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मेरी उड़ान

 


उङना चाहूँ अनंत गगन में

मन पंछी बन चहक उठे
जैसे इस  सुंदर धरती पर
जीवन में गुल खिल जाए
गुलशन बना आशियाँ अपना

उङना चाहूँ.......

प्रात: काल परिंदो की जब
कानो में ध्वनि गूँज उठे तब
प्रकृति मनोहर तान सुनाए
सुंदर तानों को सुनकर  फिर
रोम रोम हर्षित हो जाए

 उङना चाहूँ ......

अंतर्मन की हर अभिलाषा
नित नए स्वप्नों के संगतय कर लूँ
  हर दूरी को गगनचूँबी मैं बन जाउँ

उङना चाहूँ.........

धरती गगन की हर बाधाएं
मेरी उङान को रोक ना पाए
तब मन पंछी वायु वेग से
अधिक प्रबल बन जाए
उङना चाहूँ............

."गायत्री शर्मा"

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