत विभोर था मानो जैसे सारी कायनात की खुशियाँ मुझे मिलने वाली है ,मात्र एक पल में । क्या सचमुच मैं उस  स्थिति को पा चुकी थी? जिसके लिए मैंने सारी बाधाएँ पार की, परंतु हाँ यह सच था मैंने हर्षित ह्रदय में संकल्प लिए हुए अपने क़दमों को आगे बढ़ाया  और अलौकिकता में समां गई  यहां मैं कुछ और नहीं सोच सकती थी। कुछ देख नहीं सकती थी ।कुछ समझ नही सकती थी । जिस  आभास को मैंने पाया वह अद्भुत था जिस प्रभाव में मैं बंध गई। वो डोर बंधनरहित था उन्मुक्त शिखर पर पहुचकर मैं सब कुछ भूल चुकी थी ,माना कि जिन राहों से मुझे गुजरना...

ग़ज़ल

चमन में गुलजार है ,मन में  उजाड़ है धड़कनों में आग है ,राख़-ए-जहान है फूलों में खुशबू है ,बगिया में बहार है मुरझाये फूलों की फिर कहाँ बिसात है आँखों में नमी कहीं जैसे ,गम-ए- सैलाब है उचटी नींदों में कहीं ,गफलत की नींदे आम है ख्वाहिशों की चाभी का ,दिल-ए-मकां बंद है हसरत-ए-जिंदगी  का  ,खुले में कत्लेआम है जिंदगी के किस्सों के ,अधूरे से अफसाने हैं चाहतों के तरकशों में,ख्वाबों का कमान है  जरिया मेहनतों से है ,तकदीर का लिखा टले चलना अविराम जब तलक न जिंदगी ढले।।

यंत्र का प्रयोग हमारे लिए कितना जरूरी है ?

हमारे पुरातन ऋषि परम्परा से ही यज्ञ हवन यंत्र मन्त्र आदि गूढ़ विद्याएँ विद्यमान रही हैं जो कि हमे विरासत में मिली है जिसका उपयोग करके जीवन को सुखमय बनाया जा सकता है । आप जब किसी परेशानी का हल ढूंढते हैं तो ज्योतिष के पास जाते हैं जब आप उपाय करके थक जाते हैं तो ईश्वर से भी भरोसा उठ जाता है क्योंकि उपाय कितना करेंगे और ग्रहों का खेल पल भर के लिए तो नही होता । वह नियत समय तक बना रहता है । ऐसे में यंत्रो का महत्व क्यों है? असल मे पूजा पाठ और कीमती रत्नों को पहनकर भी जब आप परेशान रहते हैं तो यंत्र आपकी मदद करते हैं इसकी खासियत है कि यह रत्नों की तरह उल्टा असर नही करता क्योकि आप बिना ज्ञात किये गलत रत्न अंगूठी ,लॉकेट पहनते हैं तो ग्रह की चाल उल्टा करके अज्ञानता वश अपना अमंगल कर लेते हैं । पर यंत्र बिल्कुल आपको प्रभावित करेगा । इसका कोई गलत प्रभाव नही होता है । जानते हैं कि किस तरह निर्मित होता है । कागज,भोजपत्र और तांबे पर बनते हैं यदि आप मार्किट से बना यंत्र खरीदते हैं तो विशेष मुहूर्त में निर्मित किआ गया हो इसका कोई आधार नहीं है जब भी खरीदें किसी विश्वसनीय ज्योतिष की मदद से ही यंत...

बागी औरत

 औरत घर चलाये और पुरुष ऑफिस जाए औरत खाना बनाये और पुरूष कमाकर लाये पति  अपनी बदहाल हालत कैसे खुलकर कह दे  कि ऑफिस में बॉस की फटकार खिन्न कर देती है उसे कहीं तो गुस्सा फूटेगा चलो घर चलकर खबर लेते हैं बिना कुसूर के औरत पिटती जा रही थी  पति बॉस का गुस्सा उतार रहा था  एक बेजुबान जानवर समझकर उसे धोता गया अपनी ही गृहलक्ष्मी को जिसका अनादर कर धन की लक्ष्मी कमाने ऑफिस जाता है  औरत सहती गई हर जुल्म को कि अर्थी उतनी है ससुराल से जो बागी हो गई अपने अधिकारों के लिए सम्मान के लिए वह महिला पापी हो गई  और पुरुष लांछन से बच निकला कुछ कीचड़ उसके दामन में छींटकर कैसे हार मान लेती घुटने टेक देती सहन कर लेती पिटती रहती वह कैसे मान लेती कि स्त्री निर्जीव वस्तु नहीं है जिसे जैसे चाहो वैसे रौंदों स्त्री प्रकृति है जो सिर्फ प्रेम लुटाती है   प्रकृति का मनमोहक दृश्य मन को लुभाता है तो क्या उसका विकराल रूप तुम सहन कर पाते हो  ज्वारभाटा , ये आपदाएं जो प्रकृति का दोहन करते  जाओ और वो विकराल ना हो कैसे सम्भव है तो क्या वह सजीव स्त्री जिसे रौंदकर उसे निष्प्राण हो...

सत्संग एवं संतों का सानिध्य

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