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जीवन का रंगमंच


परिस्थितियाँ चाहे कैसी भी हो हमें हताश नहीं होना चाहिए उससे निकलने का प्रयास करना चाहिए दिन के उजाले में सब स्पष्ट दिखता है सांझ ढलते ही स्पष्ट बिंदु धुंधला पङ जाता है यह जिंदगी भी धूप छांव सी है किसी पल खुशी है तो किसी पल मातम का माहौल ।
दुख सुख के जाल में जीवन एक जंजाल बना हुआ है और वह परमेश्वर अपनी उंगलियों पर मानव कठपुतली को नचा रहा है और मानव नाच रहा है कर्म कर रहा है और आशाएं इच्छाएं तृष्णाओं के साथ गुजर बसर कर रहा है जिंदगी जब परीक्षा लेती है गरीब अमीर जाति और संप्रदाय नहीं देखती कुदरत की नजर में सभी प्राणी समान हैं प्राणी यानि ( स्त्री-पुरूष) इस समानता में लैंगिकता की कोई जगह नहीं शायद तभी पंचत्व निर्मित यह मानव जीवन अनेकानेक चुनौतियों कठिनाईयों और न जाने इस जीवन के रंगमंच में कितने ही कष्टों से होकर गुजरता है अंत तक वह सब कुछ देखता है जीवन जीता है या हारकर इस रंगमंच से कोई पहले ही चला जाता है पर जो बिना रूके बढता जाता है वही अंतिम बाजी जीतता है।

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