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मार्च, 2022 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कवि का कोमल हृदय

  सुना है मैने कविहृदय में कोमल मृदुल कोना होता है दिल की बात सहज ही वह पंक्तियों में बयाँ करता है खट्टी मीठी हर लमहों को स्मृतिपटल में संजोता है  जीवन की यात्राएँ सभी और व्यथा हर इंसान की विधाता की सुंदर रचना शब्द अलंकृत बयाँ करता है  कोमल कोमल भावों का वर्णन जाने कैसे करता है जिस भी रूप मे जैसा चाहो वैसा ही वह ढल जाता है सुना है मैने कवि हृदय में कोमल मृदुल कोना होता है गायत्री शर्मा

मन की स्थिति

  मरता शरीर नहीं  मरता ये मन है   तङपता ये देह नहीं  बिलखता ये मन है अ स्तित्व को नकारता  खंङित यह मन है बारंबार टूटकर  बिखरता ये मन है देह में प्राण संग  पीङित ये मन है कल्पना के जाल में उलझा ये मन है प्राण बिन देह जैसे मात्र एक शव है मृत मन की  स्थिति भी बङी विचित्र है   नीरसता भरा जहाँ मन में  कैद है एक गहन उदासी भरा  मनो- संसार है गायत्री शर्मा

मौत की आहट

  मौत एक सुखद एहसास है जिंदगी की हंसी शाम है मौत का सफर दर्दनाक है इस सफर का लुत्फ शानदार है मौत एक सुखद एहसास है जिंदगी से जिंदगी की दास्तां है प्रारब्ध से अंत की यह किताब है मौत को हंसकर गले लगाना कांटो भरे सफर का गुलजार है मौत एक सुखद एहसास है मांगने से कुछ नहीं मिलता यहां  मौत से किसको एतराज है जिन्हे मालूम है प्रारब्ध से अंत में मिलना यह सफर उनके  लिए  कुछ खास  है मौत  एक  सुखद  एहसास  है ख्वाबों की दुनिया को भुलाकर अपने वजूद को खाक में मिलाना एक अजनबी लोक में स्वत: सिमटकर जहाँ से रूख्सत होने को बेकरार है मौत एक सुखद एहसास है जिंदगी की हंसी शाम है गायत्री शर्मा

आंखों से बहता पानी

  आँखो से बहते पानी का हमको भी मोल बता देना  सरिता के शीतल धारा का स्पर्श करो तो बता देना  सूरज की किरणों को देखो गर नजरें टिके तो बता देना  जीवन की राहों पर चलकर कांटे ना चुभे तो बता देना  गायत्री शर्मा

कवि और शायर में फर्क

  कवि और शायर  में फर्क होता है दिल में गम हजारों छुपे हैं  मगर समझ नहीं सकता ये जमाना उसका दर्द जिसके चेहरे पर हर पल  एक प्यारी सी मुस्कान होती है कवि भावों को अनुभूति तथा  अंतर्मन की वेदना व खुशी को  शब्दों के माध्यम द्वारा अलंकृत कर बयाँ करता है और वही शब्द लोगों के लिए  एक सुंदर काव्य बन जाता है शायर क्या जाने कविता के स्वर  व  भावभंगिम भावों को जो कभी चाँद तारों को तोङने जहाँ को कदमों में रखने जैसे  शब्दों को बढा-चढा कर पेश करे! माना  कि गम उसे भी है बयाँ वह भी कर रहा है परंतु एक कवि व उसकी सारगत  कविता की तुलना में कोसों दूर !!"गायत्री शर्मा" 

मैकाले शिक्षा पद्धति

  ईंङिया कहूँ या हिंदुस्तान या ब्रिटिश हूकूमत का प्रभाव लाईफ बना अब एक्सप्रेस गाङी दिल-दिमाग हुआ प्रभावित विदेशी आए योगा ले गए टेंशन से योगा एक्सचेंज किया सर्दी में भी कोल्ङ ङ्रिक लगता जैसे कूल ङ्रिंक है फटी हुई ये ब्रांङेङ जिंस भी बन गया  अब तो स्टाईल है बच्चे  भी अब मौज में है... पैरेंट्स भी बन गए माँङल  विदेशों को दे रहे क्रैङिट स्वदेशी  को हम भूल गए  जीवन मूल्यों का ह्वास हुआ इंङियंस का बुरा हाल हुआ विदेशी बङे संतुष्ट हुए लाईफ बना अब एक्सप्रेस गाङी भागो इंडियन  भागो ... ."गायत्री शर्मा"

