मरता शरीर नहीं मरता ये मन है
तङपता ये देह नहीं बिलखता ये मन हैअ
स्तित्व को नकारता खंङित यह मन है
बारंबार टूटकर बिखरता ये मन हैदेह में प्राण संग पीङित ये मन है
कल्पना के जाल में उलझा ये मन है
प्राण बिन देह जैसे मात्र एक शव है
मृत मन की स्थिति भी बङी विचित्र है
नीरसता भरा जहाँ मन में कैद है
एक गहन उदासी भरा मनो- संसार है
गायत्री शर्मा

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