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मौत के सफर में


जन्म लेते एकाकी जहाँ में सभी
मरते भी हैं एकाकी जहाँ में सभी 

 बीच के बंधनों का क्या हम करें
साथ दीखते हैं सब साथ होते नहीं

मौत का ये सफर साथ कटते नहीं
काश अपने हमें न भुलाएं मगर

जिंदगी स्वप्न है बेबसी साथ है
जाने क्यों होते मद में गुरुरों में सब

सोचते हैं जो सब कुछ उन्ही से है जग
नहीं जाना है संग में साज ओ सामान

भाई बंधु बहन मात का क्या कहें
जाल ममता का है  ये फ़साना जहां

जानते हैं सभी फिर भी जकड़े रहे
धोखों का जाल पसरा न आँखे खुली

क्यों न सोचें कि कुछ नेकी को साथ लें
ये हकीकत है नेकी बदी साथ है

जानते है सभी फिर भी पापी बनें
बोझ बढ़ता रहे जग से खाली चले

क्या मुकां था तेरा आदमी तू बता
रह गया खाक दुनिया में तूँ न रहा

चर्चे चलते रहेंगे सभी के यहां
अस्त हो जायेगी जिंदगी ही सभी

रैन ये ही है नश्वर जहां है यहीं 
जागरण को करो मन का बंधन छूटे

इसके आगे नहीं है कोई बंदगी
बोझ मन का उतारो भजो श्री हरि
।।

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