दर्द की जुबान

  दर्द की जुबान नहीं होती महसूस कर देख लो तुम  कांच की तरह बिखर जाओगे क्या खुद को संभाल पाओगे तुम दर्द कभी बयाँ नहीं  होता रूदन स्वर  से चीख उठता है दिल कुरेदकर देख लो तुम गमों को नासूर से वो कम  नहीं होता !"गायत्री शर्मा"

दुनिया के गहरे राज

  न जाने कितने ऐसे राज़  छिपे हैं इस जहाँ में  इमारतों खंङहरों धरा के  हर एक कोने में इंसान के दिलो में  न जाने कितने........ शक्ल से दिखते चाँद का  टुकङा बातों से जैसे मिश्री घोलें दिल है अंधेरी काली कोठरी परखना बहुत कठिन है न जाने कितने...... पढना चाहो मन के चित्रपट्ट को समझना चाहो इंसानी फिदरत को सुना है चेहरा दिल का राज खोले ठहरो जरा! यूँ ही ऐतबार ना करना न जाने कितने.... "गायत्री शर्मा" 

शिक्षा का मूल उद्देश्य

  उच्च शिक्षा का प्रायोजन आर्थिक समृद्धि पाना  है धनधान्य से भी संपन्न हों  तो स्वार्थ वशीभूत होते हैं कोई गर्व करे ऊँचे कुल का कोई द्वेश करे किसी जाति से पथभ्रष्ट हो रहा युवा वर्ग निस्वार्थ भावना लुप्त हुई ङाँक्टरेट ङिग्री का प्रतीक  महानगरों का सम्मान बना ग्रामीण चिकित्सा को तरसें शहरो की तरफ वे रुख करते कुछ लोग कर्तव्य निभाते हैं आदर्श सभी को सिखाते हैं मौजूद हैं उनका वजूद यहाँ  जो समाज की सेवा में तत्पर अपने हिस्से की खुशिया बाँटे शिक्षा स्वास्थ्य में योगदान कर देश को बुलंदियो पर पहुंचाएँ समाहित हो ये आदर्श सभी मे योगदान हो जन जन का तो शैक्षिक उद्देश्य सफल हो जाए  "गायत्री शर्मा"

मृत्यु के बाद का सफ़र -स्वप्नावस्था

  स्वप्न में देखा आज मैने वो अदभुत  अदृश्य मंजर तुम खङे थे मेरी राहो में जब कदम रखा कुछ समझ ना पाई तब तुमने मुझे आदेश दिया इस राह पर चलकर वापस आना भूल से भी कहीं भटक ना जाना ये मार्ग बङा ही दुर्लभ है हर शख्स यहाँ से गुजरता नहीं जो पात्र है  मेरी कृपा दृष्टि का सिर्फ वही यहाँ चल पाता है सचमुच मैं खुश किस्मत थी जो तुमने मुझे आदेश दिया बढती चली गई एक बिंदु पर  जहाँ पहुँच कर सोचा यात्रा समाप्त हो गई परंतु......... तुमने फिर से पुकारा मुझे और मैं उठ खङी हुई  बढती चली गई किचङ.गङ्ढों,  नालों एवं संकरी गलियों से, गुजरते दुर्गम पथ पर आखिर मैं वापस आ गई तुम्हारे पास जब  देखा  सन्नाटा पूछा कुछ लोगों से सुना चले गए हैं सभी इस सभा में अब कोई नहीं मैं कोंसती रही खुद को काश बिना विराम लिए बढती चली गई  होती! तो शायद तुमसे फिर मुलाकात  होती खैर अब वो सलोना स्वप्न टूट गया आँखे खुली तो समझ गई  वो मेरे खुदा का भेजा पैगम्बर  था जिसने मुझे खुदा के करीब लाना चाहा और मैं अनजानी राहों  में , बस बाधाओं से  घिरती गई काश ये स्वप्न हकीकत होता तब ...

