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पार्टियों में जंग

दो पार्टियों में जंग भ्रष्टाचार घोटालों से दोनो ही बदनाम हुई किसे चुने हम किसे हटाएँ जनता के लिए पहेली थी पर लोगों की इच्छाएँ थी ब्रिटिश राज का खात्मा हो हर दिन नए मुद्दे निकले एक परास्त दूसरा विजयी दोयम दर्जा पाने वाली केन्द्र में अब मुखरित हुई भारत के इतिहास में आज नए अध्याय का श्रीगणेश हुआ झूम उठा है पूरा देश सुना है भ्रष्टाचार का अंत होगा नई सरकार का आह्वान है केंद्र पक्ष के दोषी नेताओं को अब नहीं बक्शा जाएगा सुशासन को लाना है अब प्रशासन तंत्र मजबूत होगा नई नई योजनाएँ बनेंगी हर भारतवासी समृद्ध होगा मिटते हुए अपने गौरव को भारत पुन: प्राप्त करेगा जहाँ ङाल ङाल पर सोने की चिङिया करती है बसेरा वो भारत देश है मेरा जो रह गया सपना अधूरा यह मधुर स्वर चरितार्थ होगा क्या सचमुच अब ........? ? ? भारत का नवनिर्माण होगा!! गायत्री शर्मा

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धूप छाँव सा जीवन

  खुशियों से भरा हो लाखों पल ,कहीं नैन नमी से युक्त रहे झरझर बरखा  जो बून्द पड़े , फिर भी अंगना हो अनल  तले नभचर  ख़ग दाना- दाना को ,अन्न नीर बिना जैसे तरसें विचरे नभः में पंखे लहरा , उन्मुक्त गगन से दूर चले जो क्षितीज दिखे पंखों के परे ,भानू किरणों से तपता रहा अंकित जो करूँ दुःख का बादल ,चहुँ ओर घिरे पर भीग रहे ना उड़ पाया न ठहर सका, हर तरफ ही नीड़ तलाश रहा बेबसी के काले बादलों ने ,सपनों की उड़ानें रद्द कर दी चंचल ऋतुओं का क्या कहने,बेवक्त मिजाज बदल बैठे बेमानी लगे सावन भी उसे ,वो मयूर नहीं जो थिरक सके पंखें भीगी नम नैन हुए, किस ओर दिशा में नीड़ बसे। गायत्री शर्मा

अध्यात्म एक रहस्य

  अध्यात्म एक रहस्य अध्यात्म रहस्य अति गूढ़ है,अपनी मति से जान जितनी आंतरिक यात्रा, उतनी ही पहचान अध्यात्म अलौकिक ज्ञान है ,विज्ञान फेल हो जाय स्वांसों की  इस डोर को , पकड़ सके ना कोय साधना के आकाश में प्राण-अपान के बीच योगी साधक ,साधिका ,साधे प्राण की डोर स्वेच्छा मृत्यु सहज योग, काल खड़ा जब पास काल के धावा बोलते , योगी हो लवलीन जल समाधि राम लें लक्ष्मण सरयू आये वाणशैया पर लेटे ही भीष्मपितामह जाये विवेकानंद समाधि में प्राण साध जग छोड़े गुरु मिले सम परमहँस , सहज योग तब होय अध्यात्म सहज क्रिया-कर्म, तंत्र-मंत्र ना जान भूत-प्रेत ,सब देवता , मोक्ष तत्व से दूर मानव का तन दुर्लभ है , मिले ना बारम्बार टूटा हुआ पत्ता नहीं , कभी शाख पर आये लाख़ 84 जन्म  है ,  जीव काल  का  ग्रास आत्मज्ञान जब तक नहीं, नर ना तरे भव पार।।

Deep pain पीड़ा

  पीङा क्या है ?क्या यह मात्र  आभास है जो हमें प्रतीत होता है यह किस प्रकार का एहसास होता है जिसे हम महसूस करते  हैं जिसके उग्र स्वरुप में समाकर दिल रोता है ,आत्मा कराहती है एवं हमारे व्यवहार में परिवर्तन दीखता है चूंकि यह संभव है की इस दर्दनाक अनुभूति को कोई नहीं भूल सकता है जहन में कैद हो जाती हैं जिसका प्रभाव हम अपने नियमित जीवन में देखते हैं महसूस करते हैं।  पीङा एक सूक्ष्म प्रभाव है मन पर जो मानव को आहत करता है बारंबार मानव हृदय टूटता बिखरता और जुङता है एक सूक्ष्म प्रक्रिया के रूप में हमारे कल्पना में सोच में हर पल में समाहित होकर हमें वेदना से व्यथित करता जाता है क़ि हमारे नियमित कार्यशैली प्रभावित होती है। क्या कोई किसी शक्श के पीड़ा का अनुमान लगा सकता है? पर सवाल यह है कि कैसे ? यदि वह व्यक्ति स्वयं उस स्थिति से जूझ चूका हो वह बेहतर समझ सकता है परंतु आज के समय में किसी के पास इतना समय होगा किसी का दर्द साझा करने का! शा यद् नहीं। यदि हम विचार करें तो प्रश्न यह उठता  है कि पीङा क्या शारीरिक  होती है या केवल मात्र मानसिक ? जिसका आभास केवल जागृति में है य...