कौन किसका यहाँ जग पराया रहा ,पुत्र धन संपत्ति अंत संग न रहा जीते है सब यहां कुछ सवालों के संग ,रोजी रोटी मकानों का चर्चा रहा मद में फुले हुए हैं दीवाने यहाँ ,किसी कोने में चूल्हा भी बुझता मिला पाई पाई संजोया बुढ़ापा कटे, बेदखल कर कुपूतों ने धक्का दिया क्या मिला कोल्हू का बैल बनकर उसे,साथ अपनों ने उसके छलावा किया ठीक है जिंदगी ने सबक दे दिया ,रीत दुनिया का हमको पता चल गया कोई अपना नही छणभंगुर जहाँ, कुछ करम नेक दुनिया में करते भला ईश सदा सर्वदा संग तेरे रहा ,अंत भी वो तेरे साथ संगी रहा मेट ममता का नेह हरि को ही भजो, काट देगा करम जाल संसार का जीवन का सार सत्य, सत्य !सत्य !हरि नाम,भवतारण की संजीवनी हरि नाम औषधि है ये लौकिक जंजालों की,जीव जंजाल तारण की है औषधि सत्यनाम सत्यनाम सत्यनाम जपो रे मना सत्यनाम!
शब्द गुँजन में आप सभी पाठकगणों का हार्दिक स्वागत है । यहाँ प्रकाशित समस्त लेख , कहानी, कविता, मुक्तक, गीत, आध्यात्मिक अभिव्यक्ति , मनोविज्ञान , परामनोविज्ञान आदि समस्त शाखों से जुड़े तथ्य , रहस्य , मेरी स्वरचित स्वतन्त्र अभिव्यक्ति है जिस पर मेरा मौलिक अधिकार है। अतः पाठकों से निवेदन है कि किसी भी तरह कंटेंट्स को तोड़ मरोड़कर अन्यत्र पेश ना करें । अन्यथा दोषी पाए जाने पर कॉपीराइट एक्ट के तहत आप पर कार्यवाही की जाएगी । गुंजन अभिव्यक्ति को अपना बहुमूल्य समय देने के लिए आप सभी का धन्यवाद!!