जिंदगी से शिकायत कैसी

  जिंदगी क्या शिकवा करूँ मैं तुझसे तू हर पल क्यों तङपाती है मुझे दर्द का ये सैलाब उमङ आया जो दिल के एक कोने में छिपा था हारकर भी मैं तुझको ही चाहूँ नहीं करूँगी खत्म तुझे मैं दुनिया मुझको कहेगी कायर जीऊँगी तुझको हंसते हंसते मायूसी अब जाहिर ना करूँगी तेरे हर प्रहार को अब मैं सहन करूँगी !जिंदगी क्या शिकवा..... "गायत्री शर्मा"

राजनीति के जादूगर

राजनीति का जादू देखो कर दे सबकी नींद हराम खेल दिखाएँ नेता लोग जनता बिचारी हुई बावली देखो गली में जादूगर आया करतब दिखाकर खूब लुभाया जिसने जितना अच्छा खेला सबसे ज्यादा उसने लूटा अरे मुर्खों कुछ तुम भी सोचो भैंस नहीं , है अक्ल बङी जादू की छङी इन्हे न समझो पासा कब ये उल्टा कर दें कोई ना जाने इनका काला जादू कश्मीर हो चाहे पाक - विवाद देश मे हो गर आंतरिक कलेश वादों की छङी को तुरंत घुमा ओहो गइ समस्या सब छू मंतर :)"गायत्री शर्मा"

थोड़े शब्दो मे बहुत कुछ

  सिमित शब्द है जोङकर  जिनसे  लिखते हैं हर रोज नया हम सब अपने किस्सों को जीवन के हर हिस्से को भूत भविष्य वर्तमान को सिमित शब्द हैं जोङकर जिनसे लिखते हैं हर रोज नया दर्द  से भरी दास्तानों को खुशियों की  सौगातों  को सपनो से सजे अरमानों को सीमित शब्द हैं जोङकर जिन सेलिखते हैं हर रोज नया कोयल सी मीठी तानों को अश्रु  के  बहते  सागर  को कुछ कही अनसुनी बातों को सिमित शब्द हैं जोङकर जिनसे लिखते हैं हर रोज नया "गायत्री शर्मा"

शिक्षा पर एकाधिकार कैसा

  शिक्षा पर एकाधिकार ना समझो चूल्हा  चौका   तुम  भी   सीखो गर दूर हो घर परिवार से  तो यह हुनर तुम्हारे काम आएगा लड़का हो या लड़की दोनों का रोजगार ये तुम्हे आत्मनिर्भर बनाएगा , बनाओ खुद को काबिल सबसे नही किसी के आधीन है जीना इतराते हो इतना क्यों  तुम अपने हक  से वह  भी वाकिफ लाङ  -प्यार ने तुम्हे  बिगाङा कर्तव्यों से अब मुँह ना  मोङो चुनौती  को स्वीकार  करो अब बदला जमाना खुद भी बदलो चुल्हा चौका तुम भी  सीखो यह हुनर तुम्हारे काम आएगा! "गायत्री शर्मा" 

जीवन एक कोरा कागज़

  सोचती हूँ कुछ लिख ङालूँ जो भी है दिल में  दफन जिंदगी के कोरे कागजों पर आंसुओं की स्याही से देखूँ तो जरा एैसा क्या है खास  दर्दे दिल बयाँ कर शायदमिलता हो सुकून? ? ? ङरती हूँ कहीं मेरा रूदन सुन तुम पर भी सिलवटें ना पङ जाए शायद रंग भरने की चाहत में यह कागज कोरा ही रह जाए! "गायत्री शर्मा" 

नदी की धारा बनकर बहती जाउँ

मैं नदी की धारा बन जाऊँ चहूँ ओर दिशा में बह जाउँ गति प्रबल कोई रोक ना पाए शीतल नीर सी बह जाऊँ जैसे प्यासे अधरों के लिए नदियाँ अमृत बन जाती हैं शीतल मधुर सौम्य है धारा परमार्थ का भाव निराला तेरे इन गुणों ने सिखाया प्रेम त्याग का सुंदर पाठ तूँ पियूष सुधा की है धारा फिर समंदर क्यों इतना खारा उस अथाह समंदर के आगे तूँ लगती जैसे सिमटी हुई आलोचित क्यों करू मै तूझे समंदर को क्यों अथाह कहूँ तू अपने गुणों से पूज्यनीय है फिर समंदर क्यों न बना महान तूँ मिल जाती है समंदर में तब भी खारा वह रहता है गर्व ना कर एै दरिया तूँ तुझमें नदियों सा भाव नहीं है मानवता को सीख यही नदियों के गुण को अपनाए मैं नदी की धारा बन जाऊँ चहूँ ओर दिशा में बह जाऊँ "गायत्री शर्मा"

