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रिश्तेदारों को सौ तोपों की सलामी (ग़ज़ल)

रिश्तेदारों से खुंदस है बेवजह नहीं वाजिब  है , सौ तोपों की सलामी दें क्या ठीक है कहते हैं फलां काम कर लो ऐसे नहीं वैसे  कर लो , खाली पीली मुंह सुजाना क्या ठीक है अरे सांस भी कोई पूछकर लेता है भला, समाज के नियम में कुछ रियायत ठीक है हर काम में टांग अड़ाना मकसद हो जिनका , झूठी शान की कसीदें क्या ठीक है मत करो दखलंदाजी दूसरों की जिंदगी में , तुम्हारे घरों के गुपचुप  झगड़े क्या ठीक है हमारी पोल खोलोगे दो चार हम भी होंगे, सिर्फ तुम ही गालियां बको यह क्या ठीक है खातिरदारी करके भी बुरा भला सुनो, अब भी उतनी इज्जत करें क्या ठीक है जितनी भी  कर लो सीधे मुंह बात इनसे , मुंह टेढ़ा कर झंडा गाड़ना क्या ठीक है ताने पर ताने और मुफ्त की सलाहे देकर , अपनी झंड आप करना क्या ठीक है माहौल गर्मागर्मी का हो न मंजूर है "गुंजन''   दूर के ढोल सुहाने लगे बस यही ठीक है ।