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क्षणभंगुरता जीवन का

कौन किसका यहाँ जग पराया रहा ,पुत्र धन संपत्ति अंत संग न रहा जीते है सब यहां कुछ सवालों के संग ,रोजी रोटी मकानों का चर्चा रहा मद में फुले हुए हैं  दीवाने यहाँ ,किसी कोने में  चूल्हा भी बुझता मिला पाई पाई संजोया बुढ़ापा कटे, बेदखल कर कुपूतों ने धक्का दिया क्या मिला कोल्हू का बैल बनकर उसे,साथ अपनों ने उसके छलावा किया ठीक है जिंदगी ने सबक दे दिया ,रीत दुनिया का हमको पता चल गया कोई अपना नही छणभंगुर जहाँ, कुछ करम नेक दुनिया में करते भला ईश सदा सर्वदा संग तेरे रहा ,अंत भी वो तेरे साथ संगी रहा मेट ममता का नेह हरि को ही भजो, काट देगा करम जाल संसार का जीवन का सार सत्य, सत्य !सत्य !हरि नाम,भवतारण की संजीवनी हरि नाम औषधि है ये लौकिक जंजालों की,जीव जंजाल तारण की है औषधि सत्यनाम सत्यनाम सत्यनाम जपो रे मना सत्यनाम!

धर्म का सतपथ

युग आये युग बीते जाये, लोग सहस्त्र,करोड़ो आये हर युग में हुई धर्म प्रतिष्ठा  इश्वर धार मनुज तन आते लाख चौरासी जन्म मरण है ,स्थावर,नभ-और धरा है जन्म मरण का दुःख है दारुण ,बिछू डंक सा काल खड़ा है जिव जो माया में लिपटा है,अविनाशी जग भूल चला है इन नैनों में जग को निहारे ,मायापति का ये संसार माया ठगनी ठग ले जाये ,हरि से जिव बिमुख हो जाये दुनिया के सब काज न छोड़े, हरि का ध्यान वो भूल गया पापी जीव है निर्मल ईश्वर, जीव को भव से तार रहे माया में उलझाने वाले ,स्वयं धरा पर आते हैं महिमा किस विधि कहूँ  दयानिधि,नर नारायण हे वरदायक काल के ग्रास से तुम ही बचाते, सत्संगति से प्रीति बढाते निर्मल मन सत्संग श्रवण से, ज्ञान ध्यान वैराग्य से जीते काल को जीत के निर्भय होके, जीव परमपद को पा जाते सुनो दयालु भगवन मेरे,चरणों में नित प्रीत बढ़ाना विनय करू करबद्ध ह्रदय से,अपनी भक्ति ह्रदय में रखना अंत प्राण जो निकले देह से निर्मोही मन तुझको ध्याये होकर के लवलीन भक्ति में मिथ्या जग से दूर हो जाये।।

मुक्तक

★प्रेम ही प्रेम है जग मे  न पालो नफरतें दिल में पशु पक्षी वृक्ष फूलों से सीखो कुछ  हुनर खुद में विधाता ने विविधता से सजाया है जहाँ को खुद आदायगी करके ऋण अपना करो जन्नत जहां को तुम।। ★: प्रीत में ख्वाहिशें लाखों , जिंदगी है बहुत छोटी हसरतें दिल जो पाले हैं , नहीं उनका ठिकाना है यूं घुट घुट कर भी जीना क्या क्यों इतना गम बटोरे हो कि खुलकर आज को जी लो नहीं कल का भरोसा है ।। ★जो तुमको दिल से चाहे तो उसे दिल से लगा लेना ये रिश्ते कांच के जैसे खनक लगने नहीं देना झुका लो खुद को थोड़ा तुम अगर जो बात बन जाये गलतफहमी में अक्सर सच्चे रिश्ते टूट जाते हैं ।।  राजनीति को गंदली देखी नेताओं का आचार दिखा गुंडागर्दी, फीताशाही, भाई भतीजावाद दिखा मोदी अटल कलाम के जैसा नेता  नहीं हुआ देख लिया है बदलता भारत स्वच्छ राजनीति अभियान।। ★  कह दो हवा थम जा जरा , निष्प्राण हो जाए जहाँ विधि के विधान स्वभाव से , हर जीव  गुण धरता यहाँ ।। ये मीन भी चंचल बड़ी, प्रकृति वश गुण धर रही समझे जो इसके विधान को , समझे मेरी हर भावना  अंतिम मुकाम तेरा कहाँ , क्यों कर रहा अभिमान है नहीं जाना संग में ...