मेरी उड़ान

  उङना चाहूँ अनंत गगन में मन पंछी बन चहक उठे जैसे इस  सुंदर धरती पर जीवन में गुल खिल जाए गुलशन बना आशियाँ अपना उङना चाहूँ....... प्रात: काल परिंदो की जब कानो में ध्वनि गूँज उठे तब प्रकृति मनोहर तान सुनाए सुंदर तानों को सुनकर  फिर रोम रोम हर्षित हो जाए  उङना चाहूँ ...... अंतर्मन की हर अभिलाषा नित नए स्वप्नों के संगतय कर लूँ   हर दूरी को गगनचूँबी मैं बन जाउँ उङना चाहूँ......... धरती गगन की हर बाधाएं मेरी उङान को रोक ना पाए तब मन पंछी वायु वेग से अधिक प्रबल बन जाए उङना चाहूँ............ ."गायत्री शर्मा"

सपने क्यों आते हैं

  स्वप्न न जाने क्यों आते हैं कुछ अच्छे कुछ बुरे होते हैं कभी जख्मों को  कुरेद रहे कुछ  यादों  को  संजोये  हुए  स्वप्न  न  जाने क्यों  आते हैं देखती हूँ जब बंद आँखो से जागृत अवस्था में याद नहीं उलझा देते हैं  ये  कभी भी मन पर किसी का जोर नहीं स्वप्न न जाने क्यों आते हैं कुछ खट्टी कुछ मीठी यादें असमय याद  आ जाते  हैं प्रात:काल  के  स्वप्न  भी कभी हकीकत बन जाते हैं स्वप्न न जाने क्यों आते हैं "गायत्री शर्मा"

जुगनू

जुगनू भी कितने कमाल करते हैं अंधेरी रातों में हमें गुमराह करते हैं चीर अंधेरा आगे आगे बढते जाते हैं पीछे पीछे हम उनके दौङे जाते हैं ले जाते हैं दूर कहीं घनघोर घटाओं में छोङ अकेला साथ हमारा गुम हो जाते हैं पलक झपकते वे अंधेरों में छिप जाते हैं ऐसा लगता है मानो वो राह दिखाते हैं गायत्री शर्मा

जिंदगी खुशहाल हो

  जिंदगी खुशहाल बने  गर मेहनतकश हो हर आदमी संकल्प ले यह प्रण करे नहीं ङगमगाएंगे कभी ख्वाहिशों का सिलसिला पूरा  करने का जज्ब हो संकल्प हो जीवन में तो सफल हो जाए हर आदमी॥ गायत्री शर्मा 

दशहरा पर्व

दशहरा खुशी का पर्व है इस  दिन खुल जाते हैं सभी मुक्ति के दस दरवाजे  दस रावण छिपा बैठा है  मानव तन के भीतर  आज चहुं ओर दिशा में  रावण का प्रतीक जला  खुशी से हम सब झूमें नाचें   छण भर के आतिशबाजी में  ध्वस्त हुआ रावण प्रतिमा  वाह कितना आनन्द आया धू धू कर प्रतिमा जलना काश कि इतना आसान होता   मानव के अन्तस् में छिपे  आवेश द्वेष घृणा और  अहंकार का प्रतीक   रावण को मिटाना!   गायत्री शर्मा

मुश्किलों का सामना

क्यों आती हैं बाधाएँ जीवन में क्यों ये कदम लङखङा जाते हैं क्षण भर तनहा पाकर खुद को व्याकुल मन क्यों हो जाता है चाहतें क्यो कभी खत्म ना होती पाकर सारे जहाँ की खुशियाँ फिर भी उदासी ओढे हुए हैं टूटकर बिखर ना जाना कहीं अश्क भी आँखो मे न ठहरते कैसे संभालकर गम रखोगे सोचो जरा इस क्यों के पीछे हम ही कारण क्यों होते हैं गमों को अपने भूल कर तुम हंसते हुए बाधाएँ पार करो "गायत्री शर्मा"

कृष्ण लीला

बाल रूप मोरे मन भावा अति सुंदर मनमोहन प्यारा मनमोहक तेरी छवि निराली बंसी की धुन वो कदंब की ङारि बाल- ग्वालों संग झुंङ बनाकर नंद की नगरी में उधम मचावे निगुणा भी तेरा रूप निहारे माखनचोर पर बलि बलि जावे गायत्री शर्मा

