ख्वाहिश धरी रह जायेगी हर आस टूटी जायेगी
अपना न कोई आएगा रिश्ते तुम्हे ठुकरायेंगे
कैसी ये दुनियादारी है दौलत से ही तो यारी है
क्या हो रहा दुनिया में ये,मक्कारी जीती जाये है
महलों में रहने वाले भी बेजान से पत्थर बने
रहते हैं ऊँचे शान में दिल में तनिक न प्रेम है
बेटा निकाले बाप को संचित कमाई छीनकर
माँ रो रही बेटा मेरे संस्कार को न ताक रख
जहाँ रहना है जा रहले माँ मेरे लिए तूँ बोझ है
कैसे रखूं तुझको बता तूँ रोग से जो ग्रस्त है
यही हो रहा है दुनिया में अब लाचार बूढ़े लोग हैं
पत्नी की घर में कदर ना सौतन को देखे जल रही
क्या खुब पाया है पति ,उन फेरों की न लाज की
यही उलटफेर जमाना है मर्यादा किला ढहने लगी
कितना दुखद संसार है तब भी न तृष्णा मिट रही
क्यों जानकर भी न कभी वैराग्य मन में बढ रहा
अब भी वक्त फिसला नहीं क्यों सोचता है तूँ भला
गफलत की दुनियादारी है जकड़ो नहीं जड़ता यहां।
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