ईश कृपा

परमावतार हे दयानिधान , मिटे दुःख दारुण सर्वविकार पृष्ठों में अंकित है महान ,गाथा तेरी हे जगद्दाधार सर्वस्व तूँ तुझमें है सब सबमें समाहित एकाधार अवतारों की गाथा अनंत ,अनंत सुखदायिनी स्वरुप धर रूप नर लीला रचे , तेरा कर्म जग पीड़ा हरे तूँ ज्ञान है गीता तूँ ही , पतितों के पावन ईश तूँ ही अज्ञान तम हर लो हरी , तुमको नमन हे श्री हरि।। गायत्री शर्मा

जीवन की वैतरणी से पार

पद में फूलो नहीं मद में अकड़ो नहीं जिंदगी जो मिला सत्य भूलो नहीं माटी का देह माटी में मिल जायेगा ये जनम जो मिला कुछ कर्म कर भला क्या रखा है फिजुली की रंजिशों में मन में छल हो भरा ,बोल मीठे कहें दोहरा चित्र मानवता का क्यों है भला सत्य को जानकर भी वहीं है अड़ा बात करते हैं हम मैत्री सद्भाव की तो फिर क्यों है दिलों में ये रंजिश भला सोचो मंथन करो अपना अभिमान छोड़ बात अपनी रखो बोल टेढ़े न हों प्रेम सबसे करो न कि षड्यंत्र हो मीठे बोलो से मन को न घायल करो वास हर दिल में है प्रभू श्री हरि का मिलके रहना जहाँ में मैत्री भाव से। न मिलेगा जनम  फिर से चौरासी में तर जाओगे जीवन की वैतरणी से ।।

गफलत की दुनियादारी

ख्वाहिश धरी रह जायेगी हर आस टूटी जायेगी अपना न कोई आएगा रिश्ते तुम्हे ठुकरायेंगे कैसी ये दुनियादारी है दौलत से ही तो यारी है क्या हो रहा दुनिया में ये,मक्कारी जीती जाये है  महलों में रहने वाले भी बेजान से पत्थर बने रहते हैं ऊँचे शान में दिल में तनिक न प्रेम है बेटा निकाले बाप को संचित कमाई छीनकर माँ रो रही बेटा मेरे संस्कार को न ताक रख जहाँ रहना है जा रहले माँ मेरे लिए तूँ बोझ है कैसे रखूं तुझको बता तूँ रोग से जो ग्रस्त है यही हो रहा है दुनिया में अब लाचार बूढ़े लोग हैं पत्नी की घर में कदर ना सौतन को देखे जल रही क्या खुब पाया है पति ,उन फेरों की न लाज की यही उलटफेर जमाना है मर्यादा किला ढहने लगी कितना दुखद संसार है तब भी न तृष्णा मिट रही क्यों जानकर भी न कभी वैराग्य मन में बढ रहा अब भी वक्त फिसला नहीं क्यों सोचता है तूँ भला गफलत की दुनियादारी है जकड़ो नहीं जड़ता यहां।

मौत के सफर में

जन्म लेते एकाकी जहाँ में सभी मरते भी हैं एकाकी जहाँ में सभी   बीच के बंधनों का क्या हम करें साथ दीखते हैं सब साथ होते नहीं मौत का ये सफर साथ कटते नहीं काश अपने हमें न भुलाएं मगर जिंदगी स्वप्न है बेबसी साथ है जाने क्यों होते मद में गुरुरों में सब सोचते हैं जो सब कुछ उन्ही से है जग नहीं जाना है संग में साज ओ सामान भाई बंधु बहन मात का क्या कहें जाल ममता का है  ये फ़साना जहां जानते हैं सभी फिर भी जकड़े रहे धोखों का जाल पसरा न आँखे खुली क्यों न सोचें कि कुछ नेकी को साथ लें ये हकीकत है नेकी बदी साथ है जानते है सभी फिर भी पापी बनें बोझ बढ़ता रहे जग से खाली चले क्या मुकां था तेरा आदमी तू बता रह गया खाक दुनिया में तूँ न रहा चर्चे चलते रहेंगे सभी के यहां अस्त हो जायेगी जिंदगी ही सभी रैन ये ही है नश्वर जहां है यहीं  जागरण को करो मन का बंधन छूटे इसके आगे नहीं है कोई बंदगी बोझ मन का उतारो भजो श्री हरि ।।