सफर का आगाज़

हर शख्स जख्म साथ लेकर चलता है जिंदगी का सफर इतना आसान नहीं होता यूं तो फूलों पर चलना हर कोई जानता है जो कांटो पर चलना सीख जाते है वो पत्थर पर भी अपना निशां छोङ जाते हैं गायत्री शर्मा

राम राज्य एक ख्वाब

चाहत है कि बदले समाँ बदलेगा ये सारा जहां हो प्रेम हर घट में सदा नहीं द्वेष भाव का स्थान हो जुल्म की कोई बात न हो हर शख्स धर्म का रूप हो मेरी कल्पना की दुनिया में ऐसा कोई साम्राज्य हो !गायत्री शर्मा

पार्टियों में जंग

दो पार्टियों में जंग भ्रष्टाचार घोटालों से दोनो ही बदनाम हुई किसे चुने हम किसे हटाएँ जनता के लिए पहेली थी पर लोगों की इच्छाएँ थी ब्रिटिश राज का खात्मा हो हर दिन नए मुद्दे निकले एक परास्त दूसरा विजयी दोयम दर्जा पाने वाली केन्द्र में अब मुखरित हुई भारत के इतिहास में आज नए अध्याय का श्रीगणेश हुआ झूम उठा है पूरा देश सुना है भ्रष्टाचार का अंत होगा नई सरकार का आह्वान है केंद्र पक्ष के दोषी नेताओं को अब नहीं बक्शा जाएगा सुशासन को लाना है अब प्रशासन तंत्र मजबूत होगा नई नई योजनाएँ बनेंगी हर भारतवासी समृद्ध होगा मिटते हुए अपने गौरव को भारत पुन: प्राप्त करेगा जहाँ ङाल ङाल पर सोने की चिङिया करती है बसेरा वो भारत देश है मेरा जो रह गया सपना अधूरा यह मधुर स्वर चरितार्थ होगा क्या सचमुच अब ........? ? ? भारत का नवनिर्माण होगा!! गायत्री शर्मा

राजनीति क्या है

पोलिटिक्स पोलिटिक्स पोलिटिक्स जिधर देखो उधर पोलिटिक्स ओह ये क्या स्कूल में पोलिटिक्स प्रशासन में पोलिटिक्स नेताओं में पोलिटिक्स घर घर में पोलिटिक्स दौलत के लिए बेटे का पोलिटिक्स बूढे माँ बाप को तीर्थ यात्रा भेजने का पोलिटिक्स हर रोज बने नई योजनाएँ ओह रिश्तो में भी पोलिटिक्स अब क्या कहें लगता है जैसे षङ्यंत्र है पोलिटिक्स नहीं ये कहना गलत होगा... जिंदा है हर दिल में एक अच्छा इंसान जुल्म के खिलाफ जो करे इंसानियत की बात हर गली मोहल्ले में कोई तो होगा एक अच्छा इंसान गलत नही है राजनीति गलत नहीं षङयंत्र राष्ट्र हित के लिए किया गया हो गर कोई षङ्यंत्र जुल्म को मात देने का दुश्मन को परास्त करने का समझ गए हम राजनीति हर पहलू से देखें तो यह केवल षङयंत्र नही है जीने की "कला" है राजनीति गायत्री शर्मा

किसकी पार्टी चलेगी

असरदार सरकार लाना है  चहुँ ओर दिशा में शोर है  वोट की राजनीति से उपर उठकर  जरा देश की हालात को देखो  जनता के विश्वास को कैसे मजबूत करोगे तुम  पाकिस्तानी हूकूमत को अब धूल चटाने की बारी है  भारत की विदेश नीति में शांतिपूर्ण मतभेद मिटाना  सहनशील सह अस्तित्व पर चलना पाकिस्तानियों को लगता है  ये कमजोरी हमारी है जिस दिन सहनशीलता खो देगा भारत   अस्तित्व तुम्हारा मिट जाएगा नहीं चाहते तृतीय विश्व युद्ध  नहीं चाहते विध्वंसक युद्ध हम विकासशील से विकसित देश बने   यही प्रयास हमारा है लोकतांत्रिक देश हैं हम अपनी मातृभूमि पर गर्व हमें भारत माता के चार सिपाही हिंदु मुस्लिम सिक्ख इसाई!  काश परिवर्तन का ये नाद जो चहुँ दिशा में गूँज रहा  वोट के बाद ये थम ना जाए आस हमारा टूट ना जाए  भूलकर अपने निजी स्वार्थ को भारत को समृद्ध बनाओ!   गायत्री शर्मा

