न जाने कितने ऐसे राज़
छिपे हैं इस जहाँ मेंइमारतों खंङहरों धरा के
हर एक कोने में इंसान के दिलो में
न जाने कितने........
शक्ल से दिखते चाँद का टुकङा
बातों से जैसे मिश्री घोलें
दिल है अंधेरी काली कोठरी
परखना बहुत कठिन है
न जाने कितने......
पढना चाहो मन के चित्रपट्ट को
समझना चाहो इंसानी फिदरत को
सुना है चेहरा दिल का राज खोले
ठहरो जरा! यूँ ही ऐतबार ना करना
न जाने कितने....
"गायत्री शर्मा"

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