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जिंदगी से शिकायत कैसी

 


जिंदगी क्या शिकवा करूँ मैं तुझसे

तू हर पल क्यों तङपाती है मुझे
दर्द का ये सैलाब उमङ आया
जो दिल के एक कोने में छिपा था
हारकर भी मैं तुझको ही चाहूँ
नहीं करूँगी खत्म तुझे मैं
दुनिया मुझको कहेगी कायर
जीऊँगी तुझको हंसते हंसते
मायूसी अब जाहिर ना करूँगी
तेरे हर प्रहार को अब मैं सहन करूँगी
!जिंदगी क्या शिकवा.....
"गायत्री शर्मा"

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