कुछ क्षण के लिए सोचती हूँ
अपनी अभिव्यक्ति को समेट लूँ
विचार व्यक्त ही ना करूं
परंतु..
विचार और अभिव्यक्ति ही हमें
जीवन के हर पहलू से अवगत कराते हैं
जीवन जीने की कला सिखाते हैं
भावनाएँ व्यक्त कर विचारों का
आदान प्रदान करते हैं...
एवं नवीन विचारों का सृजन करते हैं
तो कैसे मैं अपनी अभिव्यक्ति को समेट लूँ
कदापि नहीं ....
यही तो पशु एवं मनुष्य में
अंतर करना सिखाते हैं
असभ्य से सभ्य समाज की ओर मोङते हैं
बुराई से अच्छाइ की ओर
हम निरंतर गतिशील रहते है
ये विचारों की स्वतंत्रता
अभिव्यक्ति का ही प्रभाव है
जिससे सुंदर साहित्य जगत का निर्माण हुआ!!
"गायत्री शर्मा"
खुशियों से भरा हो लाखों पल ,कहीं नैन नमी से युक्त रहे झरझर बरखा जो बून्द पड़े , फिर भी अंगना हो अनल तले नभचर ख़ग दाना- दाना को ,अन्न नीर बिना जैसे तरसें विचरे नभः में पंखे लहरा , उन्मुक्त गगन से दूर चले जो क्षितीज दिखे पंखों के परे ,भानू किरणों से तपता रहा अंकित जो करूँ दुःख का बादल ,चहुँ ओर घिरे पर भीग रहे ना उड़ पाया न ठहर सका, हर तरफ ही नीड़ तलाश रहा बेबसी के काले बादलों ने ,सपनों की उड़ानें रद्द कर दी चंचल ऋतुओं का क्या कहने,बेवक्त मिजाज बदल बैठे बेमानी लगे सावन भी उसे ,वो मयूर नहीं जो थिरक सके पंखें भीगी नम नैन हुए, किस ओर दिशा में नीड़ बसे। गायत्री शर्मा
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