बुढ़ापे का जीवन -गीत

चलो देख लिया दुनिया हमनें अपनों ने हमें दुत्कारा है पत्थर पत्थर हर आंसू है बहने से भी कतराते हैं इस भारी भरकम उम्र का क्या काट जायेगा दुःख सह सह कर तिनका तिनका जोड़ा हमनें मेरा पुत्र बहु मिल राज करें क्या सोच रहे थे क्या पाया है नियति से भी क्या शिकवा है दौलत पाते वे पलट गये अपने भी अब बेगाने हैं चलो देख लिया------------- गैरों की बात नहीं करते जो रिश्ते खून के हम कहते रिश्तो ने खूब निभाया है अपनों ने  हक़ को मारा है लाठी पकड़ी तन रोग भरा किस वैध के पास है दर्द दवा जो कह दे जाकर उनसे कि माँ बाप नहीं है बोझ तेरा अंतिम सांसो को थामे हैं फिर भी बेटे को पुकारे हैं कोई न मेरा अपना आया लो अंत समय ये शव निकला चलो देख  लिया दुनिया हमनें---

सन्यासी जीवन गीत

क्या कारण है सन्यासी बन जीवन में क्या पाया हमें बताओ तुम जान सकोगे जीवन है क्या मरण के पीछे कारण तो बतलाऊँ मैं जिज्ञासा है एक इच्छा है भेष बना लूँ मैं भी शायद जान सकूं बिना जतन के फल नही मिलता बिन श्रद्धा नहीं भगवन ये भी जानो तुम मैं छोड़ू ये जग की प्रीति जन सेवा अपनाया जिसमे ईश्वर है माना की कण कण में रमता लेकिन जनसेवा है उत्तम यही बताऊं मैं उपलब्धि की बातें न जंचती क्या पाया क्या खोया तुमने दुनिया में जो मिलता है वही तो खोता नश्वरता संसार यही तो सार है राजा हो या चाहे भिखारी छोड़ चलेंगे एक दिन यारी दुनिया से बावरा मन क्यों भागे है दुनिया में कोई सार नहीं है खाकर भी धोखा अपनों से नहीं अपनों को बिसराये कैसी  आशा है अंत 'काल' जब सिर पर होगा सारी उम्मीदें धरी रहेंगी दुनिया से  नेक करम की पूंजी रखले रिश्ते साथ न देवे  क्यों न हरि को भजे खोना पाना लगा रहेगा संग नहीं कुछ जायेगा इस दुनिया से क्या है जीवन धुप छांव की अजब गजब की यारी नहीं सुहाएगा।।

शून्य सा जीवन पूर्ण करो

कर जोड़ प्रणाम नमन तुझको ईश्वर, सर्वेश्वर प्राण हो तुम जग के कर्ता संचालक हो सूंदर वसुधा श्रृंगार हो तुम नभः जल थल जीवन प्राण हो तुम हर प्राणी का विश्वास हो तुम तुझमे है समाहित अनेकानेक सूक्ष्म अति सूक्ष्म ब्रम्हांड सभी करुणा ममता आनंदघन हो  माया मोहिनी अलंकृत हो तुम अक्षर अक्षर जुड़ शब्द बने हर शब्द ध्वनि से पार हो तुम अपरंपार हे जगदीश्वर करुणामय जगत प्रजापति हो  पालनकर्ता विष्णुरूपम, शिव शम्भू कृपालु हे सर्वेश्वर बारंबार प्रणाम प्रभु करबद्ध विनय स्वीकार करो माया ममता दुःख सुख पीड़ा से मोहिनी जग जाल जंजाल हरो ख्वाहिश मेरी हर शून्य रहे दुःख के साम्राज्य से मुक्त करो जीवन का मतलब क्या जानूँ मतलब का ये संसार तेरा अनंत अनादि अजन्मा तुम मेरा शून्य सा जीवन पूर्ण करो