क्या कारण है सन्यासी बन जीवन में क्या पाया हमें बताओ तुम
जान सकोगे जीवन है क्या मरण के पीछे कारण तो बतलाऊँ मैं
जिज्ञासा है एक इच्छा है भेष बना लूँ मैं भी शायद जान सकूं
बिना जतन के फल नही मिलता बिन श्रद्धा नहीं भगवन ये भी जानो तुम
मैं छोड़ू ये जग की प्रीति जन सेवा अपनाया जिसमे ईश्वर है
माना की कण कण में रमता लेकिन जनसेवा है उत्तम यही बताऊं मैं
उपलब्धि की बातें न जंचती क्या पाया क्या खोया तुमने दुनिया में
जो मिलता है वही तो खोता नश्वरता संसार यही तो सार है
राजा हो या चाहे भिखारी छोड़ चलेंगे एक दिन यारी दुनिया से
बावरा मन क्यों भागे है दुनिया में कोई सार नहीं है
खाकर भी धोखा अपनों से नहीं अपनों को बिसराये कैसी आशा है
अंत 'काल' जब सिर पर होगा सारी उम्मीदें धरी रहेंगी दुनिया से
नेक करम की पूंजी रखले रिश्ते साथ न देवे क्यों न हरि को भजे
खोना पाना लगा रहेगा संग नहीं कुछ जायेगा इस दुनिया से
क्या है जीवन धुप छांव की अजब गजब की यारी नहीं सुहाएगा।।
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