जीवन के रंग

रंगो से भरी है जिंदगी   उम्मीदों से सजी है जिंदगी  कांटो भरे राहों पर चलकर  दुख सहना सिखाए जिंदगी   कोई खुशियाँ बांटकर खुश है  कोई छीनकर हक भी नाखुश है  बदले की आग में जलते रहना  धिक्कार है ऐसी जिंदगी!  "गायत्री शर्मा"

जीवन की धूपछाँव

धूप छांव से आच्छादित यह जीवन एक पहेली है तरूवर नदियाँ सागर अंबर सबकी यही कहानी है प्रकृति आभूषण बन करके निज वसुधा का श्रृंगार करें राह थके पथिकों के लिए प्रकृति आश्रय स्थान बने पक्षियों का मधुर कलरव सुरों का संगम बन जाए हर्ष शोक व्याकुलता भूलकर पथिक प्रफुल्लित हो जाएँ धूप छांव से आच्छादित यह जीवन एक पहेली है गायत्री शर्मा

बुराई पर अच्छाई का पर्व होली

त्यौहार हमारे जीवन मे हर साल ही आते जाते हैं संदेश कोई दे जाते हैं हमें याद सदा ये दिलाते हैं बुराई पर अच्छाई की जीत का ये त्यौहार ही साक्षी बनते हैं होलिका का असफल प्रयास प्रहलाद की याद दिलाते हैं दिलों के बीच की दूरियाँ को सब भूलकर गले लग जाते हैं विविध व्यंजन से थाल सजा हम मंगल खुशियाँ मनाते हैं त्यौहार हमारे जीवन में हर साल ही आते जाते हैं "गायत्री शर्मा"

झूठ हो तुम

जब दबे हुए हो झूठ तले फिदरत कैसे बदलोगे तुम नफरत की मिनार खङी करके क्या सुकून से जी पाओगे तुम वंचित वर्गों का अहित करके क्या अपना हित कर पाओगे माना कि झूठ नहीं छिपता जब सच से टकरा जाता है फिर भी क्यों कहते रहते हो मैं नख से शीख तक सच्चा हूँ जब दबे हुए हो झूठ तले फिदरत कैसे बदलोगे तुम!{ नख-नाखून/शीख-सिर "गायत्री शर्मा"

साहित्य अमर है

साहित्य हृदय का भाव है जो जादू सा छा जाता है सुंदर पंक्तियों से सजा यह जनमानस का राग है प्रेयसी का प्रेम राग है वीरों का राष्ट्र गान है साहित्य सृजित यह धरा स्वर्ग से भी महान है "गायत्री शर्मा"

अभिव्यक्ति जरूरी है

कुछ क्षण के लिए सोचती हूँ अपनी अभिव्यक्ति को समेट लूँ विचार व्यक्त ही ना करूं परंतु.. विचार और अभिव्यक्ति ही हमें जीवन के हर पहलू से अवगत कराते हैं जीवन जीने की कला सिखाते हैं भावनाएँ व्यक्त कर विचारों का आदान प्रदान करते हैं... एवं नवीन विचारों का सृजन करते हैं तो कैसे मैं अपनी अभिव्यक्ति को समेट लूँ कदापि नहीं .... यही तो पशु एवं मनुष्य में अंतर करना सिखाते हैं असभ्य से सभ्य समाज की ओर मोङते हैं बुराई से अच्छाइ की ओर हम निरंतर गतिशील रहते है ये विचारों की स्वतंत्रता अभिव्यक्ति का ही प्रभाव है जिससे सुंदर साहित्य जगत का निर्माण हुआ!! "गायत्री शर्मा"

घमंड कैसा?

बहुत बङी है दुनिया यारों हम सब एक छोटे से कण हैं कितने आए कितने चले गए इतिहास गवाह बना है क्यों करते हो घमंङ तुम इतना क्या साथ ले जोओगे अपनी अशर्फियाँ मिट जाते हैं वजूद यहाँ पर दौलतवालों की बिसात ही क्या ! बहुत बङी है दुनिया यारों हम सब एक छोटे से कण हैं "गायत्री शर्मा"