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धर्म का सतपथ

युग आये युग बीते जाये, लोग सहस्त्र,करोड़ो आये
हर युग में हुई धर्म प्रतिष्ठा  इश्वर धार मनुज तन आते
लाख चौरासी जन्म मरण है ,स्थावर,नभ-और धरा है
जन्म मरण का दुःख है दारुण ,बिछू डंक सा काल खड़ा है
जिव जो माया में लिपटा है,अविनाशी जग भूल चला है
इन नैनों में जग को निहारे ,मायापति का ये संसार
माया ठगनी ठग ले जाये ,हरि से जिव बिमुख हो जाये
दुनिया के सब काज न छोड़े, हरि का ध्यान वो भूल गया
पापी जीव है निर्मल ईश्वर, जीव को भव से तार रहे
माया में उलझाने वाले ,स्वयं धरा पर आते हैं
महिमा किस विधि कहूँ  दयानिधि,नर नारायण हे वरदायक
काल के ग्रास से तुम ही बचाते, सत्संगति से प्रीति बढाते
निर्मल मन सत्संग श्रवण से, ज्ञान ध्यान वैराग्य से जीते
काल को जीत के निर्भय होके, जीव परमपद को पा जाते
सुनो दयालु भगवन मेरे,चरणों में नित प्रीत बढ़ाना
विनय करू करबद्ध ह्रदय से,अपनी भक्ति ह्रदय में रखना
अंत प्राण जो निकले देह से निर्मोही मन तुझको ध्याये
होकर के लवलीन भक्ति में मिथ्या जग से दूर हो जाये।।

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