खुशियों से भरा हो लाखों पल ,कहीं नैन नमी से युक्त रहे
झरझर बरखा जो बून्द पड़े , फिर भी अंगना हो अनल तलेनभचर ख़ग दाना- दाना को ,अन्न नीर बिना जैसे तरसें
विचरे नभः में पंखे लहरा , उन्मुक्त गगन से दूर चले
जो क्षितीज दिखे पंखों के परे ,भानू किरणों से तपता रहा
अंकित जो करूँ दुःख का बादल ,चहुँ ओर घिरे पर भीग रहे
ना उड़ पाया न ठहर सका, हर तरफ ही नीड़ तलाश रहा
बेबसी के काले बादलों ने ,सपनों की उड़ानें रद्द कर दी
चंचल ऋतुओं का क्या कहने,बेवक्त मिजाज बदल बैठे
बेमानी लगे सावन भी उसे ,वो मयूर नहीं जो थिरक सके
पंखें भीगी नम नैन हुए, किस ओर दिशा में नीड़ बसे।
गायत्री शर्मा
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें