जब दबे हुए हो झूठ तले
फिदरत कैसे बदलोगे तुम
नफरत की मिनार खङी करके
क्या सुकून से जी पाओगे तुम
वंचित वर्गों का अहित करके
क्या अपना हित कर पाओगे
माना कि झूठ नहीं छिपता जब
सच से टकरा जाता है
फिर भी क्यों कहते रहते हो
मैं नख से शीख तक सच्चा हूँ
जब दबे हुए हो झूठ तले
फिदरत कैसे बदलोगे तुम!{
नख-नाखून/शीख-सिर
"गायत्री शर्मा"
खुशियों से भरा हो लाखों पल ,कहीं नैन नमी से युक्त रहे झरझर बरखा जो बून्द पड़े , फिर भी अंगना हो अनल तले नभचर ख़ग दाना- दाना को ,अन्न नीर बिना जैसे तरसें विचरे नभः में पंखे लहरा , उन्मुक्त गगन से दूर चले जो क्षितीज दिखे पंखों के परे ,भानू किरणों से तपता रहा अंकित जो करूँ दुःख का बादल ,चहुँ ओर घिरे पर भीग रहे ना उड़ पाया न ठहर सका, हर तरफ ही नीड़ तलाश रहा बेबसी के काले बादलों ने ,सपनों की उड़ानें रद्द कर दी चंचल ऋतुओं का क्या कहने,बेवक्त मिजाज बदल बैठे बेमानी लगे सावन भी उसे ,वो मयूर नहीं जो थिरक सके पंखें भीगी नम नैन हुए, किस ओर दिशा में नीड़ बसे। गायत्री शर्मा
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