मैं नदी की धारा बन जाऊँ
चहूँ ओर दिशा में बह जाउँ
गति प्रबल कोई रोक ना पाए
शीतल नीर सी बह जाऊँ
जैसे प्यासे अधरों के लिए नदियाँ
अमृत बन जाती हैं
शीतल मधुर सौम्य है धारा
परमार्थ का भाव निराला
तेरे इन गुणों ने सिखाया प्रेम
त्याग का सुंदर पाठ
तूँ पियूष सुधा की है धारा
फिर समंदर क्यों इतना खारा
उस अथाह समंदर के आगे तूँ
लगती जैसे सिमटी हुई
आलोचित क्यों करू मै तूझे
समंदर को क्यों अथाह कहूँ
तू अपने गुणों से पूज्यनीय है
फिर समंदर क्यों न बना महान
तूँ मिल जाती है समंदर में
तब भी खारा वह रहता है
गर्व ना कर एै दरिया तूँ
तुझमें नदियों सा भाव नहीं
है मानवता को सीख यही
नदियों के गुण को अपनाए
मैं नदी की धारा बन जाऊँ
चहूँ ओर दिशा में बह जाऊँ
"गायत्री शर्मा"
खुशियों से भरा हो लाखों पल ,कहीं नैन नमी से युक्त रहे झरझर बरखा जो बून्द पड़े , फिर भी अंगना हो अनल तले नभचर ख़ग दाना- दाना को ,अन्न नीर बिना जैसे तरसें विचरे नभः में पंखे लहरा , उन्मुक्त गगन से दूर चले जो क्षितीज दिखे पंखों के परे ,भानू किरणों से तपता रहा अंकित जो करूँ दुःख का बादल ,चहुँ ओर घिरे पर भीग रहे ना उड़ पाया न ठहर सका, हर तरफ ही नीड़ तलाश रहा बेबसी के काले बादलों ने ,सपनों की उड़ानें रद्द कर दी चंचल ऋतुओं का क्या कहने,बेवक्त मिजाज बदल बैठे बेमानी लगे सावन भी उसे ,वो मयूर नहीं जो थिरक सके पंखें भीगी नम नैन हुए, किस ओर दिशा में नीड़ बसे। गायत्री शर